एन आर सी से यूजीसी तक बवाल और सवाल !
एन आर सी से यूजीसी तक बवाल और सवाल
नाच न जाने,तो आंगन टेढा हो ही जाता है. मौजूदा बैशाखी सरकार के साथ ये समस्या 2014 से बनी हुई है. सरकार जो भी नया कानून बनाती है, उसे लेकर या तो सवाल उठते हैं या बवाल हो जाता है. पहले एन आर सी फिर किसान कानून, फिर नागरिकता कानून और अब यूजीसी को लेकर देश उबल रहा है.पहले सोशल मीडिया पर इसके विरोध में #यूजीसी रोलबैक ट्रेंड होना शुरू हुआ. फिर इसके खिलाफ लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए और इसे भेदभाव बढ़ाने वाला नियम बताया जा रहा है.
पहले के कानून अल्पसंख्यक और किसान विरोधी थे, यूजीसी सवर्ण विरोध बताया, माना और समझा जा रहा है.बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने तो यूजीसी के इस बदलाव के विरोध में इस्तीफा ही दे दिया. लोग देश के सत्तारूढ दल के नेताओं पर गुस्सा निकाल रहे हैं. आज की तारीख में यूजीसी ने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद विवाद को फीका कर दिया है.
सवाल ये है कि सरकार को बार-बार नये कानून बनाने की जरुरत महसूस क्यों होती है? यही सवाल यूजीसी को लेकर है कि आखिर यूजीसी जो नया नियम लेकर आया है वो क्या है और उसे बनाने की जरूरत क्यों पड़ी ? यूजीसी ने 13 जनवरी को एक नया नियम लागू किया है. इसका नाम ‘प्रमोशन आफ इक्विलिटी इन हायर एजुकेशन इंस्टिट्यूशन रेग्यूलेशन 2026 . इसको लेकर बवाल मचा हुआ है. सामान्य वर्ग अर्थात सवर्ण समाज इससे खासे खफा हैं. आपको याद होगा कि ऐसा ही बवाल मंडल आयोग की सिफारिशों को लेकर भी फूटा था.लेकिन जनता के हर गुस्से को सरकार या तो कुचल देती है या राष्ट्रद्रोह कह देती है
नये यूजीसी नियमों के विरोध में इस्तीफा देने वाले बरेली के मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने तो यहां तक कहा कि इस नए कानून के जरिए यूजीसी ने कॉलेज और यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले सामान्य वर्ग के छात्रों को स्वघोषित अपराधी बना दिया है. मैं नहीं कहता कि नये नियम को लेकर अलंकार अग्निहोत्री सही हैं या गलत. किंतु यूजीसी का कहना है कि नए नियम की जरूरत एससी, एसटी और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों के साथ होने वाले जातिगत भेदभाव रोकना और निगरानी रखना है.
मेरे ख्याल से यूजीसी को नये नियम बनाने की कोई जरुरत ही नहीं थी, क्योंकि जिस तरह से सरकार शिक्षा का भगवाकरण कर रही है वो बिना नियम के ही हो रहा है. सरकार को यूजीसी में जो नवाचार करने थे वे भी बिना नये नियम के हो जाते. मसलन सभी यूनिवर्सिटी, कॉलेज और उच्च शिक्षण संस्थानों को परिसर में निशियाम हेल्पलाइन, समान अवसर केंद्र, दस्ते और समितियां चुपचाप बन जाती. अगर कोई भी संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करता है तो यूजीसी उनकी मान्यता रद्द करने या फंड रोकने जैसी सख्त कार्रवाई कर सकता है.
आपको याद होगा कि यूजीसी राजनीतिक दबाव में पिछले दिनों ही जम्मू कश्मीर में एक मेडीकल कालेज पर ताले जड चुकी है. तब इन्ही लोगों ने ढोल-मजीरे बजाए थे जो आज नये नियमों को लेकर छाती पीट रहे हैं. मुझे लगता है कि रुपये की गिरती कीमत और धर्माचार्यों के अपमान के मुद्दे को फीका करने के लिए सरकार के चाणक्यों ने खुद ये चिंगारी सुलगाई है.
यूजीसी के इस नियम को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए एक जनहित याचिका भी दायर की गई है. इसमें कहा गया है कि यूनिवर्सिटी अनुदान आयोग ने 13 जनवरी को जिस नए नियम को अधिसूचित किया है उसका 3(C) भेदभाव बढ़ाने वाला है. याचिकाकर्ता ने इस नियम को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की है.
यूजीसी के अनुसार इस नए नियम की जरूरत उच्च शिक्षण संस्थानों में पिछड़ी और अनुसूचित जाति और जनजातियों के खिलाफ बढ़ते भेदभाव के मामले को रोकने के लिए पड़ी. 2020 से 2025 के बीच जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतों में 100 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी हो गई थी. इसके अलावा इस नियम को बनाने के पीछे रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसे मामलों में की गई सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को भी वजह बताया गया.सरकार इन नियमों के जरिये अजा, अजजा और पिछडी जातियों को ठीक वैसे लुभाना चाहती हैं जैसे छोटे बच्चे को कोई थाली में पानी भरकर चंंदा दिखाता है
मुझे नहीं पता कि यूजीसी के नये नियमों को लेकर उपजे असंतोष को लाठी, गोली के दम पर दबा लेगी. अब सरकार को या तो नियम वापस लेना पडेंगे या फिर सवर्णों में भी उमर खालिद जैसे पढे लिखे लोगों का मुकाबला करना होगा. आखिर हर मनमानी की हद होती है. सब कुछ राजनीति के लिए नही किया जा सकता. इससे पहले की यूजीसी के नये नियमों के विरोध में राजनीतिक दल खडे हों सरकार भूल सुधार कर ले अन्यथा नुकसान ही नुकसान होना तय है.

