नए साल के शुरू में ही पश्चिम बंगाल में राजनीतिक रार और उसमें संवैधानिक प्रविधानों-परंपराओं को ताक पर रख देना बता रहा है कि साल 2026 भारतीय राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होने जा रहा है। इस साल चार राज्यों-बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल तथा केंद्रशासित प्रदेश पुदुचेरी में विधानसभा चुनाव होने हैं। इनमें से तीन में आईएनडीआईए के घटक दलों की सरकारें हैं, जबकि दो में भाजपानीत राजग की।

इन राज्यों की सत्ता में होने वाला बदलाव राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य पर भी असर डालेगा, क्योंकि विधानसभाओं के गणित से संसद के उच्च सदन राज्यसभा में संख्या बल प्रभावित होगा। इसी साल राज्यसभा की 75 सीटों के लिए भी चुनाव होने हैं। साल की शुरुआत देश की सबसे अमीर महानगर पालिका मुंबई यानी बीएमसी समेत महाराष्ट्र के 29 नगर निकाय चुनावों से हुई है। बीएमसी चुनाव में भाजपा को पहली बार जीत मिली है और ठाकरे बंधुओं-उद्धव और राज को साथ आने के बाद भी हार का सामना करना पड़ा है।

महत्वपूर्ण तो हर राज्य की सत्ता होती है, पर देश की निगाहें फिलहाल पश्चिम बंगाल पर टिकी हैं। ग्यारह साल से केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा और डेढ़ दशक से बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के बीच राजनीतिक कटुता चरम पर है। घुसपैठ, एसआईआर और भ्रष्टाचार पर तो तकरार बरकरार है ही, आई-पैक के चेयरमैन के दफ्तर पर ईडी के छापे और उसी बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के वहां पहुंच कर कुछ दस्तावेज ले जाने के बाद बंगाल की सत्ता का संघर्ष चुनाव से पहले ही सड़कों पर नजर आ रहा है।

ममता इसे केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा के इशारे पर तृणमूल कांग्रेस की चुनावी रणनीति पर ईडी का डाका बता रही हैं तो केंद्र सरकार और भाजपा इसे सरकारी एजेंसी के कामकाज में एक मुख्यमंत्री द्वारा अवरोध डालने का अभूतपूर्व मामला बता रहे हैं। कांग्रेस और वाम मोर्चा अब बंगाल की राजनीति में हाशिये पर हैं। सत्ता की लड़ाई तृणमूल और भाजपा के बीच है। पिछले चुनाव में खुद ममता को हरा कर भाजपा सनसनी फैलाने में तो सफल रही, लेकिन 294 सदस्यीय विधानसभा में 77 सीटों तक ही पहुंच पाई। तृणमूल 215 सीटें जीत गई। तृणमूल को 48 और भाजपा को 38 प्रतिशत मत मिले थे।

2024 के लोकसभा चुनाव में यह फासला बढ़ गया। यही फासला तय करना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती है। तीन कार्यकाल के बाद सत्ता विरोधी भावना स्वाभाविक है, पर ममता के ‘बांग्ला अस्मिता’ के मुद्दे की काट भाजपा नहीं कर पा रही। एसआईआर और घुसपैठिया विवाद के बीच अगर भाजपा बंगाल में महाराष्ट्र और बिहार की पुनरावृत्ति कर पाई तो उसका राष्ट्रीय राजनीति पर भी दूरगामी असर होगा।

दूसरा बड़ा और मुश्किल राज्य तमिलनाडु है। वहां द्रमुक की सरकार है, जो ‘इंडिया’ का घटक दल है। दशकों से तमिल राजनीति द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच बंटी रही, लेकिन जयललिता के निधन के बाद परिदृश्य बदला है। अन्नाद्रमुक और अभिनेता विजय के इर्दगिर्द भाजपा चुनावी बिसात बिछाना चाहती है, पर किसी चमत्कार की खुशफहमी उसे भी नहीं है। उत्तर भारत में भाजपा की लहर चलाने वाले मुद्दे दक्षिण में अभी तक तो नहीं चले हैं। एमके स्टालिन सरकार के विरुद्ध सत्ता विरोधी भावना के अलावा वंशवाद, भ्रष्टाचार और हिंदी विरोध सरीखे मुद्दे भी हैं, पर उनका चुनावी लाभ उठाने के लिए विश्वसनीय विकल्प भी चाहिए। भाजपा की रणनीति फिलहाल गठबंधन के जरिये मत प्रतिशत बढ़ाने की ज्यादा लगती है।

पिछले लोकसभा चुनाव में अभिनेता सुरेश गोपी के सांसद बनने और हाल में तिरुवनंतपुरम में अपना मेयर बनाने के करिश्मे के बावजूद भाजपा केरल में हाशिये पर ही है। केरल में सत्ता राजनीति वाम मोर्चा ‘एलडीएफ’ और कांग्रेसी मोर्चा ‘यूडीएफ’ के बीच बंटी है। हालांकि हर चुनाव में सरकार बदल जाने का सिलसिला पिछली बार वामपंथी मुख्यमंत्री पिनरई विजयन ने तोड़ दिया। इस बार उनके विरुद्ध ज्यादा सत्ता विरोधी भावना की उम्मीद है, पर उसका चुनावी लाभ कांग्रेस को ही मिल सकता है। अपने अंतिम दुर्ग की सत्ता से विदाई वाम राजनीति के लिए बड़ा झटका साबित होगी। वहीं असम पूर्वोत्तर भारत की राजनीति का प्रवेश द्वार माना जाता है।

वहां की सत्ता कब्जाने के बाद ही भाजपा का पूर्वोत्तर में विस्तार हुआ, जिसका श्रेय पूर्व कांग्रेसी हिमंता बिस्वा सरमा को जाता है। बंगाल की तरह असम में भी घुसपैठ बड़ा चुनावी मुद्दा है, जिस पर आक्रामकता के साथ कांग्रेस को भाजपा घेरती रही है। कांग्रेस की सारी उम्मीदें वहां गौरव गोगोई के नेतृत्व तथा क्षेत्रीय दलों से तालमेल पर टिकी हैं। पुदुचेरी की राजनीति अक्सर तमिलनाडु की राह चलती रही है, लेकिन 2021 से वहां भाजपा समर्थित एन रंगासामी सरकार है।

30 सदस्यीय पुदुचेरी विधानसभा में 10 सीटें जीतने वाली ऑल इंडिया एनआर कांग्रेस ने छह सीटें जीतने वाली भाजपा के साथ मिल कर सरकार बनाई। अगर कांग्रेस और द्रमुक सत्ताविरोधी भावना का लाभ उठाते हुए आगामी चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करते हैं तो भाजपा को दक्षिण भारत में अपना एकमात्र शेष सत्ता दुर्ग भी गंवाना पड़ सकता है। ये विधानसभा चुनाव परिणाम भाजपा की भावी चुनावी तैयारियों पर भी असर डालेंगे, लेकिन आईएनडीआईए का तो भविष्य ही एकता और सफलता पर निर्भर करेगा, क्योंकि चुनाव-दर-चुनाव उसमें दरारें बढ़ती जा रही हैं।