पॉक्सो के मामलों का अब तेजी से निपटारा !!!
बीते सालों की तुलना में मप्र सहित देश के कई राज्यों में पॉक्सो यानी बच्चों से जुड़े उत्पीड़न के मामलों के अदालतों में निपटारे की दर सुधरी है। साल 2025 में मप्र में यह दर 139% रही, जो राष्ट्रीय औसत 109% से अधिक है।
मप्र का प्रदर्शन महाराष्ट्र (90%) से बेहतर और गुजरात (138%) के बराबर रहा, जबकि पड़ोसी छत्तीसगढ़ (189%) और राजस्थान (170%) से कमतर रहा। ये आंकड़े 250 एनजीओ की प्रतिनिधि संस्था इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन की पहल पर सेंटर फॉर लीगल एक्शन एंड बिहेवियर चेंज फॉर चिल्ड्रन के शोध में सामने आए हैं।
शोध के मुताबिक, मप्र में साल 2025 में पॉक्सो कानून के तहत 3973 मामले दर्ज हुए, जबकि अदालतों ने 5503 मामलों का निपटारा किया, जिसमें पुराने लंबित मामलों का बड़ा हिस्सा शामिल है। सी-लैब फॉर चिल्ड्रन की रिपोर्ट ‘पेंडेंसी टू प्रोटेक्शन: अचीविंग द टिपिंग पॉइंट टू जस्टिस फॉर चाइल्ड विक्टिम्स ऑफ सेक्सुअल एब्यूज’ के अनुसार देश में 2025 में बच्चों के यौन शोषण से जुड़े 80,320 मामले दर्ज हुए और 87,754 मामलों का निपटारा किया गया।
चिंता- बीते साल 15 % मामलों में ही सजा
रिपोर्ट के मुताबिक अब मामले तेजी से निपटारे कि और जा रहे हैं, पर बड़ी संख्या में मामले सालों से अभी भी न्याय की राह देख रहे हैं। मप्र में लंबित मामलों में 3% तो 6-10 साल से, 6% तो 5 साल से, 12% ऐसे हैं जो 4 साल से, वहीं, 30 % प्रकरण 3 साल से और शेष 48 प्रतिशत मामले 2 साल से लंबित हैं।
वहीं, साल 2024 में मप्र में महज 15% में सजा मिल सकी, बाकी में आरोपी छूट गए। सात राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मामलों के निपटान की दर 150 % से अधिक रही, तो अन्य सात राज्यों में यह दर 121 से 150 % के बीच रही।
कार्यशैली में सकारात्मक बदलाव
मप्र में पॉक्सो मामलों का अधिक निपटारा यह संकेत देता है कि न्याय प्रणाली की कार्यशैली में एक स्पष्ट और सकारात्मक बदलाव आया है। यदि यही गति रही, तो समय पर और बच्चों के हित में न्याय देना अपवाद नहीं, बल्कि सामान्य व्यवस्था बन सकेगा। मप्र जैसे राज्य बेहतर कर रहे हैं। पुराने केसों के निपटारे में और तेजी लाई जाना चाहिए। – पुरुजीत प्रहराज, निदेशक (शोध)-इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन

