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पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर चल रहे घमासान के पीछे की कहानी क्या है?

पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर चल रहे घमासान के पीछे की कहानी क्या है?

SIR row in West Bengal: एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर तृणमूल कांग्रेस लगातार तेवर दिखा रही है। इस पर भाजपा का कहना है कि असल में ममता बनर्जी डरी हुई हैं। जानिए इस विवाद के पीछे की कहानी क्या है और इसका चुनाव पर क्या असर पड़ सकता है…

बिहार विधानसभा चुनाव के बाद अब अगला चुनावी रण पश्चिम बंगाल में होना है। यहां अगले साल चुनाव हैं। इससे पहले यहां मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर का मुद्दा गरमाया हुआ है। तृणमूल कांग्रेस इस प्रक्रिया से सहमत नहीं है। वह लगातार टकराव की मुद्रा में है। इसी मुद्दे पर चर्चा के लिए इस बार खबरों के खिलाड़ी में बतौर विश्लेषक मौजूद थे वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद कुमार, अवधेश कुमार, समीर चौगांवकर और राकेश शुक्ल।

…. पश्चिम बंगाल में विभिन्न आरटीआई के जरिए अहम आंकड़े सामने आए हैं। जैसे- 37 लाख लोगों के पास आधार कार्ड नहीं है। नौ जिलों में 20 वर्ष में मुस्लिम आबादी 30 फीसदी से ज्यादा बढ़ गई। जिस राज्य में जन्मदर घट रही है, वहां मुस्लिमों की आबादी कैसे बढ़ रही है? कई लाख मतदाताओं पर संदेह है। ममता बनर्जी का डर यही संदिग्ध सूची है। अगर यह आंकड़ा SIR में घट गया, तो ममता बनर्जी की सीटें घट जाएंगी। 

…..: ममता बनर्जी पत्र लिखकर एक तरह से चुनाव आयोग को धमकियां दे रही हैं। बंगाल समेत 12 राज्यों में यह प्रक्रिया चल रही है। बीएलओ के सामने ऐसी स्थिति उत्पन्न की जा रही है कि उनकी आत्महत्याओं की खबरें आ रही हैं। इन मौतों की जांच होनी चाहिए। 2004 के आंकड़ों के अनुसार, बंगाल में 4.74 करोड़ वोटर थे। इस समय स्वाभाविक आंकड़ा कहता है कि बंगाल में छह करोड़ से ज्यादा मतदाता हो सकते हैं, लेकिन यह आंकड़ा सात करोड़ से ज्यादा नहीं होना चाहिए। यानी एक करोड़ से ज्यादा मतदाता गलत जुड़े हैं। 

क्या भाजपा यह मुद्दा भुनाने की तैयारी में है?
…….चुनाव आयोग ने स्पष्ट कहा है कि इंतजार कीजिए, सारे सवालों के जवाब देंगे। तमाम आरोपों के बाद चुनाव आयोग घंटों तक राजनीतिक दलों के साथ बैठक कर रहा है। अब तृणमूल कांग्रेस भी समझ रही है कि SIR तो होकर रहेगा। यह रुकने वाला नहीं है। जिस तरह घुसपैठिए बांग्लादेश लौट रहे हैं, तो इससे यह साफ है कि इस प्रक्रिया से घुसपैठियों की भी पहचान हो रही है। 

……. बिहार के चुनाव से ही सभी आशंकाओं का जवाब मिल गया है। बंगाल में घुसपैठियों से भी बड़ी समस्या डुप्लीकेसी की है। अगर किसी नागरिक की पहचान संदिग्ध है, तो चुनाव आयोग उसका मतदाता परिचय पत्र बनाने के लिए बाध्य नहीं है। विपक्ष में निश्चित तौर पर डर तो व्याप्त है। अब मुद्दे भी स्थानीय नहीं रहे। रोटी-कपड़ा-मकान तो केंद्र सरकार की मदद से भी आ रहा है। विपक्ष को समझना होगा कि जो काम हुआ है, उससे आंख मूंदकर चुनाव नहीं लड़े जा सके। 

क्या ममता बनर्जी को विपक्ष के सहयोगी दलों का समर्थन मिलेगा?
….. ममता बनर्जी वैसे तो SIR का विरोध कर रही हैं, लेकिन उनकी पार्टी के बूथ एजेंट बीएलओ के साथ-साथ जमीन पर मौजूद हैं। बिहार के विपक्षी दलों की तरह ममता बनर्जी हवाबाज नेता नहीं हैं। यह जरूर है कि चुनाव आयोग को प्रक्रिया शुरू करने से पहले राजनीतिक दलों से बात करनी चाहिए थी। तृणमूल कांग्रेस, भाजपा, कांग्रेस, वाम दल, सभी को बुलाकर बात करनी चाहिए थी और सुझाव मांगने चाहिए थे। बीएलओ की मौतें हो रही हैं, उन पर एफआईआर दर्ज हो रही हैं। इसलिए चुनाव आयोग को व्यावहारिक दिक्कतों का भी ध्यान रखना चाहिए। 

