एक साल बाद डकैत भेजकर फूलन ने जंगल में बुलाया था; वह सोई रही, मैं मां थी सो उसके सिर पर हाथ फेरती रही
फूलन देवी लोगों के लिए डकैत थी। मेरी तो बेटी है, जिसकी वजह से मेरा दुनिया में नाम है। वैसे फूलन की मां मूला देवी को कौन जानता? वह चक्की चलाया करती थी, रोटी सब्जी बनाती थी। घर के सारे काम करने के साथ खेती भी करती थी। उस वक्त वह 12 साल की थी। मेरे जेठ ने हमारी जमीन पर कब्जा कर लिया था। इसे लेकर मेरे पति और जेठ के बीच बहुत तू-तू…मैं-मैं हुई।
मेरे पांच बच्चे थे। पांच बेटियां और एक बेटा। सब सीधे थे, लेकिन इनमें से फूलन शुरू से ही अपने हक के लिए लड़ने वालों में से थी। मेरे जेठ ने मेरे पति को भगा दिया तो फूलन को यह बर्दाश्त नहीं हुआ। मेरे पति सीधे थे, ज्यादा बोल नहीं पाते थे। उनके साथ अन्याय हो रहा था। फूलन की बर्दाश्त से बाहर था कि उसके पिता के साथ यह सब हो रहा है। मेरे जेठ को फूलन का बोलना इतना अखरा कि उन्होंने ही उसकी ज़िंदगी बर्बाद कर दी।एक तो उत्तर प्रदेश, उस पर जालौन जिले का शेखपुर गुड़ा कालपी जैसा गांव, पुलिस ने भी कोई मदद नहीं की।
जेठ ने फूलन से बदला लेने के लिए उसे अगवा करवा दिया था
मेरे जेठ का डकैतों के साथ उठना-बैठना था। विक्रम मल्लाह उनके घर पहले से आया करता था। मेरे जेठ ने विक्रम मल्लाह से बात करके फूलन को उठवा दिया। हम अपनी बेटी को ढूंढते फिर रहे थे। कहीं उसका पता नहीं लग पा रहा था। हमने कई दिन न रोटी खाई न घर में चूल्हा जला। हम कोतवाली में अपने जेठ के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाने के लिए गए। पुलिस ने हमारी एक नहीं सुनी । पुलिस ने कहा कि तुम लोगों का आपसी रिश्तेदारी का मामला है, खुद ही निपटो।

एक साल तक फूलन घर नहीं लौटी, जब आई तो डकैत बन चुकी थी
हमारी बेटी भी गई और जमीन भी। हमने वह दिन बहुत कष्ट में काटे हैं। घर में गरीबी भी बहुत हुआ करती थी। कहीं से आटा मांगकर लाए, तो कहीं से सब्जी। एक साल तक तो फूलन का कुछ पता नहीं लगा, लेकिन ठीक एक साल बाद वह गांव में आई। मुझे पता लगा कि मेरी फूलन गांव के बाहर आई है। उससे विक्रम मल्लाह ने इस एक साल में इतने अपराध करवा लिए थे कि अब उसकी घर वापसी नहीं हो सकती थी। अब मेरी बेटी एक डकैत बन चुकी थी। वह वर्दी पहनती थी और बात करने के लिए अपने पास माइक रखती थी।
उस दिन पहली दफा फूलन गांव के बाहर घूमने आई थी और मुझसे बिना मिले चली गई। फूलन की वजह से हर दिन घर और गांव में पुलिस लगी रहती थी। हम परेशान हो गए। एक तो घर में खाने के लिए नहीं, ऊपर से दिन रात पुलिस। अब एक साल के बाद फूलन ने गांव में आना शुरू कर दिया था, लेकिन घर नहीं आती थी। वह गांव में बड़े-बड़े लोगों, प्रधानों, सरपंच वगैरह के यहां आती, खाना खाती और चली जाती।
