यूपी की 3 यूनिवर्सिटीज से ग्राउंड रिपोर्ट ….

इलाहाबाद विश्व‌विद्यालय में आमरण अनशन, बीएचयू में हिंसक छात्र आंदोलन की बात,गोरखपुर में कुर्सी के पीछे मारपीट; ये है यूपी की यूनिवर्सिटीज का हाल

यूपी की यूनिवर्सिटीज हमेशा से राजनीति का अखाड़ा बनती रही हैं। चाहें मामला ऑफलाइन परीक्षा का हो, ऑनलाइन क्लासेस का या छात्र संघ बहाल करने का, हर चीज पर राजनीति शुरू होने में देर नहीं लगती।

इन्हीं मुद्दों की तह तक जाने के लिए हमने यूपी की तीन ऐसी जगह की यूनिवर्सिटीज चुनीं जहां वोटिंग होने वाली है। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी, बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी और दीनदयाल उपाध्याय यूनिवर्सिटी। तीनों जगह से स्टूडेंट्स की जो बातें निकलकर आईं हम उनको इस रिपोर्ट में लिख रहे हैं…

यूनिवर्सिटी 1: इलाहाबाद यूनिवर्सिटी, प्रयागराज
इलाहाबाद विश्व‌विद्यालय में राजनीति से पहले आमरण अनशन की बात करनी पड़ेगी। 6 मुख्य कैंपस और 13 से ज्यादा हॉस्टल वाली इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में इस वक्त उन्माद मचा है।

चुनाव की बात करने पर छात्र कहते हैं, “पहले हमारे आंदोलन की बात कीजिए। उसके बाद हम राजनीति पर आएंगे। हमारे 25 साथी बेहोश होकर बेली अस्पताल जा चुके हैं। आज यूनिवर्सिटी फैसला नहीं करती तो कल 50 और बच्चे बिना खाए-पिए बेहोश हो जाएंगे।”

प्रशासन ने बात नहीं मानी तो मेरी लाश एंबुलेंस में जाएगी

एनएसयूआई के अभिषेक ‌त्रिपाठी निराला गेट पर लेटकर धरना देते हुए

मामला विश्वविद्यालय की ओर से ऑफलाइन परीक्षा कराने का है। छात्रों की मांग है कि उन्हें असाइनमेंट के आधार पर पास किया जाए।

क्योंकि ऑनलाइन कक्षाओं में प्रैक्टिकल नहीं हुए। अब प्रशासन प्रैक्टिकल के लिए कह रही है।

बहरहाल, ऊपर की अब राजनी‌ति की बात, एनसएसयूआई और समाजवादी पार्टी से जुड़े नेता सबसे ज्यादा सक्रिय हैं। एनएसयूआई के अभिषेक ‌त्रिपाठी विश्वविद्यालय के निराला गेट पर लेटे हुए हैं। उनमें उठने की ताकत नहीं बची है।

कहते हैं, “चार दिन से आमरण अनशन पर हूं। अभी मेडिकल रिपोर्ट आई डॉक्टर्स ने शुगर-बीपी सब कम बताया। लेकिन एयू प्रशासन हमारी बात मानें नहीं तो मेरी लाश एम्बुलेंस में जाएगी।”

अभिषेक कहते हैं, “जब आंदोलन पर था तभी प्रियंका गांधी शहर में आई थीं। लेकिन मेरे लिए छात्र जरूरी हैं। मैं उनसे मिलने नहीं गया।”

समाजवादी पार्टी से जुड़े छात्र नेता अजय सम्राट कहते हैं, “हम 583 ‌दिनों से छात्रसंघ बहाली की लड़ाई लड़ रहे हैं। बीते 3 साल में 28 बार जेल जा चुके हैं। अब एक और लड़ाई सही। इसमें जो करना होगा करेंगे। फिलहाल प्रदेश में चुनाव होने के बावजूद दूसरी पार्टियों के छात्र नेता भी आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं।”

