दिल्ली

सरेंडर या एनकाउंटर’ पॉलिसी से डरे नक्सली, 2100 का सरेंडर; 477 ढेर?

बसवाराजू से हिड़मा तक, 2 अफसरों से हारा नक्सलवाद
सरेंडर या एनकाउंटर’ पॉलिसी से डरे नक्सली, 2100 का सरेंडर; 477 ढेर

21 मई, 2025 की सुबह बसवाराजू और 18 नवंबर की सुबह माड़वी हिड़मा, नक्सलियों के दो सबसे बड़े लीडर मारे गए। इन दोनों एनकाउंटर के बाद दावा किया जा रहा है कि नक्सलवाद अब खात्मे की तरफ है।

नक्सलियों के खिलाफ चल रहे इस ऑपरेशन में पिछले 10 साल काफी अहम रहे। छत्तीसगढ़ के दो अफसरों ने नक्सलियों के खिलाफ जारी इस ऑपरेशन की दिशा बदल दी। पहले हैं रिटायर्ड DGP डीएम अवस्थी, जो 2015 में नक्सल डीजी बने। दूसरे बस्तर रेंज के IG पी. सुंदरराज, जो 2016 से लगातार नक्सल ऑपरेशन से जुड़े हैं। पहले ने जमीन तैयार की, दूसरे ने एक्शन लिया।

आखिर ये सब कैसे हुआ, दैनिक भास्कर ने छत्तीसगढ़ सरकार में मौजूद अपने सोर्स, डीएम अवस्थी और पी सुंदरराज से बात करके नक्सलियों के सरेंडर के पीछे की रणनीति समझी।

  

सरेंडर या एनकाउंटर, नक्सलियों के सामने दो ही ऑप्शन

17 अक्टूबर 2025 को छत्तीसगढ़ के बड़े नक्सली लीडर टी वासुदेव राव उर्फ रूपेश ने सरेंडर कर दिया। रूपेश पर 1 करोड़ रुपए का इनाम था। उसके साथ 140 और नक्सलियों ने भी सरेंडर किया। हालांकि ये सब इतना सीधा नहीं, जितना दिखता है।

दैनिक भास्कर के भरोसेमंद सोर्स के मुताबिक सरेंडर से दो दिन पहले बस्तर रेंज के IG पी सुंदरराज रूपेश से मिले थे। करीब दो घंटे बात हुई। सोर्स का ये भी दावा है कि इसी मुलाकात के दौरान गृह मंत्री अमित शाह ने भी रूपेश से फोन पर बात की। नक्सली लीडर ने कुछ शर्तें भी रखीं, जिसके बाद सरेंडर की प्रोसेस हुई।

रूपेश के सरेंडर से दो दिन पहले 15 अक्टूबर को मोजुल्ला वेणुगोपाल उर्फ भूपति ने गढ़चिरौली में सरेंडर किया था। उस पर छत्तीसगढ़ सरकार ने 1 करोड़ का इनाम रखा था। दावा है कि रूपेश और भूपति कॉन्टैक्ट में थे और सरेंडर का फैसला दोनों ने मिलकर लिया था।

रूपेश और भूपति के अलावा पिछले करीब दो साल में 2100 नक्सली सरेंडर कर चुके हैं। इनमें सेंट्रल कमेटी के 6 मेंबर थे। इसी दौरान 477 नक्सली एनकाउंटर में ढेर कर दिए गए।

नक्सल लीडर रूपेश के सरेंडर की इनसाइड स्टोरी

एंटी नक्सल ऑपरेशन से जुड़े एक सोर्स ने हमें रूपेश के सरेंडर की पूरी कहानी सुनाई। उन्होंने बताया, ‘सरेंडर से दो दिन पहले रूपेश अपने गढ़ बीजापुर से जगदलपुर आया। सरेंडर से पहले रूपेश ने कुछ शर्तें भी रखी थीं। इसमें आदिवासी मूल मंच पर लगा बैन हटाने की मांग भी थी। शर्तें मान ली गईं और दो दिन बाद ही रूपेश ने सरेंडर का ऐलान कर दिया।’