मेरी बेटी किसी से डरती नहीं थी, लेकिन एक नरम दिल इंसान थी
मेरी बेटी बहुत निडर थी, किसी से डरती नहीं थी। वह पुलिस की मौजूदगी में मुक्ता देवी के मंदिर में घंटा चढ़ाकर चली जाती थी और पुलिस को पता तक नहीं लगता था। बेशक डकैत बन चुकी थी, लेकिन गांव में सब लोग उससे प्यार करते थे। उसे लोग गांव की बेटी मानते थे। गांव के लोगों को पुलिस मुखबिरी के लिए खूब लालच देती थी, लेकिन फूलन के बारे में कोई सच नहीं बताता था कि वह कब आई, किसके घर रही और अब फिर कब आएगी। मुझे यह सब लोगों से पता लगता था।
फूलन हक पसंद तो थी ही, साथ ही नरम दिल भी। जब फूलन के मामले में किसी भी मुखबिर की जानकारी गलत निकलती तो पुलिस उसे खूब मारती। अगली दफा गांव आने पर फूलन उसे खूब डांटती कि अबे तुम पुलिस को सही-सही बता दिया करो कि हम कहां हैं, किसके यहां आए, अगली दफा कब आएंगे। मल्लाह बिरादरी ने फूलन को डकैत होने के बावजूद आंच नहीं आने दी। एक-डेढ़ साल यह सब चलता रहा।

उस दिन मैं खुश तो बहुत थी, लेकिन डर भी लग रहा था
एक दिन एक डकैत हमारे घर आया और मुझसे कहने लगा कि फूलन ने जंगल में बुलाया है। मैं डेढ़ साल बाद अपनी बेटी से मिलने जा रही थी। खुश तो बहुत थी, लेकिन डर भी लग रहा था। फूलन ने मुझे आधी रात में मिलने बुलाया था। मुझे उस डकैत के साथ जाना था। जंगल में बड़ी-बड़ी और घनी झाड़ियां, सांप-बिच्छू से बहुत डर लग रहा था। समझ नहीं आ रहा था कि मेरी बिटिया कहां फंस गई है। जब मैंने उसे पहली दफा देखा तो वह लेटी हुई थी। उसने मेरे गाल पर हाथ फेरा। हम ज्यादा देर के लिए नहीं मिले। बस मैंने फूलन से इतना कहा कि बिटिया कभी किसी को बेमतलब न मारना, फूलन ने कहा कि हां माई, हम वचन देते हैं कि कभी किसी निर्दोष को नहीं मारेंगे। फिर यह सिलसिला चलने लगा।
फूलन मुझे कई दफा मिलने के लिए जंगल में बुला लिया करती थी। उसका कोई डकैत मुझे लेने आ जाता था। वह मेरे पास लेटी रहती थी, कुछ बात नहीं करती थी। बस मैं उसके सिर पर हाथ फेरा करती थी और वापस गांव आ जाती थी। वह गांव आती थी तो भी पता लग जाता था, क्योंकि वह माइक से बात करती थी। वह गांव का इतना ख्याल रखती थी कि किसी के घर में शादी हो, कथा हो उसे चिंता करने की जरूरत नहीं रहती थी। फूलन उसका घर भर देती थी।
जिस पर फूलन ने विश्वास किया उसने मार डाला
बेहमई कांड के बाद तो पुलिस ने हमारी नाक में दम कर दिया था। हमने बहुत झेला है, लेकिन उसने जो किया ठीक किया। मैंने बताया न कि वह बचपन से ही न्याय पसंद थी। फिर वह अपने साथ अन्याय कैसे सह लेती। यह सब चलता रहा। फिर हमें पता लगा कि फूलन आज तिहाड़ जेल से रिहा होने वाली है। हम सब दिल्ली गए। वह तिहाड़ जेल से रिहा हुई। गांव के मल्लाह समाज के लोगों ने उसे दिल्ली के गुलमोहर पार्क में कोठी लेकर दी। मैं अब फूलन के पास दिल्ली में रहती थी।
