संपदा 2.0 की सुस्त रफ्तार, घर बैठे रजिस्ट्री के दावे हो रहे फेल !!!!
संपदा 2.0 की सुस्त रफ्तार, घर बैठे रजिस्ट्री के दावे हो रहे फेल, OTP और सर्वर के चक्कर में 4 घंटे तक भटक रहे लोग
MP News: मध्य प्रदेश में पंजीयन और नामांतरण को सुरक्षित और सुविधाजनक बनाने के लिए 10 अक्टूबर 2024 को शुरू संपदा 2.0 पोर्टल विभागीय उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा। दावे थे कि लोग घर बैठे इससे जमीन की रजिस्ट्री करा सकेंगे, चाहे वह देश में हों या विदेश में। हकीकत ये है कि तीन से चार घंटे रजिस्ट्री में लग रहे हैं।
- भागीय उम्मीदों पर पानी फेर रहा संपदा 2.0
- रजिस्ट्री के तुरंत बाद पटवारी को नहीं मिल रही सूचना
- लंबित हो रहे नामांतरण के केस, जनता में आक्रोश
भोपाल। मध्य प्रदेश में पंजीयन और नामांतरण को सुरक्षित और सुविधाजनक बनाने के लिए 10 अक्टूबर 2024 को शुरू संपदा 2.0 पोर्टल विभागीय उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा। दावे थे कि लोग घर बैठे इससे जमीन की रजिस्ट्री करा सकेंगे, चाहे वह देश में हों या विदेश में। हकीकत ये है कि तीन से चार घंटे रजिस्ट्री में लग रहे हैं। सबसे अधिक दिक्कत ओटीपी नहीं आने की है। कभी संपदा 2.0 का सर्वर डाऊन होने से तो कभी यूआइडीएआइ के सर्वर की धीमी गति के चलते आधार ओटीपी नहीं आता।
दरअसल, ऑनलाइन रजिस्ट्री में ओटीपी सत्यापन की प्रक्रिया लंबी होती है, जिससे लोग रजिस्ट्रार कार्यालय जाकर पंजीयन कराना अधिक आसान मान रहे हैं। इसी तरह से संपत्ति के पंजीयन के लिए उसकी जियो टैगिंग आवश्यक है, लेकिन कुछ जगह जियो फेंसिंग की सीमा और राजस्व सीमा अलग-अलग होने के कारण दूसरे क्षेत्र की लोकेशन आ जाती है। पंजीयन कार्यालय से इसमें मैन्युअली सुधार कराना पड़ता है।
‘नईदुनिया’ ने विभिन्न जिलों में पटवारियों, स्टांप वेंडरों और संपत्ति खरीदने, बेचने, बंधक या बंधकमुक्त कराने वालों से बात की तो इस तरह की दिक्कतों का पता चला। बातचीत में यह भी पता चला है कि कभी-कभी फाइल अपलोड नहीं हो पातीं। बुजुर्गों के थंब इंप्रेशन या रेटिना स्कैन नहीं होने से भी प्रक्रिया अटक जाती है। नामांतरण में नाम परिवर्तन में दिक्कत आती है। राजगढ़ में जिले भर के पटवारियों ने सितंबर में इन समस्याओं को लेकर कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा था।
यह समस्याएं भी
संपदा 2.0 में मिसल बंदोबस्त का रिकार्ड हटा दिया गया। ऐसे में पटवारियों को यह पता करने में परेशानी होती है कि पहले कोई जमीन किसके नाम पर थी। पहले 1959 तक का रिकॉर्ड मिल जा रहा था। खसरा, समग्र आइडी और आधार को लिंक करने में भी कई बार समस्या होती है। जमीन के डायवर्जन के दौरान चालान बनाने के लिए ई-केवायसी की आवश्यकता होती है, जिसमें लिंक नहीं होने से दिक्कत आ रही है।
नामांतरण में ये दिक्कतें
- नई व्यवस्था में एक खसरा के अलग-अलग भाग के सभी भूमि मालिकों को ओटीपी भेजकर सहमति ली जाती है। भले ही क्रेता ने किसी एक भाग को खरीदा है। ऐसे में सभी भूमि मालिकों को खोजना चुनौती है।
- नामांतरण में पटवारी का प्रतिवेदन लगता है। इस रिपोर्ट में कई बार ‘अनआइडेंटिफाइड’ एरर बताने लगता है। इस कारण नामांतरण का प्रकरण लंबित हो जाता है।
- संपदा 1.0 में जमीन की रजिस्ट्री होते ही पटवारी के पास सूचना पहुंच जाती थी, इसमें ऐसा नहीं होने से पटवारी के पास प्रकरण कई दिन लंबित रहता है।
सर्वर में कोई दिक्कत नहीं है। जो भी परेशानी आ रही है वह आधार से जुड़ी है। एमपी इलेक्ट्रॉनिक विकास निगम इस पर काम कर रहा है। दूसरी समस्या जियो टैगिंग, जियो फेंसिंग पर आधारित है। जियो फेंसिंग को लगातार अपडेट किया जाता है। हमारे पास से इसकी जानकारी संबंधित दूसरे विभागों से आती है, जैसे गांव की सीमा राजस्व विभाग और शहर के भीतर की सीमाएं नगरीय प्रशासन विभाग से आती हैं। – स्वप्नेश शर्मा, प्रभारी अधिकारी संपदा (वाणिज्यिक कर)

संपदा 2.0 की सुस्त रफ्तार।