नियमों के बावजूद बिना पर्चे के बिक रहीं एंटीबायोटिक्स !!!
नियमों के बावजूद बिना पर्चे के बिक रहीं एंटीबायोटिक्स, प्रशासन की उदासीनता से बढ़ा AMR का खतरा
Antibiotics Awareness देश में एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस (एएमआर) का खतरा एंटीबायोटिक्स की ओटीसी बिक्री, कमजोर नियमन और कृषि-पशुपालन में निगरानी की कमी से बढ़ रहा है। प्रशासनिक उदासीनता और विभागों के बीच समन्वय की कमी नियंत्रण प्रयासों को विफल कर रही है। डॉक्टरों के लिए गैर-बाध्यकारी दिशानिर्देश और घटिया दवाओं की समस्या इस संकट को और गहरा रही है, जिससे हर साल लाखों मौतें हो रही हैं।
- एंटीबायोटिक्स की ओटीसी बिक्री से एएमआर का खतरा बढ़ा।
- पशुपालन, कृषि में एंटीबायोटिक उपयोग पर कमजोर निगरानी।
- प्रशासनिक उदासीनता और समन्वय कमी से नियंत्रण विफल।
नई दिल्ली। देश में एंटीबायोटिक्स की ओटीसी (ओवर द काउंटर) बिक्री पर ढील, डाक्टरों के लिए गैर-बाध्यकारी दिशानिर्देश, कृषि और पशुपालन में कमजोर नियमन व निगरानी की कमी, एजेंसियों की सीमित क्षमता ये सभी मिलकर देश में एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस (एएमआर) के खतरे को बढ़ा रहे हैं।
दवाओं में प्रतिरोध विकसित होने की सघन निगरानी व्यवस्था का न होना, इसे लेकर मानव, पशु एवं पर्यावरणीय स्वास्थ्य विभागों में समन्वय की कमी एएमआर को चिंताजनक स्तर तक बढ़ावा दे रही हैं।
प्रशासन की उदासीनता से बढ़ता खतरा
यह स्थिति बताती है कि भारत में एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस (एएमआर) के लगातार बढ़ते खतरे और उस पर नियंत्रण को लेकर हमारा प्रशासनिक तंत्र अपने कर्तव्यों के प्रति किस कदर उदासीन बना हुआ है। उसकी यही लापरवाही देश में एएमआर पर नियंत्रण की कोशिशों को विफल कर रही हैं।
यह विफलता महज कागजी बहस नहीं है। मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा और बैतूल में जहरीले कफ सिरप से हुई बच्चों की मौतें इसकी गंभीरता बताती हैं।
जो बता रही है कि दवा की गुणवत्ता, उपयोग और निगरानी तीनों स्तरों पर तंत्र ठीक से काम नहीं कर रहा। ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जब खतरा साफ दिख रहा है, तो सख्ती और जवाबदेही अब तक क्यों नहीं?
ओटीसी बिक्री : नियम मौजूद, रोक नदारद
ड्रग्स एंड कास्मेटिक्स एक्ट के तहत एंटीबायोटिक्स शेड्यूल-एच और एच-वन श्रेणी में आती हैं, यानी इन्हें केवल पंजीकृत डाक्टर की पर्ची पर ही बेचा-खरीदा जाना चाहिए। इसके बावजूद देश में 50 प्रतिशत के करीब एंटीबायोटिक्स बिना पर्चे के बिक रही हैं।
केंद्रीय औषधि मानक नियंत्र संगठन (सीडीएससीओ) और स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट भी इसकी पुष्टि करती है। विभिन्न संसदीय समितियों में भी इसे स्वीकार किया गया है कि देश में खुदरा स्तर पर प्रिस्क्रिप्शन की जांच और रेकार्डिंग की व्यवस्था कमजोर है।
यही वजह है कि रेड लाइन कैंपेन और पैकेट पर चेतावनी के बावजूद ओटीसी बिक्री पर अब तक वास्तविक नियंत्रण नहीं बन पाया है।
डाक्टरों के लिए दिशानिर्देश पर, बाध्यता नहीं
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) ने डाक्टरों के लिए एंटीबायोटिक स्टीवर्डशिप और स्टैंडर्ड ट्रीटमेंट गाइडलाइंस तो जारी की है पर, ये कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं हैं।
आइसीएमआर के अनुसार वायरल बुखार और सर्दी-जुकाम जैसे मामलों में भी आधे से अधिक मरीजों को एंटीबायोटिक दी जा रही है।
सरकारी अस्पतालों के बाहर एंटीबायोटिक प्रिस्क्रिप्शन की कोई अनिवार्य आडिट व्यवस्था ही नहीं है, नतीजतन ब्राड-स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक्स का अत्यधिक और अनावश्यक उपयोग हो रहा है, जो एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस (एएमआर) प्रतिरोध को बढ़ा रहा है।
