फॉरेन के 10 में से 8 डॉक्टर इंडिया में फेल …..

मध्यप्रदेश में सिर्फ 137 डॉक्टर विदेशी डिग्रीधारी; फेल होने वाले भारत में नहीं कर पाते प्रैक्टिस…..

यूक्रेन पर रूस लगातार हमले कर रहा है। मेडिकल की पढ़ाई करने गए भारतीय स्टूडेंट्स यूक्रेन में फंसे हुए हैं। भारत से करीब 20 हजार छात्र गए थे। ऐसे में सवाल यह है कि भारतीय छात्र MBBS के लिए यूक्रेन क्यों जाते हैं? क्या विदेश से डिग्री लाने के बाद भारत में सभी प्रैक्टिस कर पाते हैं?

केंद्र सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा लोकसभा में दिए गए एक सवाल के जवाब में यह पता चला है कि विदेशों से डिग्री लेकर लौटने वाले 79 फीसदी डॉक्टर यहां नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) के फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट एग्जामिनेशन (FMGE) में फेल हो रहे हैं। स्क्रीनिंग टेस्ट में फेल होने वाले डिग्री धारी डॉक्टर भारत में मेडिकल प्रैक्टिस नहीं कर पाते हैं। यानी 21 फीसदी डॉक्टर ही पास हो पाते हैं।

हर साल स्क्रीनिंग टेस्ट में फेल हो रहे 70 फीसदी से ज्यादा विदेशी डॉक्टर

परीक्षा सत्र टेस्ट में शामिल हुए पास हुए डॉक्टर पास डॉक्टर्स का %
जून 2018 9274 2480 26.74%
दिसंबर 2018 12077 1969 16.30%
जून 2019 12394 2992 24.14%
दिसंबर 2019 15663 4444 28.37%
जून 2020 17198 1999 11.62%
दिसंबर 2020 18576 3928 21.14%
कुल 85722 17812 20.77%

एमपी में कितने विदेशी डिग्रीधारी डॉक्टरों को इलाज की मंजूरी

मप्र मेडिकल काउंसिल में दूसरे देशों से डिग्री लेकर आए 137 डॉक्टर रजिस्टर्ड हैं। इनमें रूस, फिलीपींस, अबुधाबी सहित दूसरे देशों से डॉक्टर बनकर आए हैं। एनएमसी के स्क्रीनिंग टेस्ट में पास होने के बाद इन डॉक्टरों का पंजीयन किया गया है।

रूस में 20 लाख में बन जाते हैं डॉक्टर

भारतीय छात्र बड़ी संख्या में डॉक्टर बनने के लिए विदेशों का रुख कर रहे हैं। यूक्रेन, रूस, किर्गिस्तान और कजाकिस्तान इन छात्रों का पसंदीदा जगह है। अब बड़ी संख्या में भारतीय छात्र फिलीपींस और बांग्लादेश का भी रुख कर रहे हैं। बांग्लादेश में डॉक्टर बनने का खर्च 25 से 40 लाख रुपए हैं। फिलीपींस में MBBS कोर्स का खर्च 35 लाख और रूस में 20 लाख रुपए है। उसमें हॉस्टल का खर्च भी शामिल है।

भारत में एक करोड़ फीस, नीट पास नहीं कर पाते स्टूडेंट

भारत में हर साल लाखों छात्र NEET की परीक्षा देते हैं। इनमें से कई कटऑफ लिस्ट में आ जाते हैं, लेकिन उन्हें सरकारी मेडिकल कॉलेज में जगह नहीं मिल पाती। देशभर में प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों और डीम्ड यूनिवर्सिटीज में 60 हजार सीटें हैं। इन संस्थानों में सालाना 18 लाख से 30 लाख रुपए तक फीस देनी पड़ती है। पांच साल के कोर्स के लिए यह राशि 90 लाख से 1.5 करोड़ रुपए तक होती है।

देश में मेडिकल की करीब एक लाख सीटों के लिए एक लाख 60 हजार से अधिक छात्र परीक्षा देते हैं। ऐसे छात्रों को डॉक्टर बनने का सपना पूरा करने के लिए निजी मेडिकल कॉलेजों में एक करोड़ रुपए से अधिक फीस चुकानी पड़ती है, लेकिन हर कोई इतनी फीस चुकाने में सक्षम नहीं होता है। उनका डॉक्टर बनने का सपना अधूरा ही रह जाता है। इस वजह से छात्र दूसरे देशों में डॉक्टर बनने जाते हैं।

इन वजहों से फेल हो जाते हैं स्टूडेंट्स

मध्यप्रदेश मेडिकल काउंसिल एवं रिटायर डायरेक्टर हेल्थ के पूर्व चेयरमैन डॉ. केके ठस्सू ने बताया कि यूक्रेन, रूस समेत कई अन्य देशों में मेडिकल कॉलेज के साथ हॉस्पिटल की अनिवार्यता नहीं है। इस कारण विदेश से मेडिकल की पढ़ाई करने वाले मेडिकल स्टूडेंट्स को पेशेंट ट्रीटमेंट का एक्सपोजर काफी कम मिलता है। स्टूडेंट्स को पेशेंट ट्रीटमेंट एक्स्पोजर सीखने के लिए दूसरे अस्पतालों में जाना पड़ता है।

वहीं विदेशी मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेने वाले भारतीय छात्रों को फर्स्ट ईयर में लैंग्वेज सीखना होती है, क्योंकि हर देश की मेडिकल की पढ़ाई अपने देश की भाषा में होती है। इस व्यवस्था के कारण विदेश से मेडिकल की पढ़ाई करने वाले भारतीय स्टूडेंट्स मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (नेशनल मेडिकल कमीशन) के स्क्रीनिंग टेस्ट में फेल हो जाते हैं।

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