क्राइममध्य प्रदेश

हाथी-बाघ कॉरिडोर को मिटाकर मिली कोयला खदान की मंजूरी ????

हाथी-बाघ कॉरिडोर को मिटाकर मिली कोयला खदान की मंजूरी
हाथी कॉरिडोर से 5 किमी दूर कैसे हुआ जंगल; जानिए, अफसरों की फाइलों का खेल

इसका मतलब ये है कि इनका संरक्षण बेहद जरूरी है। रिकॉर्ड के मुताबिक जिस जगह पर कोल माइन्स को मंजूरी दी है, वो हाथी कॉरिडोर है, यानी यहां से हाथी गुजरते हैं। इतना सब होने के बाद भी जिस दिन कोल ब्लॉक का टेंडर हुआ उसके बाद अफसरों ने कागजों में हेरफेर कर प्रस्तावित हाथी कॉरिडोर को कोल ब्लॉक से 5 किमी दूर बता दिया।

जब इस मामले में भास्कर ने वन विभाग के अफसरों से बात की तो उन्होंने आधिकारिक बयान देने से साफ इनकार कर दिया। दूसरी तरफ रीवा के तत्कालीन सीसीएफ ने 2023 में अपनी रिपोर्ट में इसे हाथी कॉरिडोर का हिस्सा बताया था।

बता दें कि ये कोल ब्लॉक अहमदाबाद की मेसर्स स्ट्राटाटेक मिनरल रिसोर्सेज कंपनी को अलॉट किया है। धिरौली कोल ब्लॉक का कुल एरिया 2672 हेक्टेयर है। इसमें से 1275 हेक्टेयर राजस्व और 1397 हेक्टेयर वन क्षेत्र है। अब सभी जगह से ‘क्लीनचिट’ मिलने के बाद करीब कोल ब्लॉक के करीब 1400 हेक्टेयर वन क्षेत्र के पेड़ों को काटने का काम शुरू हो गया है।

आखिर किस तरह से अफसरों ने कोल माइन्स के लिए फारेस्ट एरिया में बदलाव किया। 

 

अब जानिए कैसे बदल दिया हाथी-बाघ कॉरिडोर

1. पुराने नक्शे में हाथी कॉरिडोर कोल ब्लॉक एरिया से होकर गुजरा

वन विभाग के पुराने नक्शे और रिपोर्ट साफ दिखाते हैं कि पूरा धिरौली कोल ब्लॉक क्षेत्र हाथियों का कॉरिडोर रहा है, इसलिए मप्र सरकार ने हाथी कॉरिडोर का प्रस्ताव तैयार किया तो इस इलाके को भी सम्मिलित किया गया। रीवा के मुख्य वन संरक्षक सीसीएफ राजेश कुमार राय ने 21 नवंबर 2023 की साइट इंस्पेक्शन रिपोर्ट में भी इसका जिक्र किया है।

इसमें लिखा है कि प्रस्तावित वन भूमि, वन विभाग की कार्य आयोजना (2019-20 से 2028-29) के अनुसार, हाथी कॉरिडोर में सम्मिलित है। इसके साथ ही सिंगरौली वन विभाग के पास जो फारेस्ट एरिया का नक्शा है उसमें भी हरे रंग से बताया गया है कि यहां वन्य प्राणियों का विचरण हैं।

वन विभाग के इस पुराने नक्शे में साफ देखा जा सकता है कि धिरौली ब्लॉक भी इसी हाथी कॉरिडोर के बीच आता है।

नीचे दी गई स्लाइड से इसे समझ सकते हैं….

2. नए नक्शे में हाथी कॉरिडोर कोल ब्लॉक से 5 किमी दूर दिखाया

दो साल पहले जब कोल ब्लॉक का टेंडर अहमदाबाद की मेसर्स स्ट्राटाटेक मिनरल रिसोर्सेज प्रा. लि. कंपनी को मिला, तो केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय को शिकायत की गई कि ये संरक्षित वन क्षेत्र हैं और कई दुर्लभ वन्यप्राणी यहां रहते हैं इसलिए इस खदान को मंजूरी न दी जाए।

केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु मंत्रालय ने जब एमपी के वन विभाग से इसका जवाब मांगा तो अफसरों ने जवाब दिया कि सिंगरौली फारेस्ट डिवीजन के तत्कालीन आईएफएस राजीव मिश्रा ने जो नया वर्किंग प्लान बनाया है उसके मुताबिक प्रस्ताव हाथी कॉरिडोर कोल ब्लॉक से न्यूनतम 5 किलोमीटर दूर है।

यही कहानी बाघ कॉरिडोर के साथ दोहराई गई। नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (NTCA) ने बाघ के मूवमेंट को महज 3 किलोमीटर के एक सीधे रास्ते तक सीमित कर दिया। दूसरी तरफ यह क्षेत्र संजय दुबरी नेशनल पार्क के बफर जोन से सटा हुआ है और बाघों की आवाजाही के लिए जाना जाता है।

