भारत में कभी पटाखों पर बैन तो कभी पर्यावरण का ज्ञान, हरेक हिंदू त्योहार ही क्यों गुजरे सूक्ष्मदर्शी के नीचे?
भारत में कभी पटाखों पर बैन तो कभी पर्यावरण का ज्ञान, हरेक हिंदू त्योहार ही क्यों गुजरे सूक्ष्मदर्शी के नीचे?
दीपावली के बारे में हम रंगों का, रोशनी का, भाईचारे का इत्यादि पर्व इतना सुन चुके हैं कि अब लगभग यह भूलने की स्थिति में आ गए हैं कि यह दरअसल भगवान राम के घर लौट आने की भी खुशी है. वही भगवान राम, जिनके जन्मस्थल यानी अयोध्या में लगभग 500वर्षों के बाद उनके महल में रोशनी हुई, धूमधड़ाका हुआ और एक नया रिकॉर्ड भी बना. अयोध्या में दीपावली के शुभ अवसर पर जो दीपोत्सव हुआ, लाखों की संख्या में दिए जले, उसके लिए उत्तर प्रदेश सरकार को दो गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड्स के रिकॉर्ड मिले. वैसे, यह जान-बूझकर किया गया है या फिर अनजाने में हुआ है, लेकिन एक-एक कर हिंदू त्योंहारों से उनकी ‘धार्मिकता’ को कुछ इस तरह निकाला गया है कि दीपावली मनाता कोई कॉलेज उसे जश्न-ए-आभा बना देता है, तो कोई जश्न-ए-चरागां कर देता है. उसके प्रचार-अभियानों में जो लोग दिखते हैं, वे हिंदू प्रतीकों से विच्छिन्न होते हैं. पुरुष न तो टीका लगाए होते हैं, धोती का सवाल ही नहीं, शिखा (चोटी) तो कालबाह्य (आउटडेटेड) ही हो चुकी है और महिलाएं भी साड़ी तो पहनती हैं, पर मंगलसूत्र, सिंदूर और बिंदी से उनको भी जुदा दिखाया जाता है. इसकी वजह पर सोचना तो एक समाजशास्त्रीय मुद्दा है.
त्योहार चाहिए, धर्म नहीं
दरअसल, 1200 वर्षों की गुलामी ने हिंदुओं के मन में इतनी हीनता भर दी है और बाकी बिबलोलेटरस (एक किताब पर आधारित मजहब या रिलिजन) पंथों का वर्तमान दुनिया में कुछ इस तरह का प्रभाव है कि “धार्मिकता”, “सांस्कृतिक” तत्त्वों और “अध्यात्म” को अलग करने की चूल ने, “स्टेट” (यानी राज्य) को “रिलिजन” से अलग रखना समझ में आता है, क्योंकि ईसाई पांथिक देशों में स्टेट और रिलिजन के बीच हमेशा टकराव की स्थिति रही, मुसलमान मजहबी देशों में तो यही गुनाहे-अजीम (सबसे बड़ा पाप) है कि आप मजहब से इतर कुछ सोचें. पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता को ढोते हुए हम यही भूल गए कि पर्याप्त बहस के बाद भी हमारे संविधान-निर्माताओं ने क्यों नहीं “धर्मनिरपेक्षता” को संविधान की प्रस्तावना में या किसी भी अध्याय में जोड़ा, जिसे जोड़ने के लिए श्रीमती गांधी को 1976 में आपातकाल का सहारा लेना पड़ा? अभी देश की सबसे बड़ी पंचायत यानी न्याायलय सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा कि “धर्मनिरपेक्षता” भारतीय संविधान का मूल है.
बिल्कुल है, योर लॉर्डशिप! केवल इसलिए है कि इस देश का बहुसंख्यक हिंदू है और ऐसा पूरी दुनिया में एक ही जगह है. वह जगह भी सिकुड़ती जा रही है. वियनाम गया, इंडोनेशिया गया, अफगानिस्तान गया, पाकिस्तान गया, बांग्लादेश गया, कश्मीर आधा चला गया और बाकी कई जगहों पर उपद्रव चल रहा है. संविधान इस देश की आत्मा में गुंथा हुआ है, क्योंकि हिंदू कभी भी किसी को धर्म-परिवर्तित करने की सोचता ही नहीं है. वह विचार ही यहां नहीं है. तो, जब ईसाई, इस्लामिक या कोई भी एक किताब पर आधारित पंथ, जिसका सबसे पवित्र कर्तव्य ही जेहाद है, क्रूसेड है, काफिरों को, नॉन-बिलीवर्स को अपने खेमे में लाना सबसे बड़ी सुन्नत है, सबसे बड़ा मजहबी काम है, तो फिर दोनों बातों की तुलना हो ही कैसे सकती है?