बीते 30 सालों में इविवि में पहले जैसे नेता नहीं हुए

इविवि के सेंटर ऑफ मीडिया स्टडीज में कोर्स कोऑर्ड‌िनेटर धनंजय चोपड़ा से राजनीति पर बातचीत

1980 के दशक के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय की राजनीति पढ़ाने वाली नर्सरी कमजोर हो गई इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सेंटर ऑफ मीडिया स्टडीज में कोर्स कोऑर्ड‌िनेटर पद पर कार्यरत धनंजय चोपड़ा कहते हैं, “पहले विश्वविद्यालय की नसर्री से निकले छात्र नेता देश की कमान संभालते थे। शंकर दयाल शर्मा से लेकर मदनलाल खुराना तक ऐसे कई नेता रहे। लेकिन 1980 के दशक में राजनीतिक पार्टियां छात्र राजनीति में कूदीं। तब से एक स्वर में बोलने वाले छात्र कम हो गए। अब पार्टियों के नारे को जिंदाबाद करते हैं। इसी वजह से बीते 30 सालों में इविवि में पहले जैसे नेता नहीं हुए।”

यूनिवर्सिटी 2: बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी, वाराणसी
बनारस में 7 मार्च को चुनाव होने हैं। लेकिन 10 दिन पहले से ही बीएचयू का माहौल गर्म है। बीते 6 दिनों से यूनिवर्सिटी के मेन गेट पर ऑनलाइन क्लासेज पर छात्रों का विरोध शांत हो चुका है।

कैंपस में जगह-जगह चुनावी पोस्टर चिपके हैं। कैंटीन में रूस-यूक्रेन युद्ध की बातें हो रही हैं।

यहां हमें कुछ लोग सपा की टोपी और भाजपा का बिल्ला लगाए घूमते भी दिखें। बीएचयू के छात्र इस चुनाव को कैसे देख हैं। यूनिवर्सिटी का माहौल समझने हम पहुंचे काशी हिंदू विश्वविद्यालय में।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय में मिले राहुल बताते हैं कि छात्रसंघ चुनाव ना होने से यहां स्टूडेंट को परेशानी हो रही है। बीते कई सालों से नेट की फेलोशिप रुकी हुई है।

बीएचयू के हॉस्टल में भाजपा,मोदी और योगी की बातें
”बीएचयू के स्टुडेंट्स योगी जी को बहुत पसंद करते हैं। यहां के हॉस्टल में भाजपा,मोदी और योगी की बातें सबसे ज्यादा होती हैं।” बीएचयू यानी काशी हिंदू विश्वविद्यालय की कैंटीन पर मिले मोहित कुमार ने हमसे यह बात कही।

वो आगे कहते हैं कि पिछले 5 साल में मोदी जी ने बनारस और यहां के लोगों के लिए बहुत कुछ किया है। इसलिए यहां के छात्र भाजपा के साथ हैं।

2017 में गर्ल्स हॉस्टल में हुए लाठी चार्ज को नहीं भूल पाएं स्टूडेंट्स
बीएचयू के मालवीय सेंटर फॉर पीस रिसर्च से एमए कर रहे प्रियेश पांडे कहते हैं,”2017 में योगी सरकार आई। इत्तेफाक से उसी साल यहां लड़कियों पर लाठी चार्ज किया गया। यहां के स्टूडेंट्स ने योगी सरकार में गिरती कानून व्यवस्था देखी। कोरोना के टाइम पर कैंपस में सैकड़ों लाशों को जाते देखा है। कई लोग प्लेसमेंट्स के लिए आज भी दर-दर भटक रहे हैं। हालत ये है कि अगर आज छात्र चुनाव हो जाए एक वोट भी बीजेपी के समर्थन में नहीं जाएगा।”

