कैसे निर्भय रहेंगी बेटियां?
कैसे निर्भय रहेंगी बेटियां?
30 जिलों में 70 पैनिक बटन दबाए; 69 जगह रिस्पांस ही नहीं, शाम 6 बजे के बाद होती है सबसे ज्यादा जरूरत
दिल्ली में निर्भया कांड के बाद केंद्र सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए सार्वजनिक परिवहन की बस, टैक्सी और कैब में पैनिक बटन अनिवार्य किए थे। मध्य प्रदेश में कुल रजिस्टर्ड करीब सवा लाख यात्री वाहनों में से 2022 के बाद सिर्फ 50 हजार में ये बटन लगे हैं।
भास्कर के 32 रिपोर्टर्स ने एक ही दिन (शनिवार) को भोपाल, इंदौर, ग्वालियर समेत 30 जिलों इन पैनिक बटन की पड़ताल की तो पाया कि ये सुरक्षा के नाम पर केवल धोखा हैं। रिपोर्टर्स ने कुल 70 वाहनों में पैनिट बटन दबाया और एक घंटे तक इसी में ही रहे, पर 69 में कोई रिस्पांस नहीं आया। सिर्फ रतलाम में रिस्पांस आया।
यहां शाम 6:35 बजे इंदौर जा रही बस (एमपी-43 सी 0645) में रिपोर्टर ने बटन दबाया। ड्राइवर कैलाश चौधरी के पास 10 मिनट बाद भोपाल से कॉल आया। ड्राइवर ने सवारियों से पूछा कि बटन किसने दबाया। किसी ने जवाब नहीं दिया तो फिर कोई पड़ताल नहीं की गई। जिन 17 कंपनियों के भरोसे सुविधा, उनके ग्रामीण क्षेत्रों में न डीलर न सर्विस सेंटर भोपाल, मुरैना, ग्वालियर और श्योपुर समेत कई जिलों में वाहनों के पैनिक बटन काम नहीं कर रहे थे। इनके ड्राइवरों का कहना है कि हर जगह इनकी सर्विस नहीं होती, इसलिए ठीक नहीं हो पाते। पैनिक बटन के लिए प्रदेश में 17 कंपनियां लिस्टेड हैं।
इनके जरिये 12 से 14 हजार रुपए में 2 साल के लिए पैनिक बटन या व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस (वीएलटीडी) लगवाया जा सकता है। नियमानुसार, हर कंपनी का हर जिले में डीलर और सर्विस सेंटर होना चाहिए, लेकिन कुछ कंपनियां ऐसी हैं, जिनके ग्रामीण क्षेत्रों में न तो डीलर हैं और न ही सर्विस सेंटर है।
पैनिक बटन के ऑपरेटिंग सिस्टम में भी कई बड़े पेच
1. कहीं भी पैनिक बटन दबता है तो सबसे पहले कंट्रोल कमांड सेंटर में उस बस का लाइव लोकेशन दिखनी चाहिए। मप्र में बीएसएनएल के नेटवर्क पर कंट्रोल कमांड सेंटर काम कर रहा है। यहां ज्यादातर बसों की लाइव लोकेशन ही नहीं दिखती।
2. बटन दबाने के बाद कंट्रोल कमांड सेंटर परमिट होल्डर के पास फोन कॉल करता है। ऐसे में सवाल ये है कि यदि परमिट होल्डर ही बस चला रहा है और वह किसी वारदात में शामिल है तो वह फोन कॉल क्यों रिसीव करेगा?
3. सुबह 10 से शाम 6 बजे तक ही सिस्टम काम करता है। इस अवधि में पैनिक बटन दबाया तो परमिट होल्डर और डायल-100 को कॉल किया जाता है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में इतनी जल्दी डायल-100 नहीं पहुंच सकती। लाइव लोकेशन ट्रैक न होने पर अपराधी को अधिक समय मिल जाता है।
कमांड सेंटर में सिर्फ 4 कर्मचारी, रविवार को बंद
बटन दबाने के बाद कोई रिस्पांस क्यों नहीं आया, यह जानने के लिए दैनिक भास्कर की टीम प्रदेश के कमांड कंट्रोल सेंटर कोकता (भोपाल) स्थित आरटीओ ऑफिस पहुंची। यहां पता चला कि कमांड सेंटर में सिर्फ 1 इंजीनियर और 3 ऑपरेटर हैं। यह सेंटर सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे तक ही काम करता है। शाम 6 बजे के बाद यहां कोई नहीं रहता। रविवार को सेंटर पर ताला लगा रहता है। डायल-100 के साथ सिस्टम लाइव ही नहीं है। इसलिए तुरंत मदद पहुंचाना असंभव जैसा है।
मंत्री ने जवाब नहीं दिया, अपर आयुक्त बोले- सुधार कर रहे
- भास्कर ने परिवहन मंत्री राव उदय प्रताप सिंह ने महिला सुरक्षा पर जवाब देने की बजाय सिर्फ यही कहा कि मैं किस-किस से बात करूं? सुबह से 8 फोन आ चुके।
- अपर परिवहन आयुक्त उमेशा जोगा बाेले- हमारी कोशिश 15 मिनट में मदद पहुंचाने की है, लेकिन अभी तक ऐसी जरूरत ही नहीं पड़ी। व्यवस्था बेहतर कर रहे हैं।
वो सबकुछ, जो आपको जानना जरूरी
पिछले 2 साल में एक बार भी मदद नहीं पहुंचाई, रिस्पांस टाइम तय नहीं
पैनिक बटन के रिस्पांस का टाइम क्या है?
– मप्र में 2022 में कमांड सेंटर शुरू हुआ था। अब तक कोई रिस्पॉन्स टाइम तय नहीं किया है।
किस तरह मदद पहुंचाई जाती है?
– बटन दबते ही कंट्रोल कमांड सेंटर पर वाहन की लाइव लोकेशन दिखने लगती है। कमांड सेंटर परमिट होल्डर या बस मालिक को कॉल कर जानकारी लेते हैं। समस्या है तो डायल-100 को बस की लोकेशन भेज दी जाती है। पिछले दो साल में एक बार भी मदद नहीं पहुंचाई गई।
कमांड सेंटर में कितने कर्मचारी चाहिए?
– कमांड सेंटर से जुड़े कंसल्टेंट बताते हैं कि यह सेवा अभी गो-लाइव नहीं है। सिर्फ तीन कर्मचारी और एक सुपरवाइजर सुबह 10 से शाम 6 तक रहते हैं। 24 घंटे सेवा के लिए कम से कम 4 ऑपरेटर और 3 सुपरवाइजर चाहिए। इस योजना पर शुरुआती खर्च करीब 18 करोड़ रुपए हुआ था। यह पूरा सिस्टम बीएसएनएल ने खड़ा किया है। सूत्रों के मुताबिक परिवहन विभाग ने अभी तक इसका भुगतान भी नहीं किया है