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चुनावों से पहले विपक्षी दल ही क्यों निशाने पर रहते हैं?

चुनावों से पहले विपक्षी दल ही क्यों निशाने पर रहते हैं?

क्या ईडी और अन्य जांच एजेंसियां चुनावों से ठीक पहले विपक्ष को निशाना बनाती हैं? प्रथमदृष्टया, इस सवाल पर ईडी- और भाजपा की भी- दलील सैद्धांतिक रूप से तो सही लगती है कि भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई चुनावी चरणों के हिसाब से तय नहीं की जा सकती। यदि कहीं गड़बड़ दिख रही है तो राजनीतिक कैलेंडर की परवाह किए बिना जांच होनी चाहिए। इसे किसी की सहूलियत के लिए रोका नहीं जाए।

लेकिन, फिर क्या यह महज संयोग है कि चुनावों से पहले विपक्षी दलों को ही लगातार निशाना बनाया गया है, जबकि केंद्र में सत्ताधारी दल को ऐसी जांच का सामना नहीं करना पड़ता? संविधान कहता है कि जांच एजेंसियां बिना किसी भय और पक्षपात के काम करें। किसी भी पक्ष को राजनीतिक लाभ देने के बजाय अपने दायित्व का पालन करें। फिर भी, बीते एक दशक के राजनीतिक नैरेटिव की थाह लें तो यह धारणा मजबूत होती है कि ईडी और सीबीआई न्याय के साधन से ज्यादा राजनीति के औजार की तरह काम कर रही हैं।

राजनीति में आम धारणा ही व्यवहार, विश्वास और निष्पक्षता की उस भावना को गढ़ती है, जिस पर लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा टिकी है। जब लाखों वोटरों को यह लगने लगे कि चुनावी मैदान बराबरी का नहीं है तो नतीजों की वैधता और लोकतांत्रिक चेतना, दोनों खतरे में पड़ जाती हैं। इसलिए केंद्रीय एजेंसियों के पक्षपात की धारणा को महज शिकायत की तरह नहीं देखना चाहिए, यह लोकतंत्र में समान भागीदारी की भावना से जुड़ी है।

पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले टीएमसी की राजनीतिक कंसल्टेंसी फर्म आई-पैक पर छापेमारी से यह धारणा बलवती ही हुई है। मामला फिलहाल अदालत में विचाराधीन है। ‘आप’ को भी राज्य और केंद्र के चुनावों के बीच ईडी और सीबीआई की ऐसी ही कार्रवाई का सामना करना पड़ा था। तमिलनाडु में 2021 के विधानसभा चुनावों के दौरान डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन के परिवार के सदस्यों पर आयकर छापे पड़े और कई मंत्रियों पर ईडी की जांच भी हुई।

बीते एक दशक में हुई ऐसी कार्रवाइयों को चुनावी परिदृश्य से अलग करके देख पाना मुश्किल है। स्पष्ट नजर आता है कि जांच एजेंसियां किसी राजनीतिक शून्य में काम नहीं करतीं। खासतौर पर चुनावों के समय जब वे प्रमुख नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करती हैं- चाहे जानबूझकर या संयोगवश- तो इसके राजनीतिक परिणाम सामने आते ही हैं।

2014 से उपलब्ध आंकड़ों का विश्लेषण दिखाता है कि सीबीआई और ईडी द्वारा दर्ज किए मामलों में लगभग 95% विपक्षी नेताओं के खिलाफ हैं। ईडी की कार्रवाइयों में भी बहुत बढ़ोतरी हुई है। 2014 तक के दशक में ईडी की छापेमारियों की संख्या सौ के आसपास थी, जो 2014 के बाद के दशक में हजारों तक पहुंच गई।

और ये तब है, जब मौजूदा केंद्रीय मंत्रिपरिषद के 72 में से 29 मंत्रियों (लगभग 40%) पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। ये जानकारी स्वयं उन्हीं मंत्रियों ने निर्वाचन आयोग को अपने शपथ पत्रों में दी है। इनमें हत्या, हत्या का प्रयास, अपहरण, चोरी और धोखाधड़ी जैसे आरोप शामिल हैं। क्या इन मामलों की भी उतनी ही सख्ती और तेजी से जांच हुई है?

राजनीतिक परिदृश्य में एक ही पक्ष पर यह व्यवस्थित दबाव भले ही सहज रूप से मंशा को साबित नहीं करता, लेकिन यह गैर-बराबरी की धारणा को जरूर मजबूत करता है। जिस तंत्र में पहले से ही संस्थानों पर भरोसा कम है, वहां ऐसी धारणा लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा में निष्पक्षता को लेकर गहरी शंकाओं में बदल जाती है।

ध्यान रहे कि यहां हम आरोपों के गुण-दोषों पर बहस नहीं कर रहे हैं। इसके लिए तो जांच जरूरी है ही। लेकिन किसी भी लोकतंत्र में अगर एक पक्ष संस्थागत तटस्थता का भरपूर लाभ उठाए और दूसरे पक्ष पर चुनाव प्रचार अभियान के दौरान भी जांच की मार पड़ती रहे तो समान अवसर मिलने की भावना कमजोर पड़ती है।

केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप महज व्यक्तिगत मसला नहीं, यह भरोसे का सवाल है। भरोसा- निष्पक्षता का, कानून के समक्ष समानता का और लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा में ईमानदारी का। जब यह भरोसा टूटता है तो इसका दबाव पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर महसूस होता है।

ऐसे में किसी लोकतंत्र को खुद से एक गहरा सवाल पूछना चाहिए कि क्या हमारी संस्थाएं ताकतवर के साथ ही निष्पक्ष भी हो सकती हैं? अगर नहीं तो उनमें सुधारों की जरूरत है। मसलन, स्पष्ट कानूनी सुरक्षा, नियुक्ति प्रक्रियाओं की स्वतंत्रता, ठोस न्यायिक निगरानी और चुनावी प्रक्रियाओं के संदर्भ में कार्रवाई की समय-सीमा को लेकर पारदर्शी प्रोटोकॉल।

जब वोटरों को लगने लगे कि चुनावी मैदान बराबरी का नहीं है तो नतीजों की वैधता और लोकतांत्रिक चेतना, दोनों खतरे में पड़ जाती हैं। इसलिए केंद्रीय एजेंसियों के पक्षपात की धारणा को शिकायत की तरह नहीं देखना चाहिए।

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