मंदिरों से सरकारी कंट्रोल हटाना नहीं है इतना आसान ?
मंदिरों से सरकारी कंट्रोल हटाना नहीं है इतना आसान, ये हैं सबसे बड़ी चुनौतियां
ये पहली बार नहीं है जब भारत में मंदिरों को सरकारी निगरानी से मुक्त करने की मांग हो रही है. इस देश में दशकों से इसकी मांग की जा रही है.
तिरुपति बालाजी मंदिर के ‘प्रसादम्’ में मिलावट के मामले ने तूल पकड़ते ही एक बार फिर से मंदिरों के सरकारी नियंत्रण को लेकर नई बहस को जन्म दिया है. दरअसल बीते मंगलवार यानी 24 सितंबर 2024 को विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने देशभर के बड़े मंदिरों को सरकारी कंट्रोल से मुक्त करने का संकल्प लिया था. इसके साथ ही उन्होंने कहा कि वह इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए जल्द ही एक राष्ट्रव्यापी अभियान भी शुरू करेंगे.
इस मामले पर विहिप के संयुक्त महासचिव सुरेंद्र जैन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि अगर राज्य सरकारें मंदिरों को हिंदू समाज को नहीं सौंपती हैं, तो संगठन अदालत का भी दरवाजा खटखटाएगा.
हालांकि ये पहली बार नहीं है जब इस देश में मंदिरों को सरकारी निगरानी से मुक्त करने की मांग हो रही है. भारत में दशकों से इसकी मांग की जा रही है, लेकिन केंद्र सरकार इस मांग के उलट ज्यादा से ज्यादा मंदिरों को अपने कब्जे में ले रही है.
ऐसे में इस रिपोर्ट में विस्तार से जानते हैं कि मंदिरों को सरकारी कंट्रोल से हटाने का मुद्दा बार बार क्यों उठाया जाता रहा है और इसमें क्या दिक्कत आ रही है.
सबसे पहले समझिये आजादी के बाद कैसे आया सरकार के हाथ में नियंत्रण
भारत साल 1947 में आजाद हुआ और 1950 में हमें अपना संविधान मिला. इस संविधान में अनुच्छेद 26 दिया गया था. जिसके तरह सरकार किसी भी धर्म की धार्मिक प्रथा में हस्तक्षेप नहीं कर सकती. इस अनुच्छेद के बाद देश के हिंदूओं ने अपना मंदिर वापस ले लिया. इसके बाद तत्कालीन कांग्रेस सरकार हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम 1951 लेकर आई.
इस अधिनियम के तहत
- राज्य कानून बना सकता है और मंदिरों के प्रबंधन को अपने कंट्रोल में कर सकता है, इसमें मस्जिद और चर्च शामिल नहीं होंगे.
- राज्य या केंद्र सरकार किसी भी धर्म के किसी भी प्रशासक को मंदिर का अध्यक्ष या प्रबंधक नियुक्त कर सकती है.
- मंदिर के पैसों का सरकार किसी भी उद्देश्य के लिए इस्तेमाल कर सकती है
- सरकार मंदिर की जमीन बेच सकती है और उस पैसे का किसी भी उद्देश्य से उपयोग कर सकती है.
- सरकार मंदिर की परंपराओं में हस्तक्षेप कर सकती है.
सबसे पहले हुआ तमिलनाडु में इस्तेमाल
हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम 1951 का इस्तेमाल सबसे पहले तमिलनाडु में किया गया. उस वक्त इस राज्य में कांग्रेस की सरकार थी. तमिलनाडु में धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम 1959 लाया गया और राज्य सरकार ने यहां की सभी 35,000 मंदिरों को अपने कब्जे में ले लिया. तमिलनाडु के बाद राजस्थान, आंध्र प्रदेश जैसे कई राज्यों ने अपने यहां इस तरह के नियम लाए और मंदिरों को अपने अधिकार में कर लिया. वर्तमान में भारत में कुल 9 लाख से ज्यादा मंदिर है. वहीं भारत के 15 राज्यों ने लगभग 4 लाख मंदिरों पर सरकार का नियंत्रण है.
मंदिरों से सरकारी कंट्रोल से हटाने में कहां दिक्कत आ रही है, 5 प्वाइंट
1. धार्मिक और राजनीतिक हित
पटना यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर आलोक मिश्र ने इस सवाल के जवाब में बताया कि भारत में चाहे लोकसभा चुनाव हो या विधानसभा चुनाव अलग-अलग पॉलिटिकल पार्टियां अपने-अपने समुदायों के समर्थन के लिए धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों का इस्तेमाल करती रही हैं. यही कारण है कि मंदिरों का सरकारी नियंत्रण हटाने का मुद्दा अक्सर एक वोट बैंक के रूप में देखा जाता है.
जब सरकार किसी विशेष समुदाय या धर्म के मंदिरों से नियंत्रण हटाने की कोशिश करती है, तो विरोधी दल इसे अपने लाभ के लिए भुनाने की कोशिश कर सकते हैं. ऐसे में, वे यह कह सकते हैं कि सरकार उस समुदाय की धार्मिक भावनाओं का सम्मान नहीं कर रही है. इससे समुदाय के लोग उस पार्टी के पक्ष में खड़े हो सकते हैं, जो उनके धार्मिक हितों की रक्षा करने का वादा करती है. इसके अलावा भारत में यह एक सामान्य प्रथा है, जहां चुनावों के दौरान धर्म और धार्मिक स्थानों का राजनीतिकरण किया जाता है.
वहीं जब राजनीतिक दल मंदिरों के नियंत्रण पर बात करते हैं, तो वे उस समुदाय की धार्मिक भावनाओं को उभारने करने का प्रयास करते हैं. यह रणनीति अक्सर चुनावी लाभ के लिए होती है. उदाहरण के लिए, यदि किसी दल ने एक विशेष धार्मिक समूह के मंदिरों का समर्थन किया है, तो वह समुदाय उस दल के प्रति वफादार हो सकता है.
धार्मिक राजनीति का एक और पहलू यह है कि यह धार्मिक पहचान को सशक्त बनाता है. लोग अपनी धार्मिक पहचान के आधार पर एकजुट होते हैं, जिससे राजनीतिक दलों को अपने पक्ष में मतदान करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है.
2. प्रशासनिक मुद्दे
प्रोफेसर आलोक मिश्र आगे कहते हैं, ‘मंदिरों का प्रबंधन एक जटिल कार्य है, जिसमें धन, संपत्ति, मानव संसाधन, और अन्य संसाधनों का पूरा इस्तेमाल शामिल है. सरकारी नियंत्रण के तहत, मंदिरों के पास प्रशासनिक ढांचे और नियामक तंत्र होते हैं, जो सुनिश्चित करते हैं कि मंदिर में आने वाले धन का सही उपयोग हो. लेकिन सरकारी नियंत्रण हटाने से यह अनिश्चितता पैदा हो सकती है कि इन संसाधनों का प्रबंधन कौन करेगा. इसके अलावा, कुछ मंदिरों में पहले से ही वित्तीय अनियमितताओं के मामले हैं, और बिना सरकारी निगरानी के, ये समस्याएं और बढ़ सकती हैं. इससे श्रद्धालुओं का विश्वास भी कम हो सकता है.’
3. समुदाय की चिंता
स्थानीय समुदायों के लिए मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं होते, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन का केंद्र भी होता है. मंदिरों में आयोजित समारोह, त्योहार, और अन्य धार्मिक गतिविधियां उस समुदाय के लिए काफी महत्वपूर्ण होते हैं. अगर सरकार अपना नियंत्रण हटा लेती है, तो लोगों को चिंता हो सकती है कि ये गतिविधियां प्रभावित होंगी. इसके अलावा, विभिन्न धार्मिक समूहों में प्रतिस्पर्धा भी हो सकती है, जो मंदिरों के नियंत्रण को लेकर असहमति पैदा कर सकती है.
4. कानूनी जटिलताएं
भारत में मंदिरों के प्रबंधन के लिए कई कानून और नियम हैं, इनमें मंदिर ट्रस्ट अधिनियम, हिंदू धार्मिक एवं चैरिटेबल एंडोमेंट्स अधिनियम (HRCE), भारतीय धर्मार्थ ट्रस्ट अधिनियम शामिल है. इसके अलावा हर राज्य में अपने विशेष मंदिर प्रबंधन कानून भी होते हैं, जैसे- तमिलनाडु में तमिलनाडु हिंदू धार्मिक और चैरिटेबल एंडोमेंट्स अधिनियम, यूपी में उत्तर प्रदेश मंदिर अधिनियम, कर्नाटक हिंदू धार्मिक संस्थान और धर्मार्थ ट्रस्ट अधिनियम.
अगर सरकार भारत के मंदिरों से नियंत्रण हटाना चाहती है, तो उन्हें इन कानूनों में संशोधन करना होगा, जो एक जटिल प्रक्रिया है. इसके अलावा, इस बदलाव का कानूनी विवादों में पड़ने का खतरा भी होता है, जो मंदिरों के संचालन को और प्रभावित कर सकता है.
भारत में मंदिरों के प्रबंधन को लेकर कुछ प्रमुख कानूनों के बारे में जानिये
- मंदिर ट्रस्ट अधिनियम- इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य मंदिरों के ट्रस्टों के गठन और प्रबंधन को सुनिश्चित करना है. इसमें मंदिरों की संपत्तियों का प्रबंधन, धन के उपयोग, और ट्रस्ट के सदस्यों की भूमिका निर्धारित की गई है.
- हिंदू धार्मिक एवं चैरिटेबल एंडोमेंट्स अधिनियम (HRCE)- यह अधिनियम मुख्य रूप से दक्षिण भारतीय राज्यों में लागू है और मंदिरों के प्रशासन के लिए सरकार की भूमिका को स्पष्ट करता है. इस अधिनियम के अंतर्गत मंदिरों की संपत्तियों का प्रबंधन, दान, और धार्मिक गतिविधियों का विनियमन किया जाता है.
- भारतीय धर्मार्थ ट्रस्ट अधिनियम- यह अधिनियम धर्मार्थ ट्रस्टों के प्रबंधन के लिए नियम और दिशा-निर्देश प्रदान करता है. इसमें ट्रस्ट के गठन, प्रबंधन, और वित्तीय लेखा-जोखा की प्रक्रिया निर्धारित की गई है.
इसके अलावा भारतीय संविधान की धारा 25 सभी व्यक्तियों को अपने धर्म का पालन करने का अधिकार देती है, जो मंदिरों के प्रबंधन को प्रभावित करती है. संविधान का अनुच्छेद 26 भी धार्मिक संस्थानों के प्रबंधन के अधिकारों की रक्षा करता है, जैसे कि धार्मिक स्थानों का निर्माण और प्रबंधन. इन कानून के अलावा भी अन्य सामान्य कानून है जैसे भारतीय दंड संहिता और भारतीय अनुबंध अधिनियम, जो मंदिरों के प्रबंधन से जुड़े अनुबंधों और आपराधिक मामलों को भी नियंत्रित करते हैं.
5. सामाजिक असंतुलन
मंदिरों का संचालन अक्सर स्थानीय सामाजिक ढांचे का हिस्सा होता है. इसके अचानक परिवर्तन से सामाजिक असंतुलन पैदा हो सकता है, जिससे समाज में तनाव बढ़ सकता है. इसके अलावा कई लोग मानते हैं कि सरकारी नियंत्रण से धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं की रक्षा होती है. इसे हटाने से यह खतरे में पड़ सकता है.