कभी पटाखे, कभी पानी और पर्यावरण तो…
जैसे ही दीपावली आती है, वैसे ही पटाखों का शोर होने लगता है. वहीं, धीरे से “धार्मिकता” और “संस्कृति” का पत्ता फेंका जाता है- अरे, वह धार्मिक कर्तव्य थोड़े न है, वह परंपरा (रिचुअल) तो है नहीं, पटाखों पर मान जाओ. इसके बाद आप जैसे ही पटाखों पर मानेंगे, अगली बार वो दीपकों में जल रहे तेल की बात करेंगे और फिर बिजली की बर्बादी पर आ जाएंगे और आखिरकार दीवाली बची रहेगी, थोड़े से चॉकलेट का लेन-देन, नए कपड़ों या सामान की खरीदारी और हैपी दीवाली का राग आलापते रहना. दीवाली को रामकथा से अलग करेंगे तो आपका सफर उसी मुकाम तक का होगा. दीपावली पांच दिनों का त्योहार है, फुल पैकेज- धनतेरस से लेकर दीपावली के अगले दिन तक, भाई-दूज तक. इसके ठीक पहले दुर्गापूजा और उसके पहले महालया, जिसमें पितरों को बुलाते हैं. बुला तो लिया, भेजेंगे कैसे….इसलिए होती है आतिशबाजी. वह हम अपने पितरों को रास्ता दिखाते हैं. माननीय कोर्ट को यदि यह पता नहीं, तो पता होना चाहिए और उनको हिंदुओं के पारंपरिक मामलों में नहीं बोलना चाहिए.
दरअसल, हिंदू त्योहार अर्थव्यवस्था को बड़ी गति देते हैं. इसलिए, हिंदू त्योहार चाहिए, उनकी धार्मिकता नहीं. ये आजकल बड़ा चला है कि फलां तो लोकपर्व है, उसमें पुरोहित की जरूरत नहीं, लोकाचार की आवश्यकता नहीं और सबसे बड़ा वाला- मैं धार्मिक नहीं हूं, आध्यात्मिक हूं.
दरअसल, आप महामूर्ख हैं
चूंकि आपको अपने धर्म की कोई जानकारी नहीं है, इसलिए आप किसी से भी हामी भर लेते हैं और यह संचार के सभी साधनों से लेकर सामान्य आचार-विचार में होता है. तभी तो फिल्म “केरल फाइल्स” में जब वह दृश्य आता है कि एक मुसलमान पात्र दूसरे हिंदू पात्र से पूछती है कि क्या वे लोग खाने के पहले ईश्वर का आभार नहीं मानते, मंत्र नहीं पढ़ते, तो हिंदू पात्र चुप रहती है. इसलिए, क्योंकि फिल्म के लेखक को पता नहीं था कि हिंदू, “सहनाववतु, सह नौ भुनक्तु, सह वीर्यं करवावहे…तेजस्विनावधीतमस्तु….” का पाठ कर भोजन ग्रहण करते हैं. कभी आप सुनते होंगे कि दुर्गापूजा और नवरात्र में अलगाव है, कभी दुर्गापूजा को खींचकर बंगाल तक और नवरात्र को बिहार, उड़ीसा, झारखंड तक महदूद किया जाएगा, लेकिन मैसूर और बस्तर में हजारों वर्ष से हो रहा मंचन आपको नहीं बताया जाएगा. अभी मुंबई में एक सोसायटी में दीपक जलाने पर दो मुसलमानों ने आपत्ति कर दी, क्योंकि वह उनकी भावनाओं को आहत कर रहा था. क्या सचमुच?
एक वीडियो इस बीच बहुत वायरल हो रहा है, जिसमें एक हिंदू बुजुर्ग मुंबई में किसी अस्पताल के आगे लोगों को मुफ्त में खाना दे रहे हैं. जो खाना लेनेवाले हैं, उनसे वह जय श्रीराम बोलने को कहते हैं. एक बुर्काधारी मोहतरमा उनसे इस बात पर बहसतलब हैं कि वह ऐसा क्यों कर रहे हैे? उसके बाद यह प्रश्न राष्ट्रीय बहस में तब्दील हो जाता है. क्या सचमुच हम मुसलमानों को इतना हीन, इतना पीड़ित, इतना कमजोर बताना चाहते हैं? जिसका खाना है, वह अगर लोगों को उसे जय श्रीराम बोलकर दे रहा है, तो आप कैसे रोक सकते हैं, यह सवाल तो पूछा जाएगा. लोग यह सवाल तो उन सेलिब्रिटी से जरूर पूछेंगे जिनको दीपावली में अपना दमा याद रहता है, लेकिन कुछ ही महीने बाद अपनी ही शादी में वह घंटों की आतिशबाजी रोकती भी नहीं और मौज भी लेती हैं. लोग यह सवाल तो पूछेंगे ही न कि चलिए साब, दीपावली पर पर्यावरण, होली पर पानी की बर्बादी, सरस्वती पूजा पर सही नायिकाओं को चुनो, दुर्गापूजा पर -ये तो सांस्कृतिक है-, इत्यादि के बहाने सारे हमले हिंदू धर्म पर ही क्यों होते हैं? एक बार, केवल एक बार किसी भी कोर्ट से लेकर बुद्धिजीवी की जुबान उन लाखों जानवरों के कटने पर पर्यावरण की चिंता क्यों नहीं करती, जिनको कुर्बानी के नाम पर एक ही दिन मार दिया जाता है.
दिक्कत भी दरअसल यही है. लोगों ने अब सवाल पूछने शुरू कर दिये हैं. लोग अब वक्फ पर भी सवाल पूछ रहे हैं, दीपावली के फरमान पर भी. पहले हिंदू सिर झुकाकर हरेक डिक्टैट को मान लेता था, अब उसकी नकार ने ही संघर्ष को पैदा किया है.
[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं.यह ज़रूरी नहीं है कि ….न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.