सोर्स आगे कहते हैं, ‘इस कहानी का सबसे अहम पहलू ये है कि इतना बड़ा नक्सली लीडर जगदलपुर तक पी सुंदरराज के संदेश पर उनसे मिलने आ जाता है, तो ये बहुत बड़ी बात है। यानी सुंदरराज पर उसे इतना भरोसा था। उसे इस बात को लेकर जरा भी डर या आशंका नहीं हुई कि कहीं उसका एनकाउंटर न हो जाए या फिर उसे गिरफ्तार न कर लिया जाए।‘

‘सुंदरराज ने रूपेश को जिस भरोसे के साथ बुलाया था, उसी भरोसे और सुरक्षा के साथ वापस भी भेज दिया। ये कोई छोटी घटना नहीं थी। पहली बार किसी नक्सली लीडर ने सुरक्षाबलों पर इतना भरोसा जताया था।‘

अब बात उन दो अफसरों की, जिन्होंने नक्सलियों के खात्मे की रणनीति बनाई अफसर: रिटायर्ड IPS डीएम अवस्थी क्या किया: नक्सलवाद के खात्मे में आ रही मुश्किलें दूर कीं डीएम अवस्थी 2015 के आखिर में DG नक्सल बने। वे बताते हैं, ‘2014 में देश में नई सरकार बनी थी। 2015 के नवंबर में एक मीटिंग हुई। उस वक्त राजनाथ सिंह गृह मंत्री थे। नक्सलवाद खत्म करने को लेकर मीटिंग में निर्देश मिले। कहा गया कि वे मुद्दे और लूपहोल्स तलाशने हैं, जो नक्सलवाद के खात्मे में रोड़ा बन रहे हैं। मुझे नक्सल DG बनाया गया और सुंदरराज को नक्सल DIG। हमने मिलकर टीम बनाई। इसमें CRPF के कुछ अधिकारी भी थे।’

‘मैं DG बना, तब नक्सलियों के हौसले बढ़े हुए थे। 2013 में ही उन्होंने झीरम घाटी में कांग्रेस काफिले पर हमला किया था। बीच में कुछ और भी हमले किए थे।’

2000 से 2015 तक नक्सलवाद की हिस्ट्री खंगाली, 3 बातें सामने आईं…

1. सुरक्षा बलों की इंटेलिजेंस यूनिट कमजोर है। 2. नक्सली इलाकों में हमारी मौजूदगी नहीं है, इसलिए फोर्स डॉमिनेट नहीं कर पा रही। 3. नक्सलवाद से प्रभावित इलाकों में फर्जी मुठभेड़ और अत्याचार के आरोप लग रहे थे। इसलिए आदिवासी समुदाय सुरक्षाबलों को दुश्मन मानता रहा।

कमजोरियां पता चलीं, तो नक्सलवाद खत्म करने की स्ट्रैटजी पर काम शुरू 1. नक्सलियों की जमीन पर सुरक्षाबलों के कैंप लगने शुरू हुए

नक्सलियों के गढ़ में पहुंचने के लिए सुरक्षाबलों को 40-50 किमी जंगल के अंदर जाना पड़ता था। हमने तय किया कि ये दूरी 5 किलोमीटर से ज्यादा नहीं रहेगी। सुरक्षाबलों ने नए कैंप बनाने शुरू किए। हर 20-30 किलोमीटर पर एक कैंप का टारगेट रखा गया।

2. कनेक्टिविटी के लिए सड़कें बनीं

तय हुआ कि घने जंगलों को कनेक्ट करने के लिए सड़कें बनेंगी। कॉन्ट्रैक्टर्स से संपर्क किया। सड़कों के ठेकों के साथ उन्हें सुरक्षा भी दी गई। इस दौरान कई कॉन्ट्रैक्टर्स और इंजीनियर्स की हत्याएं भी हुईं। ये दुखद था, लेकिन सड़कें बनती रहीं। ऐसे हम नक्सलियों के गढ़ के करीब पहुंचे।

3. मानवाधिकार उल्लंघन के मामले आए तो खैर नहीं

सुरक्षाबलों को सख्ती के साथ आदेश दिया गया कि नक्सलवाद से प्रभावित इलाकों में अतिरिक्त सतर्कता और संवेदनशीलता बरती जाए। जवानों पर निर्दोष लोगों पर अत्याचार करने के आरोप थे। फर्जी मुठभेड़ के मुकदमे चल रहे थे। लिहाजा आदेश दिया गया कि सुरक्षाबलों में से कोई भी किसी निर्दोष को तंग नहीं करेगा।

