वेयरहाउसिंग सिस्टम फेल..?

मप्र वेयरहाउसिंग का ढांचा बुरी तरह चरमरा गया है। हालत यह है कि प्रदेश के 7000 से ज्यादा निजी वेयरहाउस संचालकों को किराए तक का भुगतान नहीं हो रहा है। इन संचालकों का 1000 करोड़ रुपए से ज्यादा का पेमेंट बकाया है।
कई संचालक तो ऐसे हैं जिन्हें वेयरहाउसिंग कार्पोरेशन ने तीन-तीन साल से एक रुपए का भी भुगतान नहीं किया है। नतीजा ये कि हजारों वेयरहाउस संचालक कर्ज में डूबते जा रहे हैं। कई वेयरहाउस बैंकों द्वारा एनपीए घोषित हो चुके हैं और कई होने की कगार पर हैं।
वेयरहाउसिंग अफसरों का कहना है कि सिविल सप्लाइज कार्पोरेशन, एमपी स्टेट कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन (मार्कफेड), नेशनल एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन (नैफेड) और नेशनल कोऑपरेटिव कंज्यूमर्स फेडरेशन (एनसीसीएफ) की ओर से रकम न मिलने के कारण वेयरहाउसिंग कॉरपोरेशन निजी वेयरहाउस मालिकों को किराया नहीं दे पा रहा है। इनकी ओर से एक हजार करोड़ से ज्यादा का पेमेंट अटका हुआ है।
हजारों गोदामों में ताले
- 8600 कुल वेयरहाउस हैं मप्र में
- 7000 निजी वेयरहाउस कार्पोरेशन से जुड़े
- 1600 सरकारी वेयरहाउस मप्र में
कुल भंडारण क्षमता 4.20 करोड़ मीट्रिक टन, स्टोरेज सिर्फ 79.57 लाख मीट्रिक टन
… द्वारा हासिल किए गए दस्तावेज़ बताते हैं कि मप्र की कुल भंडारण क्षमता 4.20 करोड़ मीट्रिक टन है, लेकिन 79,57,152 मीट्रिक टन ही अनाज स्टोर है। यानी कुल क्षमता का सिर्फ 18.94% (लगभग 19%)। इसमें 8 लाख टन मसूर और 3 लाख टन मूंग शामिल है।
खुले बाजार से कर्ज लेकर बैंक का लोन चुकाना पड़ा
भोपाल के अजय साहू ने बताया- सुरक्षित आय की उम्मीद में तीन वेयरहाउस बनाए थे। हुआ बिल्कुल उलट। तीन साल से एक रुपया भी किराया नहीं मिला। हालात इतने बिगड़े कि जुलाई 2024 में बैंक ने नोटिस जारी कर चेतावनी दी कि 14 लाख बकाया नहीं चुकाया, तो दो वेयरहाउस एनपीए घोषित कर दिए जाएंगे।
किराया नहीं मिला तो बैंक की किस्त कैसे भरता? मजबूरी में मुझे खुले बाज़ार से महंगा कर्ज़ लेकर बैंक को भुगतान करना पड़ा। आज स्थिति यह है कि उनके दो वेयरहाउस पूरी तरह खाली पड़े हैं, जबकि तीसरा सिर्फ 20% भरा है। लगातार घाटे ने उनकी आर्थिक कमर तोड़ दी है।
आधा गोदाम खाली पड़ा, भरे हिस्से का किराया भी अटका
सागर जिले के सोहन सिंह की भी यही कहानी है। उनके वरुण वेयरहाउस का वेयरहाउसिंग कार्पोरेशन पर 55 लाख रुपए से अधिक बकाया है। बीते 24 महीनों से उन्हें किराया नहीं मिला, जिसके कारण वे मानसिक और आर्थिक दोनों तरह से टूट चुके हैं।
सोहन बताते हैं- “हर अधिकारी के पास गया, लेकिन हर बार कहा- तकनीकी दिक्कत है। आधा गोदाम खाली है, भरे हिस्से का किराया भी नहीं मिला। बैंक रोज़ नोटिस दे रहा है।” उनकी हालत यह है कि गोदाम का आधा हिस्सा खाली पड़ा है, और जो हिस्सा भरा है, उसका भी किराया अटका हुआ है। बैंक की लगातार नोटिसों ने उनकी परेशानियां और बढ़ा दी हैं।
सरकारी गोदामों को भरना प्राथमिकता, प्याज भंडारण का पैसा भी नहीं मिला
- कॉरपोरेशन की पहली प्राथमिकता सरकारी गोदाम भरना होती है, इसलिए निजी वेयरहाउस लंबे समय तक खाली रह जाते हैं। जब भुगतान नहीं मिलता, तो नुकसान कई गुना बढ़ जाता है।
- 2012 में शुरू हुई सब्सिडी योजना से महिलाओं व SC-ST को क्रमशः 33% व 25% सब्सिडी मिली, जिससे वेयरहाउस तेजी से बने, पर आज वही निवेश मालिकों के गले की फांस बन गया है।
- 2017 में शिवराज सरकार ने 8 लाख MT प्याज़ ₹8रु/किलो में खरीदी थी, जिसका बड़ा हिस्सा निजी वेयरहाउसों में रखा गया, लेकिन उसके भंडारण का किराया भी आज तक नहीं मिला।
मालिक न वेयरहाउस बेच पा रहे, न तोड़ पा रहे और न चला पा रहे
प्याज़ का किराया आज तक नहीं मिला। पूंजी, स्टाफ, मेंटेनेंस सब पर खर्च हुआ लेकिन भुगतान कुछ नहीं हुआ। अब मालिक न वेयरहाउस बेच पा रहे, न तोड़ पा रहे और न ही चला पा रहे। मप्र का वेयरहाउस मॉडल, जिसे कभी कृषि ढांचे की रीढ़ माना जाता था, आज खुद टूट चुका है। जब तक सरकार बकाया भुगतान, लोन रीस्ट्रक्चर और स्टोरेज नीति की समीक्षा नहीं करती, तब तक संकट और गहराता जाएगा। नवनीत रघुवंशी, अध्यक्ष, वेयरहाउस एसो.
हाल ही में 1000 करोड़ से ज्यादा के बकाया का भुगतान किया
हमने सिविल सप्लाइज़ कॉरपोरेशन के 1000 करोड़ से अधिक का भुगतान किया है। हम हर 15 दिन में भुगतान करते हैं और प्रस्तुत बिलों को क्लियर करने की कोशिश करते हैं, लेकिन दूसरी एजेंसियां भी हैं जो प्रोक्योरमेंट करती हैं और जिनका बकाया है। प्याज़ भंडारण के किराये का भुगतान न होने की बात सही है। इस मुद्दे को सरकार के साथ उठा रहे हैं। इसे जल्द सुलझाने की कोशिश है। अनुराग वर्मा, एमडी, एमपी वेयरहाउसिंग कार्पोरेशन