पहले भी हो चुका है मंदिर नियंत्रण में स्वतंत्रता की मांग
भारत में मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण का इतिहास अंग्रेजों के जमाने से जाकर जुड़ता है. यही मांग आजादी के बाद भी जारी रही और सरकार ने बकायदा कानून बनाकर मंदिरों पर नियंत्रण जारी रखा. तमिलनाडु की बात की जाए तो इस राज्य में आज भी हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ दान बंदोबस्त कानून (HR&CE Act), 1959 के तहत लगभग 45 हजार मंदिरों को सरकारी नियंत्रण में संचालित किया जा रहा है. इन मंदिरों में 17 जैन मंदिर भी शामिल हैं.
हालांकि नियंत्रण के स्वतंत्रता को लेकर साधु-संतों से लेकर सामाजिक-धार्मिक संगठन तक आवाज उठाते रहे हैं. दशकों पुराने मंदिर मुक्ति अभियान के तहत सामाजिक स्तर पर चौतरफा काम हो रहा है. विश्व हिंदू परिषद से लेकर संतों के कई संगठन इस आंदोलन को आगे बढ़ा रहे हैं.
मंदिरों पर नियंत्रण अनुचित: सुप्रीम कोर्ट
हिंदू मंदिरों पर सरकारी कब्जे को सुप्रीम कोर्ट भी कई बार अनुचित ठहरा चुका है. साल 2019 के तत्कालीन जज जस्टिस एसए बोबडे ने पुरी के जगन्नाथ मंदिर मामले में कहा था, ‘मैं नहीं समझ पाता कि सरकारी अफसरों को क्यों मंदिर का संचालन करना चाहिए?’ जज ने इस टिप्पणी के दौरान तमिलनाडु का उदाहरण भी दिया जिसमें सरकारी नियंत्रण के दौरान वहां अनमोल मूर्तियों की चोरी की अनेक घटनाएं होती रही हैं.
उस वक्त जस्टिस बोबडे ने ये भी साफ कहा था कि ऐसी स्थितियों का कारण भक्तों के पास अपने मंदिरों को चलाने का अधिकार न होना है. साल 2019 से पहले भी 2014 में एससी ने तमिलनाडु के प्रसिद्ध नटराज मंदिर पर सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने का आदेश दिया था.
किन राज्यों में सरकार का सीमित है नियंत्रण
भारत में कई राज्य हैं जहां मंदिरों का प्रबंधन पर सरकारी नियंत्रण सीमित है. ये राज्य आमतौर पर धार्मिक संस्थानों को स्वायत्तता प्रदान करते हैं. कुछ प्रमुख राज्यों में शामिल हैं.
- गोवा- गोवा में मंदिरों का प्रबंधन मुख्यतः स्थानीय मंदिर ट्रस्टों और समितियों द्वारा किया जाता है. सरकार का नियंत्रण सीमित होता है.
- हिमाचल प्रदेश- हिमाचल प्रदेश में मंदिरों का प्रबंधन स्थानीय समितियों और ट्रस्टों द्वारा किया जाता है, और सरकार का हस्तक्षेप अपेक्षाकृत कम होता है.
- झारखंड- झारखंड में भी कई मंदिरों का प्रबंधन स्थानीय समुदायों द्वारा किया जाता है, और सरकारी नियंत्रण सीमित होता है.
- मध्य प्रदेश- मध्य प्रदेश में कई मंदिर ऐसे हैं जहां सरकार का सीधा नियंत्रण नहीं होता, और स्थानीय प्रबंधन समितियां काम करती हैं.
- राजस्थान- राजस्थान में कुछ मंदिरों का प्रबंधन धार्मिक ट्रस्टों द्वारा किया जाता है, जबकि सरकारी हस्तक्षेप कम होता है.
- बिहार- बिहार में भी कुछ मंदिरों का प्रबंधन स्थानीय ट्रस्टों और धार्मिक संगठनों द्वारा किया जाता है, जहाँ सरकार का नियंत्रण सीमित होता है.
निष्कर्ष