अगर किसी के खिलाफ शिकायत आई तो सख्त कार्रवाई की जाएगी। हर सिपाही पर इमेज सुधारने का दबाव था क्योंकि मानवाधिकार के आरोपों के उल्लंघन के मुकदमों में सुरक्षाबल लगातार फंसे रहते थे और असली मकसद पर काम नहीं हो पाता था।

4. मजबूत इंटेलिजेंस यूनिट बनाई

फोर्स के सबसे जरूरी हिस्से यानी इंटेलिजेंस यूनिट को मजबूत किया गया। नक्सली इलाकों में रहने वाले आदिवासियों से जुड़ने की प्रक्रिया शुरू हुई। इन इलाकों में अंदर तक जवानों के कैंप बन रहे थे तो यहां रहने वाली यूनिट के लिए दूध, सब्जियां और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए लोगों की जरूरत थी।

हमने ये काम लोकल लोगों को दिया। पहला तो उन्हें काम मिला और दूसरा वो हमसे जुड़ने लगे। इनमें से कई हमारी इंटेलिजेंस यूनिट का मजबूत हिस्सा बने। हमें इंटेलिजेंस यूनिट से रियल टाइम जानकारी मिलने लगी। फिर नक्सलियों का गढ़ रहे इलाकों में स्कूल बनाए गए।

कैंप में आदिवासियों के इलाज का इंतजाम हुआ। महिलाओं की डिलीवरी तो न जाने कितनी बार हुईं। आम लोगों और फौज के बीच भरोसे का पुल बना। आदिवासी औरतें खासतौर पर बीमारी या डिलीवरी के वक्त कैंप में तैनात महिला बल से संपर्क करने लगीं।

5. नक्सलियों से मुकाबले के लिए जवानों को ट्रेनिंगदी

मिजोरम के वैरांगटे आर्मी ट्रेनिंग स्कूल में छत्तीसगढ़ की DRG (डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड) की टीमों को ट्रेनिंग के लिए भेजा गया। उधर, छत्तीसगढ़ की पुलिस (STF) को हमने आंध्र प्रदेश की ग्रेहाउंड पुलिस यूनिट के पास ट्रेनिंग के लिए भेजा।

ये वो पुलिस यूनिट थी, जिसे दुनियाभर में नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन में विशेषज्ञता के लिए जाना जाता है। करीब साल भर अलग-अलग यूनिट्स को ट्रेनिंग दी गई। 2016 खत्म होते-होते हमारी ट्रेंड फौज तैयार थी।

6. CRPF की 8 बटालियन टर्निंग पॉइंट बनीं

2018 में दिल्ली के नॉर्थ ब्लॉक में एक मीटिंग हुई। इसमें नक्सल डीजी, IB और गृह सचिव मौजूद थे। इस मीटिंग में डीएम अवस्थी भी थे। वे बताते हैं, ‘हमने बताया कि हम मकसद के बहुत करीब हैं, लेकिन इसे पूरा करने के लिए और फोर्स चाहिए। हमारी मांग तुरंत पूरी की गई और हमें CRPF की 8 बटालियन दे दी गईं।’

अवस्थी कहते हैं, ‘इन बटालियन का हमारे साथ आना टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। नक्सली इलाकों में कैंप बनाने की रफ्तार तेज हुई। अब जवानों को नक्सलगढ़ तक पहुंचने के लिए 30-40 किमी नहीं बल्कि मुश्किल से 5 किमी का सफर करना पड़ता था।’

‘हम नक्सलियों के इलाकों पर कब्जा करके वहां जवानों के कैंप बना रहे थे। 2016 से 2021 तक मेरे छत्तीसगढ़ DGP रहते हुए करीब 250 कैंप बन चुके थे।’

