दिल्ली

SC: ‘गांव में रहने वाले भूजल पीते हैं, वो तो…’, बोतलबंद पानी को लेकर दायर PIL पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

SC: ‘गांव में रहने वाले भूजल पीते हैं, वो तो…’, बोतलबंद पानी को लेकर दायर PIL पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने बोतलबंद पीने के पानी को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरुप बनाने की मांग वाली याचिका को शहरी नजरिये से प्रेरित बताया। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गांव के लोग तो भूजल पीते हैं, उन्हें कुछ नहीं होता।
Supreme Court junks PIL on packaged drinking water standards

सुप्रीम कोर्ट (फाइल तस्वीर) – फोटो : ANI

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को बोतलबंद पेयजल के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों को लागू करने के अनुरोध वाली जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया और कहा कि यह एक ऐसे देश में ‘लग्जरी मुकदमेबाजी’ का मामला है जहां अब भी एक बड़ी आबादी की बुनियादी पेयजल तक पहुंच नहीं है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा, इस देश में पीने का पानी कहां है, मैडम? लोगों के पास पीने का पानी उपलब्ध नहीं है; बोतलबंद पेयजल की गुणवत्ता की बात तो बाद में आएगी।

याचिका पर कोर्ट की दो टूक
सारंग वामन यादवाडकर की ओर से दायर जनहित याचिका में भारतीय सीलबंद पेयजल मानकों को वैश्विक मानकों के अनुरूप सुधारने के निर्देश देने की मांग की गई थी। सुनवाई की शुरुआत में ही सीजेआई ने याचिका के मूल आधार पर ही सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि अदालत देश के सामने मौजूद व्यापक वास्तविकताओं को नजरअंदाज नहीं कर सकती।याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अनीता शेनॉय ने कहा कि यह मुद्दा सीधे तौर पर जन स्वास्थ्य और उपभोक्ता सुरक्षा से जुड़ा है। उन्होंने तर्क दिया कि नागरिकों को स्वच्छ और सुरक्षित सीलंबद पीने के पानी का अधिकार है। उन्होंने खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 की धारा 18 का हवाला दिया, जो निर्धारित सुरक्षा मानदंडों के पालन को अनिवार्य बनाती है। उन्होंने तर्क दिया कि केवल इसलिए कि देश भर में पीने के पानी तक पहुंच असमान बनी हुई है, वैधानिक दायित्वों को कमजोर नहीं किया जा सकता है। पीठ इस बात से संतुष्ट नहीं हुई और याचिका को शहरों के नजरिये वाला बताया।

‘ग्रामीण क्षेत्रों के लोग भूजल पीते हैं और उन्हें कुछ नहीं होता’
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों के लोग भूजल पीते हैं और उन्हें कुछ नहीं होता। उन्होंने कहा, ‘क्या आपको लगता है कि हम अमेरिका, जापान और यूरोपीय संघ के दिशानिर्देशों को लागू कर पाएंगे? आइए देश की जमीनी हकीकतों का सामना करें। गरीबों का कोई हिमायती नहीं है; यह सब अमीरों और शहरीकरण का डर है।’ संभावित नतीजे को भांपते हुए वकील ने जनहित याचिका वापस लेने की मांग की। इसके साथ ही एफएसएसएआई से अपनी शिकायतें दर्ज कराने की स्वतंत्रता भी मांगी। पीठ ने याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी।

सुनवाई खत्म करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा, ‘जब गांधी जी भारत आए, तो उन्होंने देश के हर कोने की यात्रा की। याचिकाकर्ता से कहिए कि वह उन गरीब इलाकों की यात्रा करें जहां पानी मिलना भी एक चुनौती है, तब उन्हें समझ आएगा कि भारत वास्तव में क्या है।’

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