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का सिंह द्वार यूपी की राजनीति में बड़ी पहचान रखता है। यहीं पर 1974 में लोकनायक जय प्रकाश नारायण ने सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन की शुरुआत की थी।
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का सिंह द्वार यूपी की राजनीति में बड़ी पहचान रखता है। यहीं पर 1974 में लोकनायक जय प्रकाश नारायण ने सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन की शुरुआत की थी।

नींबू पानी पीने के लिए लोकबंधु राज नारायण के धरने में जाते थे छात्र
इंदिरा गांधी के दौर में भी बीएचयू की बड़ी राजनीतिक पहचान थी। यूनिवर्सिटी के लंका चौराहे पर बने सिंह द्वार पर लोकनायक जय प्रकाश नारायण से लेकर लोकबंधु राज नारायण ने बड़े आंदोलन छेड़े।

बीएचयू में समाज शास्त्र विभाग के प्रोफेसर डॉ.अरविन्द जोशी कहते हैं,” बचपन में जब हमें पता चलता था कि लंका गेट पर राज नारायण जी धरने पर बैठे हैं। हम सभी दोस्त नींबू पानी पीने उनके टेंट पर पहुंच जाते थे। बच्चों को देखकर राज नारायण खुश हो जाते और हम सभी को नींबू पानी पिलाते थे। हमारे छात्र समय में यहां कई बड़े नेताओं ने आंदोलन किए। तब सिंह द्वार से गंगा जी तक जुलूस निकलता था।”

डॉ. अरविंद जोशी बनारस के समाज शास्त्र विभाग के प्रोफेसर हैं। वो बीते 40 साल से यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहे हैं। प्रोफेसर जोशी यह मानते हैं कि अगर युवाओं का स्किल बेस्ड सलेक्शन हो, तो छात्र चुनाव दोबारा कराने में कोई हर्ज नहीं है।

1998 के हिंसक छात्र आंदोलन ने बीएचयू की इमेज गिराई
प्रोफेसर जोशी ने बताया,” यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति में कई दौर आए। 1990 में एक दौर आया जब छात्र राजनेता बनने की तैयारी करते थे। 1998 तक छात्र राजनीति में आपराधिक प्रवृत्ति हावी होती गई। कैंपस में बाहरी गुंडे आने लगे। इसके यहां के इंनोसेंट छात्र भी डरे सहमे रहने लगे। 1998 के हिंसक छात्र आंदोलन ने विश्वविद्यालय की इमेज बदलकर रख दी। खूब हंगामा हुआ, विधानसभा तक इसकी गूंज रही। इस आंदोलन के बाद से ही यहां छात्र संघ चुनाव शांत पड़ता गया।”

यूनिवर्सिटी 3: दीनदयाल उपाध्याय विश्‍वविद्यालय, गोरखपुर
“योगी सरकार स्टूडेंट्स के लिए हर मामले में एकदम फेलियर रही।” डीडीयू में मौजूद 10 में से 9 छात्रों ने हमसे यही बताया।

कैंपस में घुसते ही हर तरफ ‘छात्र संघ बहाल करो’ ही लिखा हुआ नजर आता है।

डीडीयू स्टूडेंट्स के लिए छात्र संघ बहाल कराना ही बड़ा मुद्दा
डीडीयू स्टूडेंट्स के लिए छात्र संघ बहाल कराना ही बड़ा मुद्दा

स्टूडेंट्स ने बताया, “2016 के बाद छात्र संघ चुनाव न होने से अब हमारी कोई नहीं सुनता। कैंपस में गंदे वाशरूम, सीटों की जर्जर हालत, बेरोजगारी और शिक्षा के साथ खिलवाड़ ही अब डीडीयू की पहचान बन गए हैं।

भाजपा ने युवाओं को इतना रोजगार दिया है कि रूम से निकाल-निकाल कर मारा गया
योगी आदित्यनाथ बतौर सांसद इसी गोरखपुर विश्वविद्यालय को केंद्रीय विवि बनाने का मुद्दा उठाकर नेता बने हैं। आज मुख्यमंत्री हो गए तो सब कुछ भूल गए।

