संसद सुचारु रूप से चले, यह आखिर किसकी जिम्मेदारी?
2004 में मनमोहन सिंह को भी यह अवसर नहीं मिला था। लेकिन इस बार एक नया उदाहरण तब स्थापित हुआ, जब प्रधानमंत्री स्वयं लोकसभा में उस समय उपस्थित नहीं थे, जब प्रस्ताव को मतदान के लिए रखा गया।
यदि विपक्ष-प्रेरित हंगामे ने धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस को निष्प्रभावी कर दिया, तो बजट पर चर्चा भी अराजकता की भेंट चढ़ती दिखी है। न तो सत्तारूढ़ भाजपा और न ही कांग्रेस-नेतृत्व वाला विपक्ष किसी ऐसे समझौते में दिलचस्पी दिखा रहा है, जिससे संसद के तीन वार्षिक सत्रों में सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाले बजट सत्र को वांछित गंभीरता मिल सके।
वास्तव में, सदन में व्यवधान और बार-बार स्थगन भाजपा के लिए अच्छा ही है, क्योंकि इससे उसे असहज सवालों से बचने का सुविधाजनक अवसर मिल जाता है। दूसरी ओर, विपक्ष- विशेषकर कांग्रेस- मानो इस निष्कर्ष पर पहुंच चुकी है कि हंगामा और नारेबाजी गंभीर व तर्कपूर्ण बहसों की तुलना में जनता तक उसका संदेश अधिक प्रभावी ढंग से पहुंचा सकती है।
कांग्रेस-नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के कार्यकाल में जब अरुण जेटली राज्यसभा में विपक्ष के नेता थे, तब उन्होंने प्रसिद्ध रूप से कहा था कि संसद में अवरोध पैदा करना अलोकतांत्रिक नहीं है। एक वर्ष बाद लोकसभा में उनकी समकक्ष सुषमा स्वराज ने भी यही दृष्टिकोण दोहराया। उन्होंने 2012 में कहा था, संसद को चलने नहीं देना भी लोकतंत्र का ही एक रूप है।
संसद के हालिया इतिहास से यह स्पष्ट होता है कि विपक्ष में रहते हुए राजनीतिक दलों के बीच यह धारणा लगभग एक सामान्य प्रवृत्ति बन चुकी है। 1995 में जब भाजपा विपक्ष में थी, तब उसने नरसिंह राव सरकार के दूरसंचार मंत्री सुखराम पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर पूरे शीतकालीन सत्र को ठप कर दिया था।
2001 में, वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के दौरान कांग्रेस ने तो तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस का बहिष्कार ही कर दिया था। फर्नांडिस का नाम तहलका टेप प्रकरण में सामने आया था। कांग्रेस सांसद फर्नांडिस को संसद में बोलने से रोकने के लिए हंगामा करते थे।
उन्होंने उस संसदीय स्थायी समिति की बैठकों में भाग लेने से भी इनकार कर दिया, जिसकी अध्यक्षता फर्नांडिस कर रहे थे। 2010 में भी एक और शीतकालीन सत्र मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को झकझोर देने वाले 2जी घोटाले की जांच के लिए जेपीसी गठित करने की भाजपा की मांग के कारण व्यर्थ चला गया था।
विपक्षी दलों को भले ही ऐसे व्यवधानों के लिए दोषी ठहराया जाए, यह भी सच है कि संसद का सुचारु संचालन सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है- चाहे इसके लिए उसे विपक्ष से समझौते की दिशा में एक कदम पीछे ही क्यों न लेना पड़े।
जब फर्नांडिस के बहिष्कार का सिलसिला डेढ़ वर्ष तक खिंच गया था तो अंततः वाजपेयी सरकार को झुकना पड़ा था और चर्चा के लिए सहमत होना पड़ा था। तब राज्यसभा में भैरोंसिंह शेखावत और लोकसभा में मनोहर जोशी- दोनों सदनों के सभापतियों ने पहल करते हुए दोनों पक्षों को वार्ता की मेज पर बुलाया और संवाद का एक फॉर्मूला तैयार करने का प्रयास किया।
इसी तरह, 2जी घोटाले पर जेपीसी की भाजपा की मांग को लेकर पूरे शीतकालीन सत्र तक अड़े रहने के बाद मनमोहन सिंह सरकार ने भी अंततः झुकने का निर्णय लिया था, क्योंकि वह चाहती थी कि बजट सत्र सामान्य रूप से चल सके।
तीखे ध्रुवीकरण के इस दौर में- जब राजनीतिक खेमों के बीच दरारें गहरा चुकी हैं- संसद की प्रतिष्ठा बचाने के लिए संयम, धैर्य और समझौते की दिशा में एक कदम पीछे हटने की तत्परता अब पहले से अधिक जरूरी हो गई है।

