नई दिल्ली। दिल्ली सरकार ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल ने पिछले पांच वर्षों में अपने लीज समझौते का उल्लंघन करते हुए आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के केवल 9-10 प्रतिशत बाह्य रोगियों (ओपीडी) और 7-9 प्रतिशत आंतरिक रोगियों (आइपीडी) का ही इलाज किया।

जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य सेवा निदेशालय की महानिदेशक वत्सला अग्रवाल की ओर से दायर हलफनामे को रिकार्ड पर लिया। इसमें दिल्ली सरकार ने कहा, ”अस्पताल ईडब्ल्यूएस के 40 प्रतिशत बाह्य रोगियों और 33 प्रतिशत आंतरिक रोगियों की देखभाल करने के लिए बाध्य था।

अपोलो ने कम ईडब्ल्यूएस रोगियों का इलाज किया

लेकिन जांच के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में कुल रोगियों में से केवल 9-10 प्रतिशत ओपीडी में और 7-9 प्रतिशत आइपीडी में देखे गए।” सरकार ने कहा कि कि इन गरीब मरीजों का इलाज भी पूरी तरह से मुफ्त नहीं किया जा रहा है।

दिल्ली सरकार ने SC को बताया सच

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई दिसंबर के दूसरे सप्ताह में निर्धारित की और इंद्रप्रस्थ मेडिकल कारपोरेशन लिमिटेड (आइएमसीएल) की ओर से संचालित अपोलो अस्पताल से जवाब दाखिल करने को कहा। शीर्ष अदालत आइएमसीएल की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें दिल्ली हाई कोर्ट के 22 सितंबर, 2009 के आदेश को चुनौती दी गई थी।

मुफ्त इलाज में भी अनियमितता पाई गई

आदेश में कहा गया था कि अस्पताल प्रशासन ने दंड मुक्ति के साथ गरीब रोगियों को मुफ्त उपचार प्रदान करने संबंधी लीज समझौते की शर्तों का उल्लंघन किया है। हाई कोर्ट ने ने अखिल भारतीय अधिवक्ता संघ (दिल्ली इकाई) की याचिका पर यह आदेश पारित किया था।