शेड्यूल 1 के 18 दुर्लभ वन्य प्राणी भी जंगल में मौजूद

धिरौली का यह जंगल एक वाइब्रेंट इको सिस्टम है। वन विभाग के कंजर्वेशन प्लान के अनुसार, यहां वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के शेड्यूल1 के तहत आने वाले 18 वन्यजीव पाए जाते हैं। इस सूची में शामिल प्रजातियों को संरक्षण प्राप्त है और इनका शिकार या व्यापार पूरी तरह से प्रतिबंधित है।

इनमें हाथी, बाघ, तेंदुआ, भालू, भेड़िया, सरीसृप में मॉनिटर लिजार्ड, अजगर और पक्षियों में मोर, गिद्ध, ईगल जैसी प्रजातियां हैं। इसके बावजूद, वन विभाग की आधिकारिक नोटशीट में इन दुर्लभ जीवों का जिक्र तक नहीं किया गया। उसमें केवल भालू, लकड़बग्घा, भेड़िया और सियार जैसे जानवरों के “विचरण” की बात कही गई है, मानो यह उनका स्थायी निवास न होकर महज एक रास्ता हो।

इसके अलावा संजय दुबरी टाइगर रिजर्व के सटे होने से यहां टाइगर का मूवमेंट हैं, इस बात का भी दस्तावेजों में जिक्र नहीं किया है।

ग्रामीण बोले- हमारे साथ जानवर भी बेघर हो रहे हैं

खदान के लिए सिर्फ जंगल ही नहीं, बल्कि उससे सटे बासी बेरदह, धिरौली, आमडाड़ और अमराईखोह जैसे गांवों का भी अधिग्रहण हो रहा है। बासी बेरदह गांव के राजपाल खैरवार कहते हैं, हमारे जंगल में न जाने कितने प्रकार की जड़ी-बूटियां, पेड़ और घास मिलती है।

यहां हाथी, बाघ और गिद्ध जैसे जीव हैं। सरकार एक तरफ वन्य जीवन बचाने की मुहिम चलाती है, दूसरी तरफ कोल कंपनी के लिए जंगल काट रही है। हम तो बेघर हो ही रहे हैं, लेकिन पीढ़ियों से हमारे साथ रहने वाले जानवर भी बेघर हो रहे हैं।

गांव के ही 60 साल के अजमेर सिंह बचपन से इन जानवरों को देखते आए हैं। वे बताते हैं, ‘अभी पिछले महीने ही बाघ ने गांव के धर्मपाल की दो गायों का शिकार किया था। जंगल में बाघ, भालू, तेंदुआ सब हैं।

वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन प्लान खुद इस बात को स्वीकार करता है कि खनन गतिविधियों से ध्वनि और वायु प्रदूषण बढ़ेगा, जिससे जानवरों में तनाव पैदा होगा और उनके व्यवहार में बदलाव आ सकता है। इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं और भी बढ़ेंगी।

एक्सपर्ट बोले- ईको सिस्टम पर पड़ेगा असर

पूर्व आईएफएस अधिकारी आजाद सिंह डबास कहते हैं कि जिस तरह की स्थितियां पैदा हो रही हैं, तो इसका असर ईको सिस्टम पर पड़ेगा। वे तीन अहम असर के बारे में बताते हैं..

  • खत्म होगा नेचुरल हैबिटेट: खनन से वन्यजीवों का प्राकृतिक वास पूरी तरह नष्ट हो जाएगा। कई प्रजातियां इस बदलाव को सहन नहीं कर पाएंगी और विलुप्त होने की कगार पर पहुंच सकती हैं।
  • जल स्रोतों का संकट: इस जंगल में 6 प्राकृतिक नाले हैं, जो साल भर वन्यजीवों के लिए पानी का मुख्य स्रोत हैं। खनन के कारण ये नाले या तो खत्म हो जाएंगे या मौसमी बन जाएंगे। इसका सीधा असर गोपद नदी पर भी पड़ेगा, जिसमें गाद और प्रदूषण का खतरा बढ़ेगा।
  • अमूल्य साल का जंगल: यह मुख्य रूप से साल का एक पुराना जंगल है। मध्य प्रदेश में साल का वृक्षारोपण कभी सफल नहीं रहा है। ऐसे में इस प्राकृतिक जंगल का कटना एक अपूरणीय क्षति है।

डबास कहते हैं कि मैंने इस मामले की 23 पन्नों की नोटशीट देखी है। ऐसा लगता है कि वन विभाग के अधिकारी इस प्रोजेक्ट को जल्द से जल्द मंजूरी दिलाने पर तुले हुए थे क्योंकि यह एक ऐसी कंपनी से संबंधित है जिसके कर्ताधर्ता चाहे केंद्र हो या राज्य की सरकारें दोनों से नजदीकियां रखते हैं।

वे कहते हैं कि मंजूरी देते वक्त शेड्यूल 1 के 18 जानवरों की मौजूदगी को नजरअंदाज किया गया। वर्किंग प्लान की रिपोर्ट को तोड़-मरोड़कर एलिफेंट कॉरिडोर को 5 किमी दूर बता दिया गया

धिरौली कोल ब्लॉक को पहले मंजूरी नहीं मिली थी

‘नो गो’ से ‘गो’ तक का सफर

2011 में यूपीए सरकार में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री जयराम रमेश ने देशभर के कोल ब्लॉक को उनके पर्यावरणीय महत्व को देखते हुए ‘गो और नो गो’ जोन में बांटा था। ‘गो जोन’ में आने वाले कोल ब्लॉक्स को खनन के लिए उपर्युक्त बताया गया था। वहीं ‘नो गो जोन’ में आने वाले कोल ब्लॉक में खनन रोका गया था।

सिंगरौली जिले की 46 कोल ब्लॉक में से 26 कोल ब्लॉक को ‘गो जोन’ में रखा गया था। वही 20 कोल ब्लॉक को ‘नो गो जोन’ में रखा गया था। धिरौली कोल ब्लॉक के ईको सिस्टम को देखते हुए इसे भी तत्कालीन यूपीए सरकार ने ‘नो गो जोन’ में रखा था।

यहां बड़े बड़े साल के पेड़ लगे हैं, जो सालों पुराने हैं।
यहां बड़े बड़े साल के पेड़ लगे हैं, जो सालों पुराने हैं।

अधूरी शर्तों के बावजूद कटाई

प्रोजेक्ट की मंजूरी के लिए जरूरी शर्तें थीं कि काम शुरू होने से पहले फॉरेस्ट राइट एक्ट के तहत विस्थापन की प्रक्रिया पूरी हो और क्षतिपूर्ति वन के लिए जमीन मिल जाए। इनमें से कोई भी शर्त पूरी नहीं हुई है, फिर भी जंगल की कटाई शुरू हो चुकी है। पर्यावरण विशेषज्ञ शरद लेले कहते हैं, ‘यह चौंकाने वाला है कि इतने संवेदनशील जंगल को क्लीयरेंस मिल गया।

एनवायरमेंट क्लीयरेंस पत्र कहता है कि 10 किमी के दायरे में कोई राष्ट्रीय उद्यान या ईको-सेंसिटिव जोन नहीं है, जबकि संजय दुबरी राष्ट्रीय उद्यान का ईको-सेंसिटिव जोन खदान क्षेत्र से महज 70 मीटर की दूरी पर है। अगर सिर्फ 10 किमी का नियम देखना है, तो विशेषज्ञ समिति की जरूरत ही क्या है?

जंगल के भीतर करीब 33 हजार पेड़ काटे जा रहे हैं।
जंगल के भीतर करीब 33 हजार पेड़ काटे जा रहे हैं।

सीसीएफ बोले- ये जानवरों का परमानेंट हैबिटेट नहीं

इस मामले में वन विभाग के आला अफसरों ने कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है। वहीं रीवा के सीसीएफ राजेश कुमार राय का कहना है कि धिरौली का जंगल एलिफेंट और टाइगर का परमानेंट हैबिटेट नहीं है।

जिस कंपनी को कोल ब्लॉक दिया है उसे स्टेज वन का क्लीयरेंस मिला है। इसके साथ कुछ शर्तें लागू होती हैं। माइनिंग कंपनी वचन पत्र भी देती है। कंपनी ने सारी शर्तें पूरी की इसलिए स्टेज 2 का क्लीयरेंस मिला है। जहां तक एलिफेंट कॉरिडोर का सवाल है तो यह हाथी कॉरिडोर के लिए नोटिफाइड नहीं है।

राय का कहना है कि तत्कालीन सीसीएफ राजीव मिश्रा ने वर्किंग प्लान में हाथी कॉरिडोर का जिक्र किया है तो वह ये देखकर किया है कि वन मंडल में हाथियों का मूवमेंट कब-कब रहा है।

जानवरों का संरक्षण करने क्या कदम उठा रहे

उनसे पूछा कि घिरौली ब्लॉक के लिए काटे जा रहे जंगल में 18 प्रजातियों के शेड्यूल 1 कैटेगरी के जानवर मिलते हैं, तो उन्होंने कहा कि जब किसी प्रोजेक्ट को मंजूरी दी जाती है, तो उसका ईको सिस्टम पर क्या असर होने वाला है? ये सारे पॉइंट्स उसमें शामिल होते हैं। जिन बातों से नुकसान होना है उसकी भरपाई कैसे होगी? इसका भी जिक्र होता है। उसी के बाद प्रोजेक्ट अप्रूव किया जाता है।

उनसे ये भी पूछा कि साइट विजिट के दौरान उन्होंने ही अपनी रिपोर्ट लिखा था कि यहां एलिफेंट और टाइगर हैं। मगर, जब केंद्र सरकार ने पूछा तो बता दिया गया कि माइनिंग एरिया, एलिफेंट कॉरिडोर से 5 किमी दूर है। यह कैसे हुआ, इसे कब बदला गया और क्यों बदल दिया ? इस सवाल को राय पूरी तरह से टाल गए।

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