आत्मविश्वास बचपन से ही हमारे अंदर, इसे संवारने की जरूरत है

भारतीयों या यूं कहिए दुनिया का एक बड़ा वर्ग काबिल होने के बावजूद सही मुकाम नहीं हासिल कर पाता। सफलता उनके दरवाजे पर आकर लौट जाती है, क्योंकि वे दरवाजा खोलने से डरते हैं कि पता नहीं कौन मिले। मैं हाल ही में गांव के कुछ स्कूली बच्चों से मिल रहा था, जो अन्यथा काफी तेज-तर्रार थे, मगर सवाल पूछे जाने पर दाएं-बाएं झांक रहे थे। उत्तर पता होने के बावजूद उत्तर देना नहीं चाह रहे थे कि कहीं गलत न हो जाए।

प्रश्न में अगर अंग्रेजी भाषा जोड़ दी जाए, फिर तो साधारण प्रश्न भी उनके लिए रॉकेट साइंस हो जाएगा। यह कोई अजूबी बात नहीं, बल्कि मुझे उन बच्चों में अपना ही अक्स नजर आया। मैंने बात बदलकर पूछा कि आप लोग क्रिकेट खेलते हैं? यह सामूहिक प्रश्न था, तो सभी एक साथ बोल पड़े- हां। मैंने तुरंत दूसरा प्रश्न पूछा कि भारतीय टीम के कप्तान कौन होंगे अब? सब ने मिलकर कहा- शिखर धवन।

मैंने शंकित होकर पूछा- रोहित शर्मा क्यों नहीं? वे कहने लगे कि रोहित की अनुपस्थिति में वेस्टइंडीज के खिलाफ शिखर धवन कप्तान होंगे। उनका बंद पिटारा खुल चुका था। अब वे प्रश्नकर्ता पर ही भारी पड़ रहे थे। इस साधारण उदाहरण में तीन चीजें दिखती हैं। पहली यह कि समूह में कॉन्फिडेंस बढ़ जाता है। दूसरी यह कि रुचिकर चीजों में पिटारे जल्दी खुलते हैं।

तीसरी यह कि आत्मविश्वास तो बचपन से ही हमारे अंदर है, जिसे नियमित संवारने की जरूरत है। अब इस मॉडल को वास्तविक दुनिया में विद्यार्थी, कर्मी या व्यवसायी कैसे उपयोग करें? पहला प्रयास यह हो कि एक सहायता समूह बने। हम आपस में भिन्न-भिन्न विषयों पर विमर्श करें, वाद-विवाद करें, तर्क दें। कॉरपोरेट दुनिया में इसे ब्रेन-स्टॉर्मिंग कहते हैं।

मुझे एक नाटक मंडली का स्मरण आता है, जो हर नाटक से पहले आपस में खूब लड़कर विवाद करती थी। मुझे शंका होती कि अभी ये हाल है, तो ये लोग मंच पर क्या करेंगे। लेकिन मंच पर पहुंचते ही सभी के आत्मविश्वास और संवाद निखरकर आ जाते और शानदार प्रस्तुतीकरण होता। मैं एक संकेत यह दे रहा हूं कि गांव-कस्बों में नाटक-मंडलियों या हारमोनियम-ढोल बजाते हुए भीड़ के समक्ष प्रस्तुति देना भी एक कॉन्फिडेंस एक्सरसाइज है।

दूसरी चीज है अपनी रुचि का कार्य करना, अथवा कार्य में रुचि लाना। मैं एक मितभाषी कंप्यूटर इंजीनियर को जानता हूं, जो अन्यथा चुप रहते हैं। मगर जैसे ही किसी प्रोग्रामिंग या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बात हुई, वह धाराप्रवाह बोलते चले जाते हैं। हम भी चौंक उठते हैं कि इनके बोल कैसे फूट पड़े। तीसरी चीज है कि हम स्वयं को संवारते रहें। अंग्रेजी अगर कठिन लगती है, तो उसकी सरल किताबें, अखबार, टीवी आदि सुनें।

हफ्ते में एक दिन अपने मित्रों के साथ किसी विषय पर अंग्रेजी में विमर्श करें। भाषा तो मामूली ढांचा है, मूल है ज्ञान। हमें नियमित अपने क्षेत्र में ज्ञान-वृद्धि करनी होगी। ज्ञान का अर्थ सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों से निकली एक सोच भी है। यह एक ऐसी निधि है जो सिर्फ हमारे पास है।

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