…… इससे पहले चुनाव आयोग की तरफ से जब-जब SIR जैसी प्रक्रिया हुई तो पहले राजनीतिक दलों से बात करने की कोई परंपरा नहीं रही। बीएलओ को लेकर दो तरह की परिस्थितियां हैं। जो बीएलओ काम में लापरवाही कर रहे हैं, उन पर कार्रवाई हो रही है। जो अच्छा काम कर रहे हैं, उन्हें सम्मानित भी किया जा रहा है। ममता बनर्जी चाहती हैं कि उनका कोई वोट कट न पाए और विरोधी दलों का कोई वोट बढ़ भी न पाए। ममता बनर्जी किसी तीसरे दल को पनपने नहीं देना चाह रहीं। वे चाहती हैं कि चुनाव तृणमूल बनाम भाजपा ही रहे। कांग्रेस, वाम दल या कोई तीसरा दल वहां मजबूत न हो।

……SIR से पहले चुनाव आयोग द्वारा राजनीतिक दलों से बात करने की गलत परंपरा को शुरू करने का कोई अर्थ नहीं है। बिहार में जब यह प्रक्रिया हो चुकी है, तो दूसरे राज्य में यह प्रक्रिया कैसे रोक देंगे। बंगाल में यह भी देखने में आया है कि एक ही ईपीआईसी नंबर पर कई मतदाता रजिस्टर्ड हैं। SIR की पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य यह है कि एक मानक सूची बने, जो पंचायत चुनाव, निकाय चुनाव, राज्य के चुनाव और आम चुनाव में लागू हो। सरकार को तो इससे आगे जाकर नागरिकता कार्ड बनाने के बारे में सोचना चाहिए। 

सीमा पर लोगों की वापसी की जो तस्वीरें दिखाई दे रही हैं, उसका सच क्या है?
….. एसआईआर की अधिसूचना जारी होने से लेकर अब तक का रुझान बताता है कि ममता बनर्जी सरकार ने क्या किया है। वहां विदेशी घुसपैठियों को बसाकर उन्हें मतदाता बनवाया और अब उनके लिए दलीलें जा रही हैं। यह उनकी विफलता है। जिन लोगों ने बांग्लादेशी घुसपैठियों को वोटर बनाने के लिए यहां बैठाकर रखा है, उन्हें इस देश का कानून सजा देगा। वहां सीमाओं पर फेंसिंग लगाने का विरोध किया जाता है। 

भाजपा इस बार कैसे मुकाबला करने वाली है? 

: भाजपा ने भूपेंद्र यादव को वहां प्रभारी भेजा है। पिछली बार कैलाश विजयवर्गीय को वहां भेजा गया था। बंगाल भाजपा के लिए बड़ी चुनौती है। वहां भाजपा को पिछली बार 38 फीसदी वोट मिले थे। भाजपा की यहां वोट बैंक बढ़ाने की कोशिश होगी। उसके लिए यह करो या मरो का चुनाव है। अगर इस बार भाजपा वहां सत्ता में नहीं आती है, तो अगली बार उसके लिए यहां मुकाबला करना मुश्किल होगा। संभव है कि इस बार बंगाल के नतीजे चौंकाने वाले रहें। 

घुसपैठियों का मुद्दा कितना बड़ा है?
…… घुसपैठियों को बसाना एक बहुत बड़ा रैकेट है। इसका समाधान केंद्र और राज्य सरकार, दोनों को मिलकर निकालना है। यह कहना भी गलत है कि ममता बनर्जी सिर्फ घुसपैठियों की वजह से जीत रही हैं या फिर घुसपैठियों की वजह से वोटों में जो अंतर आता है, उस वजह से वे जीतती हैं। अन्य दलों की बात करें तो बंगाल में कांग्रेस की स्थिति खराब है। वाम दलों की भी स्थिति अच्छी नहीं है। उनका पूरा कैडर तृणमूल कांग्रेस की तरफ शिफ्ट हो चुका है। केरल को छोड़कर अब वाम दल कहीं भी मजबूत स्थिति में नहीं हैं। बंगाल में असली लड़ाई तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच ही होगी। SIR का मुद्दा सिर्फ तात्कालिक मुद्दा है। यह चुनावी मुद्दा नहीं बन सकता। ममता बनर्जी इस मुद्दे के जरिए अपने कैडर को बस यह संदेश देना चाहती हैं कि वे लोगों के साथ हैं और वे उनका वोट नहीं कटने देंगी।

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