मंदिर -मंदिर बात चली है, पता चला है !
मंदिर -मंदिर बात चली है, पता चला है
भाजपा 45 साल की हो गई है किंतु आज भी मंदिर से मंदिर के बीच भटक रही है. भाजपा के इस मंदिर प्रेम से देश को न पहले भाजपा के पितृ पुरुष लालकृष्ण आडवाणी कुछ दे पाए और न आज की भाजपा के अवतार पुरुष माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी कुछ दे पाए. भाजपा की दृष्टि में भारत का स्वाभिमान सिर्फ और सिर्फ मंदिर हैं.
मुझे याद है कि 35 साल पहले लालजी (आडवाणी ) भाई भी सोमनाथ की शरण में गए थे.गुजरात का सोमनाथ मंदिर हिंदू धार्मिक मान्यताओं में पवित्र माने जाने वाले 12 ज्योतिर्लिंगों में से पहला ज्योतिर्लिंग है. इतिहास और हिंदू धार्मिक मान्यताओं में ख़ास महत्व वाला सोमनाथ मंदिर एक बार फिर भाजपा के लिए नया आश्रय बना है. सोमनाथ में चार दिनों का ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ आयोजित किया गया , जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हुए.
यह उत्सव जनवरी 1026 में सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले हमले के एक हज़ार साल पूरे होने की याद में मनाया जा रहा है ये उत्सव भाजपा सरकार के पैसे से मना रही है. इसीलिए सवाल है. सरकार कहती है कि “यह उत्सव विनाश को याद करते हुए नहीं बल्कि आस्था, सांस्कृतिक आत्मसम्मान और पुनर्जन्म की भावना के सम्मान के रूप में मनाया जा रहा है.”
सोमनाथ मंदिर के, यहां विराजे भोले बाबा के भाजपा पर बडे उपकार हैं.
भाजपा के शैशवकाल मे, सोमनाथ से शुरू हुई आडवाणी की रथ यात्रा भारतीय राजनीति में एक ‘महत्वपूर्ण मोड़’ थी.इस यात्रा के कारण न केवल भाजपा और आडवाणी, बल्कि मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम भी राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया.आपको याद होगा कि
दिसंबर 1989 में हुए लोकसभा चुनावों में भाजपा ने पहली बार अपने चुनावी घोषणापत्र में राम मंदिर (अयोध्या) निर्माण के मुद्दे को शामिल किया था.इसका नतीजा यह हुआ कि इससे पहले हुए लोकसभा चुनावों (साल 1984) में 224 सीटों पर चुनाव लड़कर सिर्फ़ दो सीटें जीतने वाली भाजपा को 1989 के चुनाव में 85 सीटों पर जीत मिल गई थी.
ये घटना देश में ‘हिंदू राष्ट्रवाद के उदय का श्रीगणेश था.ये वो वक़्त था जब एक तरफ देश के कई इलाक़ों में ‘मंडल कमीशन’ (आरक्षण) के समर्थन और विरोध में आंदोलन हो रहे थे, वहीं दूसरी तरफ भाजपा ने ‘अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण’ के मुद्दे पर अपनी सियासत को आगे बढ़ाया.इसके लिए साल 1991 में, जब लाल कृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक अपनी रथ यात्रा शुरू की, तो आज के प्रधानमंत्री मोदी को यात्रा के गुजरात चरण की जिम्मेदारी दी गई थी.
इतिहास गवाह है कि जब आडवाणी और प्रमोद महाजन सोमनाथ मंदिर के पास वेरावल पहुंचे, तो उन्हें वहां पार्टी का कोई पोस्टर या झंडा नहीं दिखा. पार्टी में यह चिंता भी थी कि शायद यात्रा की तैयारियां ठीक से नहीं हुई थीं. लेकिन जब अगले दिन यात्रा शुरू हुई, तो हज़ारों लोग सड़कों पर थे. “समाज के हर वर्ग ने इसमें भाग लिया. पहली बार भाजपा उन लोगों तक पहुंची जिन तक संघ नहीं पहुंचा था.
अयोध्या में राममंदिर बनने के बाद भाजपा के हाथ खाली थे. सरकार की विफलताएं भाजपा के लिए मुश्किलें बढा रहीं थी, ऐसे में मोदीजी को फिर सोमनाथ की याद आ गई. उनकी टीम ने इसी साल देश पांच-छह राज्यों में विधानसभा चुनाव जीतने के लिए सोमनाथ को टूल बनाने का फैसला किया. इसी साल गुजरात में स्थानीय निकायों के चुनाव भी होंगे. इसे ध्यान में रखते हुए भाजपा ने सोमनाथ पर आक्रमण की 1000वीं वर्षगांठ को एक बड़ा आयोजन बनाने और इससे अधिक से अधिक राजनीतिक लाभ उठाने की रणनीति तैयार की है.
प्रधानमंत्री ने त्रिपुंड और डमरू धारण कर ने इस पूरे आयोजन को बहुत ही ‘भव्य’ रूप देकर इसे राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बना दिया है.भाजपा ने मुस्लिम आक्रमणकारियों की क्रूरता और हिंदू समुदाय की वीरता को एक साथ पिरोकर इस पूरी घटना को एक नया रूप दे दिया है, जो लोगों को प्रभावित करता है. इस आयोजन के ज़रिए भाजपा को अपनी कट्टर हिंदू राजनीति को फिर से दिखाने का एक और मौक़ा मिल गया है.
स्वाभिमान पर्व के मंच से भी प्रधानमंत्री ने वह कहानी फिर से फैलाने की कोशिश की,कि पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू मंदिर निर्माण के ख़िलाफ़ थे.यह कार्यक्रम एक बार फिर इस बात की ओर ध्यान दिलाता है कि ‘प्रधानमंत्री मोदी यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि वे नेहरू से बेहतर शासक’ हैं.
आपको पता ही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा नेहरू की आलोचना या उन्हें बदनाम करने का कोई मौका नहीं छोड़ते. यह कार्यक्रम भी इसी का हिस्सा दिखाई देता है. यह माहौल इस उद्देश्य के लिए उपयुक्त है और इसमें हर तरह की सही-ग़लत की झलक दिखाई दे रही है. इस अवसर का पूरा उपयोग उसी मक़सद को हासिल करने के लिए किया जा रहा है.
भाजपा के रणनीतिकारों को पता है कि अब जो सवाल उठेंगे, वो सरकार के प्रदर्शन से जुड़े होंगे. विदेश नीति, भारत के अमेरिका और अन्य देशों के साथ संबंध और उसकी चुनौतियों से जुड़े सवाल होंगे. भारत की आर्थिक नीति से संबंधित सवाल भी पूछे जाने लगे हैं.और किसी भी सवाल का जबाब भाजपा के पास नहीं है. यदि है तो ले देकर एक छद्म स्वाभिमान. एक मंदिर. अब देखना है कि मंदिर-मंदिर खेलकर कितने दिनों नेहरू और दूसरी चुनौतियों का सामना करती है?

