पार्टी, सरकार और संघ के कामकाज का नया मॉडल ?
भाजपा के नए अध्यक्ष नितिन नबीन की उम्र लगभग उतनी ही है, जितनी कि स्वयं पार्टी की। प्रधानमंत्री ने इस बात को छिपाया नहीं है कि पार्टी की मंशा युवा पीढ़ी पर ध्यान केंद्रित करने और उसका समर्थन हासिल करने की है। नबीन को चुनकर भाजपा नेतृत्व ने गियर बदला है। पार्टी अब संगठन के भीतर से उभरे कार्यकर्ताओं को महत्व देने की ओर लौटती दिख रही है।
एक व्यवस्था स्थापित कर दी गई है। नेतृत्व प्रधानमंत्री द्वारा ही प्रदान किया जाएगा और पार्टी अमित शाह की निगरानी में काम करती रहेगी। वहीं नबीन पार्टी-सरकार-संघ के कामकाज के एक नए मॉडल का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्हें उन राज्यों में संगठन को मजबूत करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है, जहां पार्टी अभी कमजोर है और जहां 2026 और 2027 में चुनाव होने हैं।
देखें तो नितिन नबीन का उदय सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं है, जहां भाजपा उपयुक्त समय आने पर सरकार का नेतृत्व करने की उम्मीद कर रही है। उनकी जाति (कायस्थ) भी ऊंची जातियों को आश्वस्त करती है, जो ओबीसी और दलितों के पक्ष में भाजपा द्वारा अपनाई जा रही पहचान-आधारित राजनीति से असंतुष्ट हैं।
नबीन की पदोन्नति केवल पार्टी कार्यकर्ता को महत्व देने तक ही सीमित नहीं है, ताकि जमीनी कार्यकर्ताओं में उत्साह पैदा किया जा सके। भाजपा अब ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है, जब वह देश के पूर्व और दक्षिण दोनों हिस्सों में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रही है। इसके लिए पार्टी को ऐसे ऊर्जावान नेतृत्व की जरूरत है, जो उसके संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित कर सके।
वर्षों से पार्टी की कमान राष्ट्रीय कद के दिग्गजों के हाथों में रही है। इसकी शुरुआत 1980 में भाजपा के पहले अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी से हुई थी। वाजपेयी ने नई पार्टी के मंत्र के रूप में गांधीवादी समाजवाद को सामने रखा था, ताकि उसे मध्यपंथी दिशा में ले जाया जा सके। यह दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित पार्टी के वैचारिक आधार से अलग था। वाजपेयी और आडवाणी ने पुराने जनसंघ को पुनर्जीवित करने का विकल्प नहीं चुना, जिसने आपातकाल के बाद 1977 के चुनावों में इंदिरा गांधी को सत्ता से हटाने वाली जनता पार्टी में अपनी पहचान विलीन कर दी थी।
1984 में लोकसभा में भाजपा के मात्र दो सीटों पर सिमट जाने के बाद वाजपेयी ने 1986 में आडवाणी के लिए रास्ता छोड़ दिया। पार्टी में आडवाणी युग की शुरुआत हुई और वे तीन बार अध्यक्ष बने। उनके बाद मुरली मनोहर जोशी, कुशाभाऊ ठाकरे, बंगारू लक्ष्मण, जना कृष्णमूर्ति, वेंकैया नायडू, राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी ने पार्टी की कमान संभाली।
2019 में अमित शाह अध्यक्ष बने, जिनके नेतृत्व में पार्टी का अभूतपूर्व विस्तार हुआ। उनके बाद अध्यक्ष बने जेपी नड्डा को पार्टी के लिए भाग्यशाली माना गया। हालांकि उनका कार्यकाल 2023 में समाप्त हो गया था, लेकिन 2024 के आम चुनावों तक उन्हें विस्तार दिया गया। चुनावों के बाद पार्टी नेतृत्व और संघ नेतृत्व के बीच इस बात पर सहमति नहीं बन पाई कि पार्टी की कमान किसे सौंपी जाए। कई नामों पर चर्चा हुई। लेकिन बताया जाता है कि दिसंबर 2025 में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में अमित शाह और मोहन भागवत की मुलाकात के बाद नबीन के नाम पर अंतिम मुहर लगी।
संघ हमेशा से संगठन को प्राथमिकता देने का पक्षधर रहा है और उससे गहराई से जुड़े नबीन पुराने ढर्रे के कार्यकर्ता हैं। उन्होंने चार विधानसभा चुनाव जीते हैं, जिससे उन्हें जन-राजनीति की गतिशीलता की समझ है। साथ ही वे संगठन के ‘नट-बोल्ट’ संभालने वाले व्यक्ति भी रहे हैं। हालांकि, नीतीश सरकार में मंत्री रहने के बावजूद वे ऐसा चेहरा नहीं थे, जो बिहार से बाहर व्यापक रूप से पहचाना जाता हो।
नबीन को चुनकर पार्टी अब संगठन के भीतर से उभरे कार्यकर्ताओं को महत्व देने की ओर लौटती दिख रही है। एक व्यवस्था स्थापित कर दी गई है। नबीन पार्टी-सरकार-संघ के कामकाज के एक नए मॉडल का प्रतिनिधित्व करने वाले हैं।