मैं देखती थी कि उसके पास पंजाब, हरियाणा, राजस्थान पता नहीं कहां-कहां से लोग मिलने आया करते थे। वहीं उसके पास नेता भी आने लगे। कई लोगों ने उसे अपनी पार्टी में आने के लिए कहा। वह मुलायम सिंह की पार्टी में शामिल हो गई। शेर सिंह राणा फूलन के पास पहले से आता था। मेरे सामने भी कई दफा आया। हमेशा दीदी.. दीदी.. दीदी बोलता, आगे-पीछे घूमा करता था। फूलन उसके साथ कई यात्राओं पर भी गई।
वह उमा नाम की औरत के साथ आता था। दोनों लोगों ने फूलन का बहुत भरोसा जीत लिया था। बस आगे की कहानी तो सब जानते हैं। जब हमें पता लगा तो हम दिल्ली के लिए निकल पड़े, लेकिन मुझे मेरी बेटी मरी हुई मिली। मैं बेसुध हो गई। न रोई, न चिल्लाई, गांव के लोगों की भीड़ जमा हो गई थी। चारों ओर रोना चिल्लाना चल रहा था। फूलन ने किसी उमेश सिंह से शादी कर ली थी। मेरी बेटी के पास काफी पैसा और प्रॉपर्टी थी, लेकिन सब उसका वह पति ले गया। उसने फूलन के मरने के बाद न तो हमसे वास्ता रखा और न हमें फूलन का कुछ दिया, जबकि सब फूलन का कमाया हुआ था।

बेटी सिर्फ समाजवादी थी, हमें जो दिया मुलायम सिंह ने दिया
यह घर देख रहे हैं न आप, सिर्फ बाहर से यह छत पक्की है, अंदर से देखो सारा कच्चा है। टूटा हुआ है। फूलन की चक्की भी रखी है अभी। इस घर का यह छोटा-सा हिस्सा भी तब पक्का करवाया था, जब फूलन को एक फिल्म की शूटिंग के विदेश से पैसे मिले थे। मैं जानती हूं कि मेरी बेटी के नाम पर लोग चंदा जमा कर रहे हैं। मूर्तियां बना रहे हैं और राजनीति कर रहे हैं। मेरी बेटी सिर्फ समाजवादी थी। हमें जो दिया मुलायम सिंह ने दिया।
अभी कालपी की सभा में अखिलेश आए थे। उन्होंने भीड़ में मुझे देखा तो मंच से आकर मेरे पांव छुए। अखिलेश हर चार महीने में मुझे मिलने के लिए बुला लिया करते हैं। कभी-कभार उन्होंने पैसे भी भेजे हैं। उसके अलावा तो किसी ने हमारी सुध नहीं ली। मैं यहां अकेली अपने दोहते के साथ रहती हूं। फूलन के अलावा मेरी एक और बेटी की मौत हो गई है। यह उसका ही बेटा है। हम दोनों यहां रहते हैं। सरकारी राशन मिलता है और कभी कुछ पैसे बेटा भेज देता है दिल्ली से। मुझे किसी पार्टी से कुछ चाहिए भी नहीं। मैं यहां अकेली, फटेहाल-गरीबी में जी रही हूं।
मेरी बेटी की बेटियां शादी लायक जवान हो रही हैं। मुझे उनके लिए मदद चाहिए और अलग-अलग पार्टियां मेरी बेटी का नाम लेकर उसे बदनाम कर रही हैं और उसके नाम पर चंदा उगाही कर रही हैं। मैं पहले भी कह चुकी हूं कि यह सब बंद करें। फूलन साइकिल से ही बनी है, बाकी लोग उसका नाम लेकर उसे बदनाम करना बंद करें। मैं अब फूलन के बारे में सोचती नहीं हूं। तकलीफ होती है। अब तो लगता है कि मैं भी जल्दी मर जाऊं।