डिजिटलीकरण, पेपरलेस और वर्चुअल सुनवाई…..ई-कोर्ट के बजट में बढ़ोतरी से न्याय को मिलेगी नई रफ्तार
डिजिटलीकरण, पेपरलेस और वर्चुअल सुनवाई… ई-कोर्ट के बजट में बढ़ोतरी से न्याय को मिलेगी नई रफ्तार
- ई-कोर्ट के तीसरे चरण हेतु ₹1240 करोड़ का प्रावधान।
- कानूनी सहायता और नालसा बजट में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई।
- लंबित मुकदमों को कम करने और न्याय में तेजी।
नई दिल्ली। समय पर प्रभावी न्याय मिलना किसी भी लोकतांत्रिक समाज की रीढ़ है और यह तभी संभव है जब न्यायिक व्यवस्था को पर्याप्त बजटीय आवंटन मिले।
देश की अदालतों में लंबित पांच करोड़ मुकदमे जल्द खत्म हों, इसके लिए जरूरी है कि ढांचागत संसाधनों की बढ़ोतरी हो और न्याय में तकनीक का साथ बढ़े, जिसकी अब उम्मीद जगी है।
बजट में ई-कोर्ट के तीसरे चरण के लिए 1240 करोड़ का प्रविधान किया गया है जिससे न्याय को रफ्तार मिलेगी।
इसके अलावा लीगल एड डिफेंस काउंसिल सिस्टम के बजट में भी 100 करोड़ की वृद्धि हुई है। नेशलन लीगल सर्विस अथारिटी (नालसा) का बजट भी 25 प्रतिशत बढ़ाकर 250 करोड़ किया गया है।
ई-कोर्ट के तीसरे चरण हेतु ₹1240 करोड़ का प्रावधानशिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे विषयों के आगे न्याय अक्सर हाशिये पर रह जाता है। लेकिन सरकार ने अब इस ओर ध्यान देना शुरू किया है। अदालतों का डिजिटलीकरण, उन्हें पेपरलेस बनाना, वर्चुअल सुनवाई, आनलाइन फाइलिंग आदि ई-कोर्ट प्रोजेक्ट का हिस्सा हैं।
ई-कोर्ट प्रोजेक्ट का तीसरा चरण 2023 से शुरू हुआ है जिसे 7210 करोड़ के खर्च से लागू किया जा रहा है। इस बजट में वित्त मंत्री सीतारमण ने तीसरे चरण के लिए 1240 करोड़ रुपये का प्रविधान किया है।
लीगल एड डिफेंस काउंसिल स्कीम (एलएडीसीएस) का भी बजट बढ़ाया गया है। एलएडीसीएस एक सेंट्रल सेक्टर स्कीम है जिसे 2022 में शुरू किया गया था। यह स्कीम नेशनल लीगल सर्विस अथारिटी के जरिये आपराधिक मामलों में ट्रायल से लेकर अपील के स्तर तक इंस्टीट्यूशनल लीगल रिप्रेजेंटेशन देती है।
संसद में दिए गए उत्तर के मुताबिक जून, 2025 तक देशभर में 662 जिलों में एलएडीसी आफिस काम कर रहे हैं। अब तक लीगल एड डिफेंस काउंसिल को 8.69 लाख केस सौंपे गए हैं, जिनमें 5.85 लाख केस निपटा दिए गए हैं।
इसीलिए इस वर्ष बजट में एलएडीसीएस में 300 करोड़ का आवंटन किया गया है जो पिछली बार से 100 करोड़ रुपये अधिक है। हालांकि पिछले वर्ष के संशोधित अनुमान में भी बजट 300 करोड़ ही था।
इससे मांग के मुकाबले संसाधनों की पर्याप्तता को लेकर चिंताएं पैदा होती हैं। इस बार नालसा का बजट आवंटन भी 25 प्रतिशत बढ़ाकर 250 करोड़ किया गया है। यह आवंटन 2018-19 के बाद सबसे अधिक है। नालसा का बजट आवंटन 2023-24 से 200 करोड़ पर स्थिर था।
एलएडीसीएस और नालसा सहित कानूनी सहायता के लिए कुल बजट अब 550 करोड़ रुपये हो गया है जो न्याय में सुगमता की उम्मीद जगाता है।न्यायिक प्रणाली का सुचारू संचालन पुलिस, न्यायपालिका, जेल, कानूनी सहायता, फोरेंसिक और राज्य मानवाधिकार संस्थाओं को मिले बजट पर निर्भर करता है।
पिछले बजट में यह 998 करोड़ थे, जो संशोधित अनुमान में 20 प्रतिशत घटकर 798 करोड़ हो गया था।आपराधिक जांच और मुकदमों में फोरेंसिक क्षमता एक बड़ी बाधा बनी हुई है। फोरेंसिक क्षमताओं के आधुनिकीकरण के तहत आवंटन 500 करोड़ रुपये पर स्थिर रहा। इंटर-आपरेबल क्रिमनल जस्टिस सिस्टम का प्रविधान इंटीग्रेटेड सिस्टम पर खर्च के लिए है।
इसका मकसद पुलिस, कोर्ट, प्रोसीक्यूशन, जेल और फोरेंसिक एजेंसियों के बीच निर्बाध डाटा शेय¨रग को मुमकिन बनाना है। बजट में इस प्रोजेक्ट के लिए आवंटन 83 प्रतिशत बढ़ाकर 550 करोड़ रुपये किया गया है।
गरीब कैदियों की सहायता योजनागरीब कैदियों की सहायता योजना का बजट पांच करोड़ से घटाकर दो करोड़ रुपये कर दिया गया है। यह योजना मई, 2023 में शुरू हुई थी, ताकि उन कैदियों को वित्तीय सहायता देकर जेलों में भीड़भाड़ कम की जा सके, जो जमानत राशि या जुर्माने का भुगतान करने में असमर्थ हैं।
लेकिन, राज्य इस योजना के तहत धनराशि का प्रभावी ढंग से उपयोग करने में असफल रहे। न्यायपालिका, पुलिस, जेल आदि में संस्थागत संसाधनों का अध्ययन व रेटिंग करने वाली इंडिया
जस्टिस रिपोर्ट के को-फाउंडर एंड लीड वलय सिंह कहते हैं कि ई-कोर्ट के तीसरे चरण के बजट में वृद्धि से न्याय में आसानी होगी और इससे लंबित मुकदमों की संख्या भी घटेगी।
हालांकि सरकार को जजों की संख्या बढ़ाने में भी निवेश करना चाहिए। अभी जज एवं आबादी का अनुपात देखा जाए तो 10 लाख की आबादी पर सिर्फ 22 जज हैं। 1987 में विधि आयोग ने 10 लाख लोगों पर 50 जज की सिफारिश की थी।