7. 2023 में डेडलाइन तय, गृह मंत्री बोले-2026 तक नक्सलवाद खत्म करो

डीएम अवस्थी बताते हैं, ‘2023 में देश के गृहमंत्री ने बैठक ली और डेडलाइन दी। कहा कि मार्च 2026 तक नक्सलवाद खत्म करना है। वे हर महीने ऑपरेशन की मॉनिटरिंग करते हैं। रिव्यू होता है। ट्रेंड फौज, आम आदिवासियों का भरोसा और पॉलिटिकल विल तीनों हमारे पास थे। यही ऑपरेशन की वो सीढ़ी थी, जो हमें कामयाबी के करीब ले गई।’

डीएम अवस्थी कहते हैं, ‘रणनीति बनाने की शुरुआत से लेकर आखिर तक मौजूदा बस्तर रेंज के IG पी सुंदरराज पहले ADG के रूप में, फिर IG के रूप में अहम भूमिका में रहे।’

अफसर: पी. सुंदरराज, IG बस्तर रेंज क्या किया

: नक्सल ऑपरेशन की स्ट्रैटजी बनाने से लेकर एक्शन की जिम्मेदारी एंटी नक्सल ऑपरेशन में शामिल एक अफसर नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, ‘बस्तर रेंज के IG पी सुंदरराज की सबसे बड़ी खासियत ये है कि उन्हें सिंघम बनने की चाहत नहीं है। वे मीडिया से बात करते हैं, लेकिन खुद को ग्लोरीफाई करने के लिए नहीं बल्कि जितना जरूरी है, बस उतनी सूचना देने के लिए।’

डीएम अवस्थी भी मानते हैं कि सुरक्षाबलों के बीच तालमेल बैठाना, हर छोटी से छोटी बात पर गहराई से सोचना और तुरंत एक्शन लेना पी सुंदरराज की खासियत है।

डीएम अवस्थी कहते हैं, ‘मैं नक्सल DG था, तब सुंदरराज DIG थे। करीब 2 साल (2016 से 2018) मेरे साथ इसी पद पर रहे। स्ट्रैटजी बननी शुरू हुई, तो सुंदरराज की काबिलियत देखते हुए उनकी भूमिका बदल दी गई। तब से आज तक वे दोहरी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।’

‘पहले नक्सल ऑपरेशन और नक्सल इंटेलिजेंस के लिए दो अलग-अलग अधिकारी होते थे। सुंदरराज को एक साथ दोनों काम दिए गए क्योंकि सुंदरराज पहले दिन से स्ट्रैटजी का हिस्सा थे।’

उस वक्त बस्तर रेंज के आईजी विवेकानंद सिन्हा थे। डीएम अवस्थी कहते हैं, ‘विवेकानंद को 3 साल हो चुके थे। अब किसी और को IG बस्तर बनाना था। मैं DG नक्सल से छत्तीसगढ़ DGP बन चुका था। मैंने मुख्यमंत्री को 2019 में रिकमेंड किया कि अब सुंदरराज को IG का चार्ज देना चाहिए क्योंकि वे शुरू से इस ऑपरेशन का हिस्सा हैं। किसी नए IG को इस ऑपरेशन में जोड़ना कंटिन्यूटी तोड़ना होगा।’

फिर सुंदरराज को IG का चार्ज सौंप दिया गया। करीब डेढ़ साल तक उन्होंने IG की जिम्मेदारी संभाली। 2021 में उन्हें प्रमोट कर दिया गया। ऐसे वे करीब 6 साल से IG का कार्यभार संभाल रहे हैं। उसके 4 साल पहले से वे नक्सल ऑपरेशन के लिए स्ट्रैटजी बनाने वाली कोर टीम में थे। सुंदरराज को 2016 में दोहरी जिम्मेदारी मिली थी, वो आज तक उनके पास ही है।

सरेंडर कर चुका एक नक्सली सुंदरराज के बारे में कहता है, ‘सरकार भले कहती रहे कि हम नक्सलियों से बात नहीं करेंगे, लेकिन सुंदरराज हमसे बात करते थे। वो हमें डराते नहीं, समझाते थे। हमने सरेंडर किया क्योंकि हमें IG पर भरोसा था कि वे धोखा नहीं देंगे।’

सुंदरराज बोले- मैं हीरो नहीं, ये कम्युनिटी पुलिस-महिला बल का कमाल

हमने इस बारे में पी सुंदरराज से भी बात की। सुंदरराज 2003 बैच के IPS अधिकारी हैं। वे तमिलनाडु से हैं, लेकिन उनका कैडर छत्तीसगढ़ है। सुंदरराज कहते हैं, ‘मैं कोई हीरो नहीं, पूरी फोर्स ही हीरो है। खासतौर पर कम्युनिटी पुलिस और महिला सुरक्षा बल।’

सुंदरराज इतना कहकर चुप हो गए। हमने उनसे पूछा सरेंडर के लिए आप नक्सलियों को कैसे मना रहे हैं?

