MP में पुरानी पेंशन योजना लागू हुई तो क्या होगा?
12 साल तक सरकार पर कोई बोझ नहीं, 3.35 लाख कर्मचारी भी सधेंगे, पर राजनीतिक पेंच भी हैं… जानिए सबकुछ…
राजस्थान-झारखंड की तरह मध्यप्रदेश में पुरानी पेंशन योजना लागू करने के लिए शिवराज सरकार पर दबाव बढ़ गया है। कर्मचारी संगठनों ने आंदोलन का ऐलान कर दिया है। कांग्रेस भी इस मुद्दे पर कर्मचारियों के साथ खड़ी हो गई है। बता दें, राजस्थान के साथ ही मध्यप्रदेश में भी अगले साल 2023 में विधानसभा चुनाव है।
शिवराज सरकार पुरानी पेंशन योजना लागू करती है, तो 12 साल तक आर्थिक बोझ नहीं आएगा। उसे प्रदेश के 3.35 लाख कर्मचारियों के अंशदायी पेंशन के तहत हर माह 14% की हिस्सेदारी से करीब 344 करोड़ रुपए की फिलहाल बचत होगी, लेकिन इसमें राजनीतिक पेंच भी है। नई पेंशन स्कीम अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार ने लागू की थी। यही धर्म संकट पुरानी स्कीम को बहाल करने में शिवराज सरकार के सामने है।
जानिए, इसका पूरा गणित…
- 1 जनवरी 2005 के बाद प्रदेश में 3.35 लाख से ज्यादा कर्मचारी सेवा में आ चुके हैं, जो पेंशन नियम-1972 के दायरे में नहीं आते। 2.87 लाख अध्यापक संवर्ग से हैं, जो 2008 में टीचर बन गए। बचे हुए 48 हजार पर नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) लागू है।
- 1 जनवरी 2005 से सरकारी सेवा में आए कर्मचारियों का कहना है कि उनके लिए अंशदायी पेंशन (वर्तमान में लागू) में कर्मचारी के मूल वेतन से 10% राशि काटकर पेंशन खाते में जमा कराई जाती है और 14% राशि सरकार मिलाती है। रिटायर होने पर 50% राशि एकमुश्त दे दी जाती है। शेष 50% से पेंशन बनती है। यह राशि अधिकतम 7 हजार रुपए से ज्यादा नहीं होती। इसकी वजह से कर्मचारी पुरानी पेंशन बहाल करने की मांग कर रहे हैं।
2005 के बाद 3.35 लाख कर्मचारी नौकरी में आए
आजाद अध्यापक शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष भरत पटेल कहते हैं कि 1 जनवरी 2005 के बाद 3.35 लाख अधिकारी-कर्मचारी सरकारी नौकरी में आए हैं। इसमें सबसे ज्यादा टीचर हैं, जिनकी संख्या 2.87 लाख है। सरकार हर महीने उनके मूल वेतन का 14% अंशदान राशि (करीब 7 हजार रुपए) खाते में जमा करती है। यानी सरकार को हर माह 210 करोड़ रुपए वहन करना पड़ रहे हैं। इसी तरह, 48 हजार स्थाई कर्मचारियों पर सरकार को 3 हजार रुपए के हिसाब से 134 करोड़ रुपए अपनी हिस्सेदारी है। यानी दोनों मिलाकर सरकार पर हर महीने 344 करोड़ रुपए का बोझ है।
पटेल कहते हैं कि इन कर्मचारियों और अधिकारियों की 30 साल की नौकरी 2035 में पूरी होगी। यदि पुरानी पेंशन योजना बहाल होती है, तो सरकार पर आर्थिक बोझ 12 साल बाद आएगा, जबकि इन 12 सालों में सरकार को हर महीने 344 करोड़ रुपए बचते रहेंगे।
सरकारी सेवाओं में आने के लिए पेंशन आकर्षण
मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव कृपाशंकर शर्मा कहते हैं कि सरकारी सेवाओं में 1 अप्रैल 2004 से फैमिली पेंशन खत्म कर दी गई थी। सरकार का यह कदम ठीक नहीं था। पेंशन ही एक ऐसा आकर्षण है, जो लोगों को सरकारी सेवाओं में आने के लिए आकर्षित करता है। सातवें वेतन आयोग में इसकी अनुशंसा है। सरकार इसे मानती है, तो कर्मचारियों के हित में फायदेमंद होगा।
लागू पेंशन स्कीम का विरोध क्यों?
वर्तमान में लागू पेंशन योजना (NPS) के तहत कर्मचारी अपने मासिक वेतन का 10% भुगतान करते हैं। सरकार भी इतना ही मिलाती थी, लेकिन मई 2021 से सरकार ने अपना हिस्सा 4% बढ़ा दिया है। अब कर्मचारी के वेतन का 24% (10%कर्मचारी+14%सरकार) पेंशन के नाम पर लिया जाता है। बाद में इसे इक्विटी शेयरों में निवेश किया जाता है। सेवानिवृत्ति पेंशन उस निवेश के रिटर्न पर आश्रित है।
पुरानी पेंशन योजना में पूरी पेंशन राशि सरकार ही देती थी। इसमें पगार से राशि नहीं काटी जाती थी। कर्मचारी को रिटायरमेंट के बाद हर महीने मिलने वाली पेंशन उसके वेतन से आधी राशि होती थी।

