सबकी पसंद होते हैं रीढ वाले नेता !
सबकी पसंद होते हैं रीढ वाले नेता
तानाशाह हों या लोकशाही के मानने वाले, लेकिन दुनिया में पसंद वे ही नेता किए जाते हैं जिनकी रीढ( यानि मेरुदंड) सीधी होती है. ऐसे नेता दुनियां के किसी न किसी मुल्क में पैदा होते रहते हैं. तनकर खडे होने वाले नेता किसी भी मुल्क की थाती होते हैं,फिर चाहे मुल्क आकार में छोटा हो या बडा.
सीधी, सतर न झुकने वाले मेरुदंड वाले नेताओं की फेहरिस्त में नया नाम जुडा है कोलंबिया के राष्ट्रपति पेट्रो का.
पेट्रो ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को खुली चेतावनी दी और ललकारते हुए कहा है कि अगर अमेरिका ने कोलंबिया पर हमला किया या उन्हें गिरफ्तार करने की कोशिश की तो इसका जवाब बेहद खतरनाक होगा.अमेरिका हाल ही में वेनेजुएला पर हमला कर राष्ट्रपति निकोलस मादुरो का अपहरण कर चुका है.कोलंबियाई राष्ट्रपति ने अपने अतीत का ज़िक्र करते हुए चौंकाने वाला बयान दिया. पेट्रो ने कहा, हमने कभी हथियार ना उठाने की कसम खाई थी,लेकिन देश की रक्षा के लिए दोबारा हथियार उठा सकते हैं.
आपको बता दूं कि गुस्तावो पेट्रो 1990 के दशक में हथियार छोड़ने से पहले एक वामपंथी गुरिल्ला संगठन का हिस्सा रह चुके हैं. उनके इस बयान को अमेरिका के खिलाफ खुली जंग की चेतावनी के तौर पर देखा जा रहा है.कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो ने कहा, आ जाओ. मुझे पकड़ने आओ. मैं यहीं तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूं. पेट्रो ने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर अमेरिका ने कोलंबिया पर बमबारी की तो इसका अंजाम बेहद गंभीर होगा. उन्होंने कहा, अगर अमेरिका ने बम गिराए तो पहाड़ों में हज़ारों किसान गुरिल्ला बन जाएंगे.
पेट्रो ने यह भी कहा कि अगर उन्हें गिरफ्तार किया गया तो देशभर में उबाल आ जाएगा. उन्होंने कहा, अगर राष्ट्रपति को हिरासत में लिया गया, जिसे देश का बड़ा हिस्सा प्यार करता है और सम्मान देता है तो जनता का ‘जैगुआर’ खुल जाएगा.
पेट्रो का यह बयान ऐसे वक्त आया है जब कुछ दिन पहले ही वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को अमेरिकी सशस्त्र बलों ने हिरासत में लिया था. इससे पहले अगस्त 2025 में मादुरो भी ट्रंप को खुली चुनौती देते हुए कह चुके थे, आओ और मुझे पकड़ लो.पेट्रो के इस तेवर से साफ है कि मादुरो के बाद अब कोलंबिया भी अमेरिका से सीधे टकराव की राह पर बढ़ता दिख रहा है, जिससे पूरे लैटिन अमेरिका में भू-राजनीतिक तनाव और गहरा सकता है.
आपको स्मरण हो कि इससे पहले यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की भी व्हाइट हाउस में बैठकर मीडिया के सामने राष्ट्रपति ट्रंप साहब को दो टूक जबाब दे चुके हैं. न्यूयोर्क के नवनिर्वाचित मेयर जोहरान ममदानी का नाम भी सीधे मेरुदंड वाले नेताओं में शामिल हो चुका है लेकिन दुर्भाग्य कि ये दर्जा अभी तक भारत के किसी भी नेता को हासिल नहीं हो पाया. वह भी तब जबकि महामहिम ट्रंप आए दिन विश्वगुरु भारत के प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी की आए दिन फिरकी लेते रहते हैं.
दर असल पेट्रो, ममदानी या जेलेंस्की जैसी रीढ पाने के लिए आत्मबल चाहिए न कि संघबल. आत्मबल जनता के बीच रहने से आता है. संघ की शाखा में जाने से आत्मबल नहीं बढता. संघ अपने स्वयंसेवक को आत्ममुग्ध जरूर बना देता है. संघ में भी अनेक संघी हैं जिनकी रीढ झुकने के लिए तैयार नहीं होती, किंतु ऐसे लोग सत्ता प्रतिष्ठान से कोसों दूर होते हैं. प्रधानमंत्री सीधे मेरुदंड वाले नहीं झप्पी मारने वाले नेता के रूप में लोकप्रिय हैं. वे चीन का ‘च’, अमेरिका का ‘अ’, और पाकिस्तान का ‘प’ बोलने से परहेज करते हैं.
भारत में आजादी के पहले से मेरुदंड धारक नेताओं की कमी नहीं थी. 2014 के बाद से भारत इस संकट से जूझ रहा है और लगातार जूझ रहा है, और पता नहीं कब तक जूझता रहेगा. भारत को भी नयी पीढी में पेट्रो, ममदानी, जेलेंस्की जैसे नेता तैयार करने चाहिए, क्योंकि ऐसा नेतृत्व ही समय की मांग है.