वे जवाब देते हैं, ‘उनका भरोसा जीता। हमारी कम्युनिटी यानी सिविक (नागरिक) पुलिस लगातार आदिवासियों के बीच उठती-बैठती है। महिला सुरक्षा बल ने आदिवासी महिलाओं का भरोसा जीता। उनकी बीमारी से लेकर डिलीवरी तक हमारे कैंप की मेडिकल टीम उनकी मदद करती है। हमारे सुरक्षाबलों पर अब मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप नहीं लगते।’

हमने पूछा- कई बड़े नक्सलियों ने सरेंडर से पहले आपके ऑफिस में मुलाकात की। उन्हें ये भरोसा कैसे दिलाया कि वे आएंगे तो उनका एनकाउंटर नहीं होगा, न वे गिरफ्तार होंगे?

बात बदलते हुए उन्होंने जवाब दिया, ‘ऑपरेशन की गोपनीयता के लिए हम इस पर कोई बात नहीं कर सकते। इस विश्वास को बनाने में समाज के कई लोग भागीदार हैं। मैं उनका नाम नहीं ले सकता। यहां तक पहुंचने में हमारी फौज की कई टीमें लगीं और हमने कई साल खर्च किए।’

सुंदरराज कहते हैं,

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पत्रकार, सोशल एक्टिविस्ट, आदिवासी समाज के प्रमुख जैसे गांवों के मुखिया इस अभियान का हिस्सा हैं। ये सारे नाम गोपनीय हैं और आपको नहीं बता सकते।

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एनकाउंटर का डर खत्म हुआ तो नक्सली लौट आए बस्तर रेंज के पूर्व IG शिवराम प्रसाद कल्लूरी जून 2017 में रिटायर हुए, तो उनके खिलाफ मानवाधिकार उल्लंघन और फर्जी मुठभेड़ के मुकदमों की लंबी लिस्ट थी। बीच में विवेकानंद सिन्हा का कार्यकाल शांत रहा। फिर कार्यकारी IG के तौर पर 2019 के आखिर में ही IPS सुंदरराज पट्टालिंगम को नक्सल ऑपरेशन की जिम्मेदारी मिली।

छत्तीसगढ़ के सीनियर जर्नलिस्ट आलोक पुतुल उनके दौर को लेकर कहते हैं, ‘पहले ने नारा दिया था, शैतान से निपटने के लिए उसके ही तरीके अपनाने होंगे। ये वो दौर था, जब फर्जी मुठभेड़ आम बात थी। बस्तर रेंज के IG रहते हुए पी. सुंदरराज ने हर पक्ष का भरोसा जीता।’

‘मैं पुख्ता तौर पर कह सकता हूं कि नक्सलियों के एक बहुत बड़े धड़े को मुख्यधारा से जुड़ने के लिए जिस मौके का इंतजार था, वो उन्हें पी. सुंदरराज ने दिया। कल्लूरी अपने हर मानवाधिकार उल्लंघन के मामले को जस्टिफाई करते थे। सुंदरराज फर्जी मुठभेड़ या मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगने पर अपनी फौज से सवाल करते हैं।’

‘सुंदरराज की दूसरी सबसे बड़ी खासियत है सभी पक्षों की सुनना, बिना किसी इफ एंड बट के। सरकार भले कहती रही कि बंदूक छोड़ो, तब बात करेंगे, लेकिन सुंदरराज ने बिना शर्त अपना दरवाजा बातचीत के लिए खुला रखा। वे पत्रकारों, समाजसेवियों, आदिवासियों को टारगेट पर नहीं लेते बल्कि उनके साथ मिलकर काम करते हैं।’

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