पीटीआई, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एनजीटी के उस आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि यदि कोई कंपनी अपने बड़े पैमाने के कारोबार से अधिक लाभ कमाती है, तो उसे पर्यावरणीय लागतों के लिए अधिक जिम्मेदारी उठानी होगी। इस आदेश में पर्यावरण मानकों का उल्लंघन करने वाले एक बिल्डर पर पांच करोड़ रुपये का पर्यावरणीय मुआवजा लगाया गया था।

पीठ ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण से संबंधित मामलों में किसी कंपनी के परिचालन के पैमाने को पर्यावरणीय नुकसान से जोड़ना मुआवजे का निर्धारण करने में एक महत्वपूर्ण कारक हो सकता है।

अदालत ने कहा कि बड़े पैमाने का मतलब अक्सर अधिक संसाधनों का उपयोग, अधिक उत्सर्जन और अधिक अपशिष्ट होता है, जिससे पर्यावरण पर अधिक दबाव पड़ता है।

पीठ ने कहा कि यदि किसी कंपनी का टर्नओवर अधिक है, तो यह उसके संचालन के विशाल पैमाने को दर्शाता है। यदि ऐसी कंपनी पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाने में योगदान देती पाई जाती है, तो उसके टर्नओवर का नुकसान की मात्रा से सीधा संबंध हो सकता है।

इसलिए, हमारी राय में यह तर्क देना कि नुकसान की मात्रा के अनुरूप मुआवजा निर्धारित करने में टर्नओवर कभी भी प्रासंगिक कारक नहीं हो सकता, गलत है।
वकील की पेशी को नहीं माना जाएगा डराना-धमकाना : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने एक वकील के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को खारिज करते हुए कहा है कि अपने पेशेवर कर्तव्यों का निर्वहन कर हुए किसी वकील की पेशी को डराना-धमकाना नहीं माना जाएगा।

जस्टिस अरविंद कुमार और पीबी वराले की पीठ ने कहा कि बिना ठोस सुबूतों के लचर आरोप आइपीसी की धारा 506 (आपराधिक डराना-धमकाना) के तहत अपराध नहीं बनाते।

सर्वोच्च न्यायालय ने वकील बेरी मनोज के खिलाफ आइपीसी की धारा 506 के तहत दर्ज आपराधिक मामले को खारिज कर दिया, जो कि एक आरोपित के चाचा हैं, जो बच्चों के यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम (पोक्सो) के मामले में शामिल हैं।

पीठ ने नोट किया कि पीडता के द्वारा दी गई बयान में सुधार हुआ है, जो कि सीआरपीसी की धारा 161 (पुलिस अधिकारी के समक्ष बयान) और धारा 164 (मेजिस्ट्रेट के समक्ष बयान) के तहत दर्ज किया गया था।

पीठ ने 20 जनवरी के आदेश में कहा, अंत में एक वकील की पेशी, जब वह पेशेवर कर्तव्यों का निर्वहन कर रहा हो, न तो डराना-धमकाना माना जाएगा और यह एक मौलिक तथ्य है जो इस मामले में स्पष्ट रूप से अनुपस्थित है।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दर्ज स्पष्ट बयान से यह स्पष्ट होता है कि आपराधिक डराने-धमकाने का कोई इरादा प्रथम दृष्टया स्थापित नहीं हुआ है।