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आखिर क्या होगा भारत की संसद का भविष्य?

आखिर क्या होगा भारत की संसद का भविष्य?

पूरे 74 साल बाद भारतीय संसद के भविष्य को लेकर देश चिंतित है लेकिन सरकार नहीं. गौरवशाली अतीत वाली संसद में न विपक्ष के नेता को बोलने दिया जा रहा है और सत्ता पक्ष का नेता अपनी असुरक्षा के डर से संसद छोडकर भागा फिर रहा है.
संसद का मौजूदा बजट सत्र पहली बार हास्यास्पद हो चुका है. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला सदन चलाने में पूरी तरह नाकाम साबित हुए हैं.. संसदीय कार्य मंत्री बगलें झांकते दिखाई दे रहे हैं और जनता असहाय है. कोई कायदा-कानून काम नही आ रहा. सरकार को संसद की जरुरत नहीं है शायद. सरकार के लिए विपक्ष का भी कोई अर्थ नहीं है. सरकार लंगडी- लूली होकर भी स्वावलंबी है, अर्थात संसद चले न चले उसका काम चल रहा है और आगे भी चलता रहेगा.
संसद में लोकसभा निर्वाचित सांसदों का मंच है लेकिन यहाँ सत्ता पक्ष के लिए अलग कानून है और विपक्ष के लिए अलग.सत्तापक्ष यदि गडे मुर्दे खोदने के लिए चार फांवडों का इस्तेमाल कर सकता है तो विपक्ष अपनी उंगलियों तक का इस्तेमाल नही कर सकता. विपक्ष के नेता एक किताब का संदर्भ के रूप में इस्तेमाल नहीं कर सकते जबकि सत्तापक्ष का एक सांसद एक छोड चार किताबें सदन में ला सकता है, दिखा सकता है.
कभी कभी लगता है कि संसद का नसीब ही खराब है जो उसे ऐसा अज्ञानी और काठ अध्यक्ष मिला. फिर कभी लगता है कि सत्तापक्ष के पास शायद ओम बिरला से श्रेष्ठ कोई व्यक्ति स्पीकर पद के लिए होगा ही नहीं. होता तो आज संसद की जो दुर्दशा हो रही है वो क्यों होती.
किसी भी सदन का मुखिया कैसा हो ये रामचरित मानस में लिखा है. मुखिया की परिभाषा और कर्तव्यों की जानकारी के लिए वेद और उपनिषद पढने की जरुरत नही है.मानस में लिखा है –
मुखिया मुखु सो चाहिऐ, खान- पान कहुँ एक।
पालइ पोषइ सकल अँग, तुलसी सहित बिबेक”,
दुर्भाग्य ये है कि ओम जी ने रामचरित मानस भी संभवतः नहीं पढी. ओम जी लगता है अपने प्रारब्ध के कारण दूसरी बार लोकसभा के स्पीकर बने हैं हालांकि उन्हें स्पीकर कहने में संकोच होता है. उनसे बेहतर तो हमारी इंदौर वाली महाजन ताई थीं.
विसंगति देखिए कि ओम जी के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव तक की भूमिका बन चुकी है लेकिन बंदा बेफिक्र है. क्योंकि-
‘जा पै कृपा संघ की होई, ता को का बिगारहे सोई ‘
भाजपा के लिए ओम जी से ज्यादा मुफीद कोई स्पीकर हो नहीं सकता. वे धनकड की तरह अकडना भी नहीं जानते. वे दीदे नचाना जानते हैं किंतु सरकार को अपने इशारों पर नचाने के बजाय सरकार के इशारों पर नाचना जानते हैं.
एक पत्रकार के रुप में मैने देश के 18 में से कम से कक्ष 13 लोकसभा अध्यक्षों को देखा है.10 को काम करते देखा है और 7 से रूबरू हो चुका हूँ. मुझे व्यक्तिगत रूप से मौजूदा लोकसभा अध्यक्ष सबसे ज्यादा कमजोर लगते हैं. मुमकिन है कि आप मेरी राय से इत्तफाक न रखते हों तथापि मेरा मानना है कि देश की संसद का जितना नुकसान और अपमान ओम बिरला के कार्यकाल में हुआ उतना न मीराकुमार के समय हुआ न सुमित्रा महाजन के कार्यकाल में.
जिस संसद को प्रधानमंत्री और सत्ता पक्ष खिलौना समझे, जिस संसद में प्रतिपक्ष के नेता को ही न बोलने दिया जाए उस संसद के होने या न होने से क्या फर्क पडता है. बेहतर हो कि विपक्ष ऐसी संसद के भंग होने की न सिर्फ मांग करे बल्कि जब तक संसद भंग न हो जाए तब तक संसद का बहिष्कार करे. संसद को संसद बनाए रखना लोकतंत्र की सेहत के लिए आवश्यक है.

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