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जंगल राज बनाम मोदीजी का राम राज !

जंगल राज बनाम मोदीजी का राम राज

भारत में किस हिस्से में कौन सा राज चल रहा है, ये बता पाना आसान नहीं है. एक ही मुल्क में कायदे से तो राज करने की एक ही प्रणाली होना चाहिए, लेकिन ऐसा है नहीं. आजादी के बाद मुल्क में सुराज यानि कानून का राज होना चाहिए था किंतु कभी नेहरू राज रहा, कभी इंदिरा राज. आजकल मोदीराज चल रहा है.
मोदीराज के राजा माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने खुद ये माना है कि पूरे मुल्क में मोदीराज नहीं चल रहा. मसलन बंगाल में ममता का जंगलराज चल रहा है.जबकि पश्चिम बंगाल में वन क्षेत्र राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 18.96 से 19 प्रतिशत के बीच है आईएस एफ आर 2021 के अनुसार बंगाल में जंगल देश के राष्ट्रीय औसत (लगभग 21.7 प्रतिशत से भी कम है,
बहरहाल मोदीजी बंगाल से जंगलराज खत्म करना चाहते हैं और इसके लिए सबसे पहले ममताराज को समाप्त करना जरूरी है. मोदीजी 2016 से बंगाल में ममता का जंगल राज समाप्त करने के लिए ऐढी-चोटी का जोर लगा रहे हैं लेकिन कामयाबी उनके कदम चूमने के लिए तैयार ही नहीं है. नाकामयाबी बार -बार मोदीजी को ठेंगा दिखा देती है.
बंगाल की जनता एक दशक से ममता के जंगलराज में ठीक वैसे ही खुश है जैसे यूपी वाले योगी के जंगलराज में खुश हैं.
इस देश में बीते 78 साल से चुनाव हो रहे हैं फिर भी न कानून का राज स्थापित हो पाया और न रामराज. बहुत कोशिश करने के बाद मोदीजी भी ‘जी राम जी’ तक पहुंच सके. मोदीजी के राज में बालक राम को उनका मंदिर मिल गया पर जनता को रामराज नहीं मिला. यूपी में आज भी योगी का जंगलराज है.हालांकि यूपी में बंगाल के मुकाबले जंगल का क्षेत्र मात्र 9 प्रतिशत बचा है. घटते जंगलों से जंगली जानवर ही नहीं शहरी और ग्रामीण आबादी भी दुखी है.
जंगलराज वास्तव में एक न्यायविहीन शासन व्यवस्था मानी जाती है.बिहार के बाद मणिपुर में इस हिसाब से जंगलराज बहुत पुराना है. जंगलराज में जरुरी नहीं कि शासन जनता ने चुना हो. जंगलराज बिना चुनाव वाले इलाकों में भी हो सकता है. मिसाल के तौर पर मणिपुर को ही ले लीजिये. वहाँ कौन सी लालू प्रसाद यादव की सरकार है? वहां तो राष्ट्रपति मुर्मू मैडम की सरकार है.
जंगलराज के लिए जंगल का होना कोई अनिवार्यता नहीं है. ठीक वैसे ही जैसे रामराज के लिए श्रीराम जी का होना जरूरी नहीं है. जंगल के नाम पर कोई भी जंगलराज चला सकता है और श्रीराम के बिना भी रामराज के नाम पर आपकी आंखों में धूल झोंकी जा सकती है. झोंकी जा रही है. कानून के राज की बात तो कोई करता ही कहाँ है?
हकीकत ये है कि जंगलराज में न मंहगाई होती है, न बेरोजगारी. न मंदिर होता है न मस्जिद. न हिन्दू होता है, न मुसलमान. न कांग्रेस होती है, न भाजपा. इसलिए जंगलराज में न चुनाव होते हैं, न केंचुआ. न ईडी होती है, न सीबीआई. न संसद होती है, न सांसद. सब बिना विधान और संविधान के चलता है. जंगल का राजा शेर होता है. उसे न हजारों करोड का हवाई जहाज चाहिए न करोडों का सेवातीर्थ. वो एक गुफा में पडा रहता है. उसका अपना कोई अडानी, अंबानी या टाटा भी नहीं होता.
दर असल मंहगाई, बेरोजगारी, मंदिर, मस्जिद, हिंदू, मुसलमान, विधान-संविधान, संसद, सांसद, सेवातीर्थ, अडानी, अंबानी, टाटा आदि तो जंगल से इतर मानव समाज में, खासकर भारतीय समाज में होते हैं. जनता को जंगलराज के नामपर भयभीत कर रामराज का सपना दिखाया जाता है. रामराज की परिभाषा गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखी ही ऐसी है कि हर को रामराज के प्रति आकर्षित होकर रामनामी ओढने वाले नेता और दलों को वोट दे देते हैं. और रामराज कभी आता ही नही है.
चलिए अब नये साल में देखना है कि बंगाल से कथित जंगलराज जाता है या नहीं. बंगाल में रामराज आता है कि नहीं. कानून का राज किसी की जरूरत भी ही है. यदि कानून का राज जनता की प्राथमिकता होती तो जनता फ्रीबिज के नाम पर सरकारें चुनती ही नही.

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