याचिका को दी मंजूरी, विधायकों के खिलाफ 45 आपराधिक मामले वापस लेने की अर्जी !!!
सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल सरकार की याचिका को दी मंजूरी, विधायकों के खिलाफ 45 आपराधिक मामले वापस लेने की अर्जी
सुप्रीम कोर्ट हिमाचल प्रदेश सरकार की उस याचिका पर सुनवाई करेगा जिसमें सांसदों और विधायकों के खिलाफ 45 आपराधिक मामले वापस लेने की अनुमति मांगी गई है। हिमाचल हाईकोर्ट ने 65 में से केवल 15 मामलों को वापस लेने की मंजूरी दी थी।
- सुप्रीम कोर्ट 45 आपराधिक मामले वापसी पर सुनवाई करेगा।
- हिमाचल हाईकोर्ट ने केवल 15 मामलों को वापस लेने की अनुमति दी।
- अगली सुनवाई 16 मार्च को, राहत पर फैसला होगा।
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट हिमाचल प्रदेश सरकार की उस याचिका पर सुनवाई करने के लिए सहमत हो गया है, जिसमें सांसदों और विधायकों के विरुद्ध दर्ज 45 आपराधिक मामलों को वापस लेने की अनुमति मांगी गई है।
जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने इस संबंध में नोटिस जारी कर मामले की अगली सुनवाई 16 मार्च 2026 के लिए तय की है।
यह याचिका हिमाचल प्रदेश के हाईकोर्ट के 26 अप्रैल, 2024 के उस आदेश के खिलाफ दायर की गई है, जिसमें राज्य सरकार को सभी मामलों को वापस लेने की अनुमति नहीं दी गई थी।
सुक्खू सरकार ने दायर की याचिका
मामले की पृष्ठभूमि और हाईकोर्ट का निर्णय सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने प्रदेश के वर्तमान और पूर्व विधायकों/सांसदों के खिलाफ दर्ज कुल 65 मामलों को वापस लेने की सिफारिश की थी।
इनमें से अधिकांश मामले पिछले भाजपा शासन के दौरान कोविड महामारी के समय रैलियां आयोजित करने के कारण कांग्रेस कार्यकर्ताओं और नेताओं पर दर्ज किए गए थे।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में केवल 15 मामलों को वापस लेने की अनुमति दी थी। कोर्ट ने पाया कि लंबित याचिका के दौरान मुख्यमंत्री सुक्खू के खिलाफ कुल पांच मामले पहले ही निपट चुके हैं।
हालांकि, हाईकोर्ट ने गंभीर धाराओं जैसे सरकारी कर्मचारी पर हमला (आइपीसी 353), आपराधिक धमकी (आइपीसी 506) और आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत दर्ज मामलों को वापस लेने से इन्कार कर दिया था।
हाईकोर्ट ने 15 मामलों को लिया था वापस
अश्विनी कुमार उपाध्याय मामले का संदर्भ हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 321 के तहत अभियोजन वापस लेने के लिए सामान्यत: हाईकोर्ट की अनुमति की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन अश्विनी कुमार उपाध्याय बनाम भारत संघ (2020) मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद, जन प्रतिनिधियों के खिलाफ मामलों में ऐसी अनुमति अनिवार्य हो गई है।
बहरहाल, राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता वी. गिरि ने दलील दी कि मामलों को वापस लेने का निर्णय जनहित में लिया गया है। उन्होंने तर्क दिया कि यह कदम जिला मजिस्ट्रेटों, पुलिस अधीक्षकों और लोक अभियोजकों की स्वतंत्र राय और परामर्श के बाद उठाया गया है।
राजनीतिक बनाम जनहित का संतुलन सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार, लोक अभियोजक केवल साक्ष्यों की कमी के आधार पर ही नहीं, बल्कि न्याय के व्यापक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए भी मामला वापस ले सकते हैं।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस शक्ति का उपयोग राजनीतिक हितों के बजाय केवल नेक नियति और जनहित में किया जाना चाहिए। अब 16 मार्च को होने वाली सुनवाई में यह तय होगा कि क्या इन 45 मामलों में राहत दी जाएगी या नहीं।

