कौन संभालेगा अजित पवार की विरासत?
कौन संभालेगा अजित पवार की विरासत?
पत्नी से भतीजे युगेंद्र तक, जानें बारामती विधानसभा सीट पर अब किसकी दावेदारी
1952: कांग्रेस के गुलाबराव मुलिक पहले विधायक चुने गए थे।
1957: चुनाव में पीडब्ल्यूपी के नानासाहेब जगताप ने जीत हासिल की।
1962: कांग्रेस की मालतीबाई शिरोले यहां से विधायक बनीं।
2. शरद पवार युग का उदय (1967-1991)
1967-1990: शरद पवार ने 1967 में पहली बार बारामती से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। बारामती को पवार परिवार का गढ़ बनाने में शरद पवार का अहम योगदान रहा और वे 1972, 1978, 1980, 1985 और 1990 में भी यहां से जीते। हालांकि, उनकी यह जीत तब कांग्रेस, कांग्रेस (यू) और भारतीय कांग्रेस (समाजवादी) के टिकट पर आई।
1991: अजित पवार ने पहली बार उपचुनाव में इस सीट पर कब्जा किया और तब से वे लगातार यहां का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। उन्होंने 1991, 1995, 1999, 2004, 2009, 2014, 2019 और 2024 के चुनावों में लगातार जीत हासिल की है। इन चुनावों में उन्होंने बड़े अंतर से जीत हासिल की है।
4. 2024 का ऐतिहासिक ‘पवार बनाम पवार’ मुकाबला
पारिवारिक विभाजन: 2023 में राकांपा में विभाजन के बाद, 2024 के विधानसभा चुनाव में पहली बार पवार परिवार के दो सदस्य आमने-सामने थे। अजित पवार (राकांपा) का मुकाबला उनके भतीजे युगेंद्र पवार (राकांपा-एसपी) से हुआ। अजीत ने 1,00,899 मतों के अंतर से जीत हासिल की।
ऐसे में माना जा रहा है कि सुप्रिया सुले फिलहाल अपनी संसदीय सीट कायम रखेंगी। हालांकि, अजित पवार की बारामती की विरासत संभालने के लिए अभी भी कई नाम आगे हैं। इनमें उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार से लेकर उनके दो बेटे और अजित पवार के भतीजे तक शामिल हैं।
अजित पवार की पत्नी और राज्यसभा सांसद सुनेत्रा पवार को बारामती में अपने पति की विरासत संभालने का बड़ा दावेदार माना जा रहा है। सुनेत्रा अभी राज्यसभा सांसद हैं और बारामती टेक्सटाइल कंपनी की अध्यक्ष भी हैं। वे इससे पहले बारामती लोकसभा सीट से चुनाव लड़ चुकी हैं और सुप्रिया सुले के 51% वोटों के मुकाबले 40% वोट जुटा चुकी हैं।
2. पार्थ पवार
अजित पवार के बड़े बेटे पार्थ को भी उनके संभावित उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, राजनीति में वह काफी समय तक सक्रिय नहीं रहे। पार्थ पवार आमतौर पर पिता की तरह जमीन पर उतरते और राजनीतिक प्रचार करते नहीं दिखे हैं। हालांकि, 2025 में पुणे के मुंधवा जमीन सौदे को लेकर भी उनका नाम चर्चा में आया था। उन्होंने 2019 में मावल निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा चुनाव लड़ा था, हालांकि उन्हें हार का सामना करना पड़ा। अब उन्हें अजित पवार के समर्थकों के लिए एक युवा और स्थायी चेहरे के रूप में पेश किया जा सकता है।
अजित पवार के छोटे बेटे जय पवार अब तक राजनीति में नहीं उतरे हैं। अगर वे चुनावी मैदान में उतरते हैं, तो वे पवार परिवार के सातवें सदस्य होंगे जो सक्रिय चुनावी राजनीति का हिस्सा होंगे। जय पवार भले ही अब तक राजनीति में नहीं उतरे हैं, लेकिन अजित पवार ने कुछ समय पहले खुद संकेत दिया था कि अगर कार्यकर्ताओं और जनता की इच्छा हो, तो जय पवार उनकी पारंपरिक बारामती विधानसभा सीट से चुनाव लड़ सकते हैं। हाल के समय में जय ने बारामती के ग्रामीण क्षेत्रों का दौरा करना और ग्रामीणों के साथ बातचीत करना शुरू कर दिया है। इसे राजनीतिक हलकों में उनके ‘सॉफ्ट-लॉन्च’ (राजनीति में प्रवेश की शुरुआत) के रूप में देखा जा रहा है।
4. रोहित पवार
पवार परिवार में अंदरूनी टकराव का इतिहास लंबा है। हालांकि, चुनाव में इस परिवार के सदस्य गिने-चुने मौकों पर ही आमने-सामने रहे हैं। पहला मौका सुप्रिया सुले और सुनेत्रा पवार का मुकाबला था। वहीं, दूसरा मौका 2024 में ही आया, जब अजित पवार को बारामती सीट पर उनके भतीजे युगेंद्र ने चुनौती दे दी। युगेंद्र पवार ने बारामती से अजित पवार के खिलाफ चुनाव लड़ा, हालांकि उन्हें यहां एक लाख से ज्यादा वोटों से हार मिली थी। इसके बावजूद वे बीते कुछ चुनावों में अजित पवार के खिलाफ सबसे ज्यादा वोट (29 फीसदी) जुटाने वाले नेता बने। जब युगेंद्र पवार ने 2024 महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार किया तो बारामती के कार्यकर्ताओं के बीच वे नवा दादा (नए दादा) के नाम से लोकप्रिय हुए। उन्हें यहां अजित पवार (जिन्हें दादा कहा जाता है) की राजनीतिक विरासत के विकल्प के रूप में देखा जाता है। ऐसे में अटकलें लगने लगीं कि अजित पवार की काट ढूंढने के लिए शरद पवार खुद उन्हें तैयार कर रहे हैं।

