नई दिल्ली। केरल हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कानून, नियम और विनियम समाज में धार्मिक या सामुदायिक मतभेद बढ़ाने का माध्यम नहीं बनने चाहिए, बल्कि उन्हें सामाजिक एकता और सद्भाव को मजबूत करने का साधन होना चाहिए।

अदालत ने यह टिप्पणी पाथनमथिट्टा स्थित अदूर श्री पार्थसारथी मंदिर में दो ईसाई पादरियों के प्रवेश से जुड़ी याचिका खारिज करते हुए की।

यह याचिका पेशे से शिक्षक सानिल नारायणन नांबूथिरी ने दायर की थी, जिसमें वर्ष 2023 में दो ईसाई पादरियों के मंदिर प्रवेश को केरल हिंदू सार्वजनिक पूजा स्थल (प्रवेश अधिकार) अधिनियम, 1965 का उल्लंघन बताया गया था।

साथ ही त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड और मंदिर प्रशासन को गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगाने का निर्देश देने की मांग भी की गई थी।

केरल हाई कोर्ट ने दी मंजूरी

न्यायमूर्ति राजा विजयराघवन वी और केवी जयकुमार की पीठ ने कहा कि दोनों पादरियों को श्रीकृष्ण जयंती समारोह में तांत्रिकों द्वारा अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था, जो अधिकार के रूप में प्रवेश मांगने से भिन्न है।

पीठ ने तैत्तिरीय उपनिषद के मंत्र ‘मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव, अतिथि देवो भव’ का उल्लेख करते हुए अतिथि सम्मान की भारतीय परंपरा को रेखांकित किया।

अदालत ने कहा कि मूल अधिनियम का उद्देश्य हिंदुओं के विभिन्न संप्रदायों और वर्गों के बीच भेदभाव खत्म करना है, जबकि नियम 3(ए) में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक का प्रविधान अधिनियम के दायरे से परे प्रतीत होता है। न्यायालय ने दोहराया कि यदि अधिनियम और नियमों में असंगति हो तो मूल अधिनियम ही प्रभावी माना जाएगा।

पीठ ने राज्य सरकार को सुझाव दिया कि वह संबंधित हितधारकों से परामर्श कर नियम 3(ए) की समीक्षा करे, ताकि उसे विधायी मंशा और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप बनाया जा सके।

अदालत ने कहा कि बदलते समाज में कानूनों की व्याख्या समावेशिता, आपसी सम्मान और सह-अस्तित्व को बढ़ावा देने वाली होनी चाहिए।