यूनिवर्सिटी के आउटसोर्सिंग कर्मचारियों का 5-6 महीनों का वेतन बाकी है। एक कर्मचारी तो कोविड के समय पैसे की कमी से इलाज कराए बिना मर गया। उसके परिवार की सुनने वाला कोई नहीं है।

जो यहां के छात्र नहीं हैं वो यहां राजनीति चमकाने चले आते हैं। स्टूडेंट्स को डिस्टर्ब करते हैं। उन्हें मारने पीटने तक उतारू हो जाते हैं।

जब मैं यहां आया तो मुझे लगा योगी जी का क्षेत्र हैं। बदलाव मिलेगा। पर बदलाव के नाम पर ऐसा माहौल मिला कि यहां कुछ बोल ही नहीं सकते। सबसे बड़ी कट्टरता यहां यही हैं कि बोलने से पहले ही चुप करा दिया जाता हैं।

हमें समस्या पर ही बात करने की आजादी नहीं हैं।

कुलपति का तानाशाही रवैया

डीडीयू लाइब्रेरी के अंदर का गर्ल्स वॉशरूम
डीडीयू लाइब्रेरी के अंदर का गर्ल्स वॉशरूम

डीडीयू के स्टूडेंट रवि प्रकाश ने कहा “कुलपति अपने मन माफिक छात्रों के एग्जाम कराते हैं। पढ़ाई का पूरा माहौल बिगड़ा हुआ है। यूनिवर्सिटी कैंपस में न बाथरूम की व्यवस्था है, न पेयजल की व्यवस्था है और पठन पाठन का तो नाम ही न लीजिए।”

वो बताते हैं, “जब यूनिवर्सिटी में शिक्षक भर्ती हुई तो पैसे लेकर जरा सी देर में सारा खेल हो गया। न्यूनतम योग्यता के आधार पर इंटरव्यू हुआ। मात्र 5 मिनट में असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए छात्रों का चयन हो गया। जब हमारे प्रोफेसर ही ऐसे चुने जाएंगे तो शिक्षा का क्या स्तर रहेगा।”

64 साल में पहली बार कुलपति पर भ्रष्टाचार के आरोप
गोरखपुर यूनिवर्सिटी के 64 साल के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि कुलपति पर भ्रष्टाचार और पद का दुरूपयोग करने के आरोप लगे हैं। प्रोफेसर कमलेश ने 21 दिसंबर को कुलपति के खिलाफ सत्याग्रह आंदोलन शुरू किया था। आज 2 महीने से ज्यादा हो गया है। प्रोफेसर अब तक आंदोलन कर रहे हैं लेकिन उसकी कोई सुनवाई नहीं हुई।

कैंटीन में एक कुर्सी के लिए हमारे सामने हुई मारपीट

कैंटीन में कुर्सी पर बैठने को लेकर हुई मारपीट
कैंटीन में कुर्सी पर बैठने को लेकर हुई मारपीट

यूनिवर्सिटी के कुछ स्टूडेंट्स ने हमें बताया कि डीडीयू में 10-15 साल पहले तक मारपीट हो जाती थी पर अब बच्चे शिक्षित हो गए हैं तो ऐसा नहीं होता है। लेकिन जब हम कैंटीन में बैठे थे तो हमें कुछ अलग दिखा। वहां अचानक से लड़कों ने मारपीट शुरू कर दी। मामला था एक कुर्सी का।

पूरी कैंटीन भरी हुई थी। बस एक कुर्सी खाली थी। उस कुर्सी पर बैठने को लेकर दो लड़कें आपस में बहस करने लगे। आसपास लोग कुछ समझ पाते उससे पहले ही एक लड़के ने कुर्सी उठाकर दूसरे के ऊपर फेंक दी। दोनों के बीच जमकर मारपीट शुरू हो गई। लोग कैंटीन छोड़ भागने लगे।

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