पशुपालन और कृषि : कमजोर नियम, बड़ा खतरा
पशुपालन, पोल्ट्री और मत्स्य क्षेत्र में एंटीबायोटिक्स का उपयोग बड़ी चिंता है, क्योंकि एंटीबायोटिक्स का सर्वाधिक उपयोग हीं हो रहा है।
यही कारण है कि केंद्र सरकार ने क्रिटिकल एंटीमाइक्रोबियल्स के पशुओं में उपयोग पर प्रतिबंध लगाया, लेकिन पशु-औषधियों की बिक्री और उपयोग की निगरानी नहीं होने से इसका कोई ठस प्रभाव धरातल पर नजर नहीं आ रहा। क्योंकि राज्यों में पशु-चिकित्सा दवाओं के लिए निरीक्षण ढांचा बेहद कमजोर है।
यही नहीं देश में देश में मानव और पशु स्वास्थ्य डाटा की एकीकृत व्यवस्था ही नहीं, जबकि विभाग और सरकार दोनों मानते हैं कि पशु से मानव एएमआर ट्रांसमिशन एक गंभीर जोखिम बना हुआ है।
दवा गुणवत्ता और निगरानी
- देश में 10,500 से अधिक दवा निर्माण इकाइयां।
- वित्त वर्ष 2024-25 में 1.06 लाख से ज्यादा दवा नमूनों की जांच।
- इनमें 3,100 से अधिक दवाएं अधो-मानक और 240 से ज्यादा नकली व मिलावटी पाई गईं।
- इसकी जानकारी किसी को नहीं कि देश में हर साल कुल कितनी दवा बनती है।
यह आंकड़ा देश में बनने वाली कुल दवाओं के एक छोटे से हिस्से का है, जो जांच तक पहुंचा, जबकि बड़ी मात्रा जांच के दायरे में आईं ही नहीं। जांच व निगरानी के इसी अंतर का परिणाम था मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा और बैतूल की घटना।
इसी तरह दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों से नकली और अधो-मानक दवाओं की नियमित बरामदगी तंत्र की लापरवाही, कर्तव्यों के प्रति उदासीनता और सरकारी सीमाओं को उजागर करने के लिए काफी है।
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बिखरी जिम्मेदारी
आइसीएमआर और विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्टों अनुसार भारत में हर तीसरा बैक्टीरियल संक्रमण दवा-प्रतिरोधी हो चुका है। एएमआर से हर साल सीधे करीब तीन लाख और उससे जुड़े मामलों से दस लाख से अधिक मौत होती है।
इसके बावजूद एएमआर सर्विलांस को लेकर कोई एकीकृत और ठोस व्यवस्था अब तक देश में बनी ही नहीं। मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य और पर्यावरणीय निगरानी और डाटा अलग-अलग विभागों में सिमटा है। ‘वन हेल्थ’ नीति दस्तावेजों में मजबूत है, लेकिन उसका जमीनी क्रियान्वयन बेहद कमजोर है।
एएमआर के खतरे से निपटने को एंटीबायोटिक्स के उत्पादन से लेकर मरीज तक पहुंचने की पूरी श्रृंखला का निगरानी तंत्र बेहद मजबूत होना चाहिए। तभी हम दवा-गुणवत्ता व एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस पर नियंत्रण का ठोस प्रयास कर सकेंगे। ओटीसी बिक्री, डाक्टरों के प्रिस्क्रिप्शन और पशु-चिकित्सा उपयोग तीनों मोर्चों पर ठोस नियम और उनकी सख्त निगरानी के बिना एएमआर को रोकना संभव नहीं है।-
डॉ. महेश वर्मा, कुलपति, आइपी विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
भारत में एंटीबायोटिक्स के इस्तेमाल को लेकर नियमों का जिस तरह से कड़ाई पालन होना चाहिए, वैसा हो नहीं रहा है। कड़ाई से उसके पालन के साथ-साथ की उसकी प्रभावी निगरानी की भी ठोस व्यवस्था होनी चाहिए। फार्मेसी से बिना पर्चे दवाओं की बिक्री और कृषि-पशुपालन में एंटीबायोटिक्स का अनियंत्रित प्रयोग जारी है। मानव, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य विभागों के बीच समन्वय और मजबूत एएमआर सर्विलांस के बिना यह संकट और गहराता जाएगा।
डॉ. रजनीश आतम, ज्वाइंट सेक्रेटरी, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन

