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अरावली को लेकर राजस्थान में बवाल, राज्य की 90 फीसदी पहाड़ियों पर संकट !!!!

अरावली को लेकर राजस्थान में बवाल, राज्य की 90 फीसदी पहाड़ियों पर संकट, विधायक भाटी ने PM को लिखी चिट्ठी

सुप्रीम कोर्ट के अरावली की नई 100 मीटर ऊंचाई की परिभाषा से भारत की प्राचीनतम पर्वतमाला संकट में है. विशेषज्ञों के अनुसार, इससे 90 फीसदी अरावली पहाड़ियां संरक्षण से बाहर हो जाएंगी, जिससे अवैध खनन और रियल एस्टेट का विस्तार होगा. अब इस मुद्दे को लेकर राजस्थान में राजनीतिक घमासान मचा हुआ है.

अरावली को लेकर राजस्थान में बवाल, राज्य की 90 फीसदी पहाड़ियों पर संकट, विधायक भाटी ने PM को लिखी चिट्ठी

अरावली पर्वत (फाइल फोटो)

अरावली पहाड़ी को लेकर दिल्ली से लेकर राजस्थान तक सियासी घमासान मचा हुआ है. भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में शामिल अरावली एक अभूतपूर्व पर्यावरणीय संकट के मुहाने पर खड़ी है. सुप्रीम कोर्ट की ओर से 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली संरचनाओं को अरावली ने मानने की नई व्याख्या की बात सामने आते ही राजस्थान की सियासत गरमा गई है. पर्यावरण को लेकर तरह-तरह की चर्चा भी शुरू हो गई है.

विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यह परिभाषा अगर लागू हुई, तो अरावली का 90 फीसदी हिस्सा संरक्षण से बाहर हो जाएगा और इसके परिणाम विनाशकारी होंगे. दूसरी ओर राजस्थान में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने इस मुद्दे को लेकर मुहिम तेज कर दी है. भाटी ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर अरावली को बचाने के लिए नया मोर्चा खोल दिया है.

भाटी बोले- आदेश खनन माफियाओं के लिए रेड कार्पेट जैसाभाटी ने पत्र में आरोप लगाया है कि यह आदेश खनन माफियाओं के लिए रेड कार्पेट जैसा है. अरावली खत्म हुई तो पूरा उत्तर-पश्चिम भारत पर्यावरणीय आपदा झेलेगा. वही पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी इस अभियान को खुला समर्थन दिया है और सोशल मीडिया के माध्यम से इसे जन आंदोलन बनाने की कोशिशों में जुटे हैं. मसला क्या है? 100 मीटर की परिभाषा और उसका खतरा.

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की सिफारिश को मानते हुए कहा था कि केवल वही पहाड़ी अरावली कही जाएगी जो आसपास की सतह से 100 मीटर ऊंची हो और 500 मीटर के दायरे में दो या अधिक ऐसी पहाड़ियां हों तो उसे अरावली रेंज माना जाएगा. विशेषज्ञों का मानना है कि अरावली की जो नई परिभाषा सामने आई है वो उसके वास्तविक भौगोलिक संरचना से बिल्कुल अलग है.

राजस्थान में कितनी हैं अरावली पहाड़ियां?राजस्थान में कुल 12,081 अरावली पहाड़ियां हैं. इनमें से केवल 1,048 ही 100 मीटर से ऊपर की ऊंचाई की हैं. इसका मतलब यह हुआ है कि राज्य की करीब 90 फीसदी पहाड़ियां तय दायरे से बाहर हो जाएंगीं. इसे लेकर राज्य में विरोध शुरू हो गया है.

पर्यावरण से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल कानूनी परिभाषा नहीं है, पर्वतमाला को खत्म करने जैसा कदम है. लोगों का कहना है कि नए आदेश से अवैध खनन को वैधता मिलेगी, रियल एस्टेट, होटल, फार्महाउस प्रोजेक्ट बढ़ेंगे और मरुस्थल का विकास भी तेजी होगा जिसका सीधा असर मानसूनी गतिविधियों पर पड़ेगा. जिसकी वजह से कई तरह के संकट पैदा हो सकते हैं. स्थानीय स्तर पर कई क्षेत्रों में जल को लेकर संकट खड़ा हो सकता है.

अरावली का 80 फीसदी हिस्सा राजस्थान मेंअरावली को राजस्थान की जीवन रेखा भी करते हैं. यह करीब 692 किलोमीटर लंबी है और इसका 80 फीसदी हिस्सा राजस्थान के 15 जिलों से गुजरता है. राजस्थान में अरावली की वजह से तापमान में नियंत्रण, मानसून दिशा निर्धारण, दशा और दिशा भी बदल सकती है. साथ ही साथ धूल भरी आंधियों को लेकर संकट पैदा हो सकता है क्योंकि अरावली की वजह से समतल इलाकों में इसका असर कम होता है.

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अरावली पर संकट से खत्म हो जाएगा नूंह के 40 गांवों का वजूद! SC के फैसले पर फिर से विचार की अपील

सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से अरावली पहाड़ियों पर खनन का खतरा मंडरा रहा है, जिससे राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली समेत उत्तर भारत के 100 से अधिक गांव प्रभावित होंगे. यह निर्णय अरावली, जिसे उत्तर भारत का प्राकृतिक सुरक्षा कवच माना जाता है, के अस्तित्व और पर्यावरण पर गंभीर परिणाम डालेगा. मेवात आरटीआई मंच जैसे संगठन इस फैसले पर पुनर्विचार की मांग कर रहे हैं.

अरावली पर संकट से खत्म हो जाएगा नूंह के 40 गांवों का वजूद! SC के फैसले पर फिर से विचार की अपील

अरावली पर्वत (AI जनरेटेड इमेज)

उत्तर भारत की प्राकृतिक सुरक्षा कवच माना जानी वाली अरावली पहाड़ियों को लेकर देशभर में माहौल गर्माया हुआ है. दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद से राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली समेत पूरे उत्त भारत में अरावली को लेकर चर्चा तेज है. वहीं हरियाणा और राजस्थान में करीब 6 जिलों के 100 से अधिक गावों पर संकट दिखाई दे रहा है. सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को खनन के लिए खोले जाने के बाद से अरावली बचाव अभियान को लेकर लोगों ने मोर्चा खोल दिया है. वहीं इस मुद्दे को लेकर मेवात आरटीआई मंच ने सख्त रुख अपनाया है.

नूंह के आसपास के करीब 40 गांवों पर संकट बना हुआ है. नूंह से सटे तिजारा, खैरथल, किशनगढ़वास, अलवर, जुरहेड़ा, नगर, पहाड़ी, गोपालगढ़ व कामां क्षेत्र के करीब 60 से अधिक गांव कोर्ट के फैसले से प्रभावित होंगे. इसका असर हरियाणा औ राजस्थान के 6 जिलों के 100 से अधिकर गांवों पर संकट बन रहा है. मेवात आरटीआई मंच ने नायब तहसीलदार के माध्यम से राष्ट्रपति, पीएम, होम मिनिस्टर, गवर्नर और होईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट को ज्ञापन भेजा है. ज्ञापन के माध्यम से मेवात आरटीआई मंच ने फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की है. मंच के अध्यक्ष सुबोध कुमार जैन ने कहा कि 13 गांव ऐसे हैं जहां पहाड़ियों की ऊंचाई 100 मीटर से कम है.

तिहासिक इमारतों पर भी सकंट

इसके अलावा फिरोजपुर झिरका तहसील के नूंह, तावडू, बसई मेव, पुन्हाना और सब तहसील इंडरी के कई गावों पर भी इस फैसले के बाद संकट के बादल छा गए हैं. खनन शुरू होने के बाद इन गांवों का अस्तित्व ही नहीं खतरे में आ जाएगा. इसके अलावा कई ऐतिहासिक इमारतें, जैसे मंदिर, मस्जिद, दरगाहों और किलों पर संकट आ जाएगा.

फैसले पर पुनर्विचार करने की मांगवहीं पर्यावरण एक्सपर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को अपने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए. अरावली पहाड़ियों को खनन के लिए खोलना सही नहीं है. पहाड़ियों का खनन खोलना ह आने वाली पीढ़ियों के प्रति अन्याय करने जैसा है. वहीं ये भी कहा कि अरावली केवल एक पहाड़ी श्रृंखला नहीं है, बल्कि पूरे उत्तर भारत का प्राकृतिक सुरक्षा कवच है.

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