हिंसा हमारी संस्कृति नहीं ?

समाज: हिंसा हमारी संस्कृति नहीं, कानून हाथ में लेने पर किसी की स्वीकृति नहीं
यदि कोई आपराधिक गतिविधि में संलिप्त है, तो उसकी सूचना पुलिस को दी जा सकती है, पर उसकी हत्या का अधिकार किसी को नहीं है।

Society: Violence is not our culture, taking law into one hands is not acceptable to anyone

शिक्षक दिवस के दिन जब कुछ छात्र बधाई देने आए, तो मेरी आंखों के सामने बारहवीं कक्षा के बीस वर्षीय छात्र आर्यन मिश्रा की तस्वीर कौंध गई। गत 23 अगस्त को गो-तस्कर समझकर उसकी हत्या कर दी गई थी। एसपी अनिल यादव की टीम ने हत्या के मामले में कृष्ण, आदेश, सौरव और अनिल को गिरफ्तार कर लिया। प्रश्न कौंधा, गो-निगरानी कर्ताओं के दल को उसकी हत्या का अधिकार कहां से मिला। यह अनुदारता, क्रूरता और अराजकता कहां से आ रही है? यह कितने रूपों और कितने क्षेत्रों में भय और अशांति की वजह बन रही है।

आए दिन अखबारों में प्रकाशित हो रही ऐसी क्रूरतापूर्ण अमानवीय घटनाओं की खबरें नजर अंदाज नहीं की जा सकतीं। अपराधियों का कहना कि ‘हमें पता नहीं था कि आर्यन मिश्रा गो-तस्कर नहीं है।’ सवाल है कि यदि आर्यन मिश्रा गो-चोरी करके ले जा रहा होता, तब भी क्या किसी को उसकी हत्या का हक था? यदि कुछ गैर-कानूनी या गैर-सांस्कृतिक घटित होता दिख रहा था, तो वे पुलिस की मदद ले सकते थे। दंड देने का अधिकार तो पुलिस को भी नहीं है। पुलिस मुकदमा चलाकर उसे कोर्ट में तो पेश कर सकती है, परंतु उसे भी हत्या का अधिकार नहीं है।

लिंग, जातिगत या सांप्रदायिक हिंसा कोई नई बात नहीं है। सोशल मीडिया के दौर में अब इन बातों की जानकारी तेजी से फैलती है। इन दिनों पश्चिम बंगाल में प्रशिक्षु डॉक्टर की दुष्कर्म के बाद हत्या की घटना चर्चा के चरम पर है। हिंसक अनैतिक प्रवृत्ति का विस्तार शांति, प्रगति, सद्भाव और सामाजिक सौहार्द की भावना के लिए चिंताजनक है। दुखद है कि ऐसी घटनाओं का अंत नहीं दिखता। कानपुर की 24 वर्षीय बीबीए की छात्रा मॉडलिंग करती थी। पुलिस के अनुसार, इंस्टाग्राम पर विपिन नामक युवक से उसकी दोस्ती हुई। उसने भोजपुरी फिल्म में काम दिलाने का झांसा देकर विगत तीन सितंबर को एक होटल में एक अन्य विनय नामक युवक के साथ मॉडल के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया।

दो सितंबर को बागपत में आठवीं की छात्रा के साथ सामूहिक दुष्कर्म और नमाज पढ़वाने का मामला प्रकाश में आया। आरोपी रिजवान को कोर्ट में पेश कर जेल भेजा गया। मध्य प्रदेश के शहडोल में 31 अगस्त को एक दलित किशोर को निर्ममता से पीटा गया। सोशल मीडिया पर वीडियो अपलोड करके इसे सार्वजनिक भी किया गया, जिससे पता चलता है कि अपराधियों को कानून की कोई परवाह नहीं है। नतीजा एससी/एसटी ऐक्ट के तहत पांच लोग कानून की गिरफ्त में हैं।

सोशल मीडिया और जन जागरूकता के कारण ये घटनाएं प्रकाश में आ रही हैं। इनमें ज्यादातर घटनाएं दलितों व उनकी महिलाओं के उत्पीड़न की हैं, जिन्हें अपराधियों ने स्वयं इंटरनेट पर वीडियो अपलोड कर दर्शाया है। ऐसे बहुत से मामले हैं, जिनकी रिपोर्ट थानों-कचहरियों में दर्ज नहीं होतीं या जिनकी खबरें प्रकाशित नहीं होतीं। दो सितंबर को खबर आई कि मसौली थाना क्षेत्र के एक व्यक्ति ने एसपी से शिकायत की कि उसकी भांजी को 22 अगस्त को गांव के ही युवक ने कार में खींच कर अपहरण कर लिया। बंधक बनाकर लखनऊ, कानपुर और गाजियाबाद ले जाकर उसके साथ दुष्कर्म किया गया। कार्रवाई करने के बजाय पुलिसकर्मियों द्वारा उसे दस घंटे थाने में बिठाया गया।

तीन सितंबर को बहराइच जिले में एक ग्रामीण किशोरी के प्रेम प्रसंग से नाराज पिता ने उसके शरीर के छह टुकड़े कर दिए। बेटी के सिर को हाथ में लिए वह घर के बाहर एक घंटे तक बैठा रहा। 16 जुलाई की एक खबर में खतौली (मुजफ्फरनगर) गांव मढ़करीमपुर में अनुसूचित जाति के युवक अमृत कुमार की घुड़चढ़ी के दौरान दो पक्षों में मारपीट के बाद पथराव में दो युवक घायल हो गए। पुलिस  ने राजपूत समाज के आठ नामजद और आठ अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। 20 मई को मध्य प्रदेश के अशोक नगर जनपद में बुजुर्ग दंपती को खंभे से बांधकर पीटा और उन्हें जूतों की माला पहना दी।

ऐसी घटनाएं मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार समेत देश के अनेक हिस्सों में आए दिन होती रहती हैं। हिंसा व्यक्ति की गरिमा और आत्मसम्मान को क्षति पहुंचाती है। हिंसा और अनुदारता की प्रवृत्ति शहरों की अपेक्षा गांवों में अधिक पाई जा रही है। दुष्कर्म व हत्या जैसे मामले जब किन्हीं खास व्यक्तियों से ताल्लुक रखते हैं, तब ही काबिले-ऐतराज क्यों होते हैं? सामान्य लोगों के साथ तो यह सदियों से होता रहा है, तब क्यों नहीं नाराजगी दिखाई देती? ऐसी अमानवीय अनुदारता क्यों? हिंसा हमारी संस्कृति नहीं हो सकती।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में वरिष्ठ प्रोफेसर एवं पूर्व विभागाध्यक्ष हैं।)

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