घूसखोर नहीं,पंडित सोई जो गाल बजावा !
घूसखोर नहीं,पंडित सोई जो गाल बजावा…
हमारे यहाँ लोग फुल्ली फुरसत में हैं. बस विवाद के लिए एक फुंतडू चाहिए. नया विवाद खडा होते ही पुराना विवाद, पुराने मु्द्दे स्वतः मर जाते हैं. जैसे आजकल “पंडित घूसखोर” विवाद में है. ये घूसखोर घूस खाए हो या न खाए हो लेकिन संसद में पीएम की गैरहाजरी, अमेरिका से ट्रेड डील और एपस्टीन फाइल भी खा गया. सरकार राहत महसूस कर रही है और घूसखोर पंडत के प्रति मन ही मन गदगदायमान है.
दरअसल’घूसखोर पंडत’ धारावाहिक या टीवी शो का नहीं बल्कि एक आगामी फिल्म/वेब-सीरीज को लेकर चल रहा बड़ा मामला है जिसे लेकर खबरों में बहुत तूल पकड़ा है.घूसखोर पंडत के विरोध में प्रदर्शनकारियों ने बेचारे मनोज बाजपेयी और नीरज पांडे के पुतले जलाने और मुंह पर कालिख पोतने की धमकी भी दे दी.
‘घूसखोर पंडत’ के प्रोड्यूसर नीरज पांडे को फिल्म कर्मियों की संस्था एफ डब्ल्यूआई सी ई ने भी बायकॉट की चेतावनी दे डाली और कहा कि फिल्म का टाइटल बदलो.यह विवाद “घूसखोर पंडत” नाम की आगामी फिल्म/वेब सीरीज को लेकर है, जिसमें अभिनेता मनोज बाजपेयी मुख्य भूमिका में हैं और नीरज पांडे इसके निर्माता/निर्देशक हैं — इसे नेटफ्लिक्स जैसे ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज़ किया जाना है.
देश के पंडितो और शिखाधारी बाम्हनों को फिल्म/सीरीज का ‘घूसखोर पंडत’ नाम काफी आपत्तिजनक लगा, क्योंकि यह “पंडित/पंडत” शब्द के साथ भ्रष्टाचार वाला अर्थ जोड़ता है — कुछ समूहों का दावा है कि इससे एक विशिष्ट समुदाय या उसकी छवि को ठेस पहुँचती है।
ब्राह्मण समाज और कुछ सवर्ण संगठन इस नाम और विषय को लेकर विरोध कर रहे हैं, प्रदर्शन कर रहे हैं. कोई थाने में रपट लिखा रहा है तो कोई अदालत में याचिकाएँ) भी दर्ज करा रहा है. सब फुर्सत में जो हैं.
विवाद बढ़ने के बाद नेटफ्लिक्स और प्रमोशनल सामग्री को हटा दिया गया है, लेकिन सोशल मीडिया पर बहस जारी है।
इस बवाल के बाद मनोज बाजपेयी और टीम का कहना है कि यह एक काल्पनिक कहानी पात्र है, और इसका इरादा किसी समुदाय को टार्गेट करना नहीं था; वे चाहते हैं लोग पूरा काम देखकर ही राय बनाएं।
मैं खुद बाम्हन हूँ, लोग मुझे पंडित भी कहते हैं किंतु मुझे घूसखोर पंडत शीर्षक से कोई शिकायत नहीं है. हमारे पुरखे हैं गोस्वामी तुलसीदास. स्वयं पंडित थे लेकिन उन्होने पंडितो के बारे में अनुभव के बाद लिखा-
मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा। पंडित सोइ जो गाल बजावा॥
मिथ्यारंभ दंभ रत जोई। ता कहुँ संत कहइ सब कोई.
भारत में पंडित हो या न हो घूसखोर तो सभी होते हैं (अपवादों को छोडकर).ताजा विवाद असल में आस्था बनाम आचरण का है। पंडित जी मंत्र पढ़ते हैं, भगवान बीच में होते हैं, और दक्षिणा की रेट-लिस्ट जेब में। यहीं से कहानी बिगड़ती है।पंडित के पास आजकल पूजा, हवन, श्राद्ध, कथा सबका फिक्स पैकेज होता है.“जितनी बड़ी श्रद्धा, उतनी मोटी दक्षिणा” वाला भावनात्मक ब्लैकमेल.सवाल पूछो तो जवाब:“शास्त्र में लिखा है.“बिना दक्षिणा फल नहीं मिलता”
पूजा से पहले भुगतान, बाद में प्रसाद.“भगवान तक सीधी लाइन, बीच में पंडित का काउंटर”लोग कहते हैं ये पूजा है या पेटीएम ट्रांजैक्शन?असली मुद्दा पंडित नहीं, प्रवृत्ति है.सभी पंडित घूसखोर नहीं—लेकिन जो हैं, उन्होंने पूरे पेशे की साख गिरा दी।लेकिन सच सबको कडवा लगता है. आजकल जबसे सनातन और हिंदुत्व का हल्ला बढा है तब से सच सुनने की आदत ही समाप्त हो गई. कभी पंडत आहत तो कभी पद्मावत को लेकिन राजपूत आहत. कभी दलित आहत तो कभी सिख आहत. यानि सच को छोड सब स्वीकार है.
हमारी फिल्में मनोरंजन के साथ सच भी परोसती हैं और झूठ भी, किंतु उद्देश्य किसी को आहत करना कभी नहीं रहा. ये सब 2014 में आजाद हुए लोगों की समस्या है. इससे पहले हर संबोधन जाति, धर्म, कर्म से जुडा था, सहज था अपमानित नही करता था. लेकिन अब पंडित को घूसखोर नहीं कह सकते ठाकुर को ठाकुर और मोदी को मोदी नहीं कह सकते. सच कहना अपराध जो है. अरे भाई घूसखोर पंडत को पहले देख तो लेते! पहले से ही लाठियां किसके कहने पर भांज रहे हो? मै घूसखोर पंडित के साथ खडा क्या हो गया लोग मुझे ही गरियाने लगे. भाई समाज में घूसखोर, हरामखोर ही नही आदमखोर भी मौजूद हैं. उन्हे पहचानिये. वे हर तरफ हैं. ऊपर भी नीचे भी. दायें भी, बायें भी. इनसे बचना मुश्किल है. हमारे घूसखोर अडानी तो अमेरिका तक में घूस दे आए. अब उनके ऊपर गिरफ्तारी की तलवार लटकी हुई है.

