इंदौर ICSE स्कूल से निष्कासित छात्र पर SC की दखल, MP सरकार सहित सभी पक्षों को दिया नोटिस !!!!
इंदौर ICSE स्कूल से निष्कासित छात्र पर SC की दखल, MP सरकार सहित सभी पक्षों को दिया नोटिस
MP News: इंदौर के एक निजी आईसीएसई स्कूल से निकाले गए 14 वर्षीय छात्र के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि बच्चे की शिक्षा बाधित नहीं होनी चाहिए और यह मामला केवल अनुशासन का नहीं है.
मध्य प्रदेश के इंदौर के एक निजी आईसीएसई स्कूल से निकाले गए 14 वर्षीय छात्र के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप करते हुए कड़ा रुख अपनाया है. इसमें MP सरकार के स्कूल विभाग के प्रिंसिपल सेकेट्री, ICSE बोर्ड, लिटिल वंडर्स कॉन्वेंट स्कूल, मध्यप्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग, इंदौर कलेक्टर और जिला शिक्षा अधिकारी को नोटिस जारी किया है. अदालत ने सभी संबंधित पक्षों से 13 फरवरी 2026 तक यह स्पष्ट करने को कहा है कि छात्र को परीक्षा में शामिल कराने की व्यवहारिक व्यवस्था कैसे की जा सकती है.
‘बच्चे की शिक्षा नहीं होनी चाहिए बाधित’- सुप्रीम कोर्ट
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरथना और उज्जल भुयान की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि बच्चे की शिक्षा बाधित नहीं होनी चाहिए और यह मामला केवल अनुशासन का नहीं, बल्कि छात्र के शैक्षणिक भविष्य से सीधे जुड़ा है. इसलिए त्वरित समाधान आवश्यक है.
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि सभी प्राधिकरण अपने-अपने स्तर पर यह बताएं कि —
- छात्र को बोर्ड परीक्षा में शामिल कराने का तरीका क्या होगा?
- किस संस्था की क्या जिम्मेदारी होगी?
- शिक्षा जारी रखने के लिए कौन-सी वैकल्पिक व्यवस्था संभव है?
- अदालत ने संकेत दिए कि समाधान ऐसा हो जिससे छात्र का शैक्षणिक वर्ष और परीक्षा प्रभावित न हों.
दरअसल यह पूरा प्रकरण एक 14 वर्षीय छात्र से जुड़ा है, जिस पर आरोप है कि उसने अपने दो दोस्तों के साथ मिलकर इंस्टाग्राम पर एक निजी अकाउंट बनाया और शिक्षकों के खिलाफ आपत्तिजनक मीम्स साझा किए. स्कूल प्रबंधन ने इस आधार पर छात्र को आगे की कक्षाओं से वंचित/निष्कासित कर दिया. उल्लेखनीय है इंदौर हाई कोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद याची ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है.
कथित कदाचार की तुलना में दी गई सजा असंगत और अनुपातहीन है
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता निपुण सक्सेना ने दलील दी कि कथित कदाचार की तुलना में दी गई सजा पूरी तरह असंगत और अनुपातहीन है. उन्होंने कहा कि आरोप सिद्ध नहीं हुए, फिर भी निचली अदालतों ने यह मान लिया कि मीम्स उसी छात्र ने साझा किए. 13–14 साल के बच्चे पर आपराधिक मंशा (mens rea) नहीं थोपी जा सकती. इस तरह की कार्रवाई से स्कूलों को बच्चों के मोबाइल और निजी जीवन पर असीमित निगरानी का अधिकार मिल जाएगा. उन्होंने यह भी बताया कि हाईकोर्ट ने बच्चे के पश्चाताप को स्वीकार किया, लेकिन समाज को सख्त संदेश देने की बात कहते हुए राहत नहीं दी.
वहीं अब मामले की अगली सुनवाई 13 फरवरी 2026 को होगी. सभी पक्ष अपने जवाब दाखिल करेंगे, जिसके बाद अदालत छात्र को परीक्षा में शामिल कराने और निष्कासन की वैधता और दंड की अनुपातिकता पर आदेश पारित कर सकती है. बोर्ड परीक्षा और शैक्षणिक सत्र को देखते हुए यह सुनवाई अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है.

