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सदियों पुरानी पर्वत शृंखला पर मंडरा रहा है संकट, दिल्ली-एनसीआर का अदृश्य प्रहरी खतरे में!!!!!

आहत अरावली: सदियों पुरानी पर्वत शृंखला पर मंडरा रहा है संकट, दिल्ली-एनसीआर का अदृश्य प्रहरी खतरे में

दिल्ली-एनसीआर की हवा, पानी और हरियाली को संतुलन देने वाली दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत शृंखला अरावली इस क्षेत्र के लिए प्राकृतिक सुरक्षा दीवार का काम करती है। यह न केवल थार मरुस्थल के विस्तार को रोकती है, बल्कि करोड़ों लोगों को सांस लेने के लिए शुद्ध हवा का भी स्रोत है। अंधाधुंध विकास और खनन के बीच, 20 नवंबर 2025 को आए सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद पर्यावरणविद् इस प्राचीन पर्वतमाला के अस्तित्व को लेकर और अधिक आक्रांत व आशंकित हो गए हैं। हालांकि 24 दिसंबर को केंद्र सरकार ने संरक्षित क्षेत्र का विस्तार करने की जो बात कही है उससे कुछ उम्मीद जगी है…
Wounded Aravalli: A threat looms over the centuries-old mountain range.

अरावली पर्वतमाला ….

दिल्ली-एनसीआर की हवा पहले से जहरीली और दमघोंटू है। लोगों का खुली हवा में सांस लेना तक इन दिनों दूभर है। अगर अरावली पहाड़ियां नहीं रहीं तो राजस्थान से आने वाली रेत और धूल की आंधी दिल्ली की हवा को अैर नर्क बना देगी। पर्यावरण विशेषज्ञों, डॉक्टरों का कहना है कि यह पर्यावरण ढाल के रूप में काम करती है। लगातार हो रहे खनन, पहाड़ियों के कटाव से यह प्राकृतिक दीवार कमजोर होती जा रही है। 

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर, 2025 में अरावली की परिभाषा बदल दी, जिसमें 100 मीटर से ऊंची जगहों को ही पहाड़ी माना जाएगा। इस आदेश से सिर्फ राजस्थान के 15 जिलों में 20 मीटर से ऊंची 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 (8.7 फीसदी) ही इस मानक को पूरा कर सकेंगी और 90% से अधिक क्षेत्र संरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएगा। इससे बड़े इलाकों में माइनिंग शुरू हो सकती है, जो पर्यावरणविदों को चिंता में डाल रही है। 

विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला पर्यावरण की अनदेखी है। इस फैसले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, क्योंकि इससे दिल्ली का प्रदूषण और बढ़ सकता है। दिल्ली-एनसीआर की हवा बचाने के लिए अरावली को संरक्षित करना जरूरी है वरना आने वाली पीढ़ियां जहरीली हवा में सांस लेंगी।

जगी उम्मीद ..अरावली को लेकर जारी विवाद के बीच केंद्र सरकार ने सभी राज्यों में अरावली क्षेत्र में खनन पट्टे रद्द कर दिए। साथ ही, राज्य सरकारों को नए पट्टे जारी करने पर भी रोक लगा दी। सरकार ने स्पष्ट किया कि संरक्षित क्षेत्र का विस्तार किया जाएगा। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि सरकार अरावली के दीर्घकालिक संरक्षण के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है

अब 7 जनवरी को सुनवाई से उम्मीद
सुप्रीम कोर्ट में इस आदेश पर पुनर्विचार के लिए पूर्व वन संरक्षक डॉ. आरपी बलवान ने इंटरलोक्यूटरी एप्लीकेशन भेजी है जिस पर सुनवाई सात जनवरी को है। अरावली विरासत जन अभियान ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पुनर्विचार याचिका के लिए हस्ताक्षर अभियान चलाया हुआ है। हरियाणा में अरावली की उपस्थिति मेवात, फरीदाबाद, पलवल, गुरुग्राम, महेंद्रगढ, रेवाड़ी, चरखी दादरी और भिवानी में है।

…तो घुटेगा दिल्ली-एनसीआर का दम
अरावली पहाड़ियां राजस्थान से दिल्ली तक फैली हुई हैं और ये दिल्ली-एनसीआर के लिए फेफड़ों की तरह काम करती हैं। एक अध्ययन के मुताबिक, धूल दिल्ली के वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) में 30-40 फीसदी तक योगदान देती है। काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) की रिपोर्ट के अनुसार, सड़क की धूल अकेले पीएम10 के 65% तक जिम्मेदार हो सकती है। 

गुरु तेग बहादुर अस्पताल की यूसीएमएस रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग की प्रो. डॉ. अंकिता गुप्ता के अनुसार, प्रदूषण से सांस की बीमारियां बढ़ रही हैं। अरावली की तबाही से जहरीली हवा फेफड़ों को नुकसान पहुंचाएगी, जिससे दिल और श्वसन रोग बढ़ेंगे। उन्होंने अरावली को बचाने के लिए अरावली ग्रीन प्रोजेक्ट की मांग की है, क्योंकि क्षतिग्रस्त इलाके दिल्ली के पीएम10 प्रदूषण में 15-20 फीसदी योगदान देते हैं और तापमान 1.5-2 डिग्री बढ़ा देते हैं। 

सुप्रीम आदेशों से ऐसे संरक्षित रही अरावली
30 नवंबर 2002 को सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर किसी भी प्रकार के खनन पर रोक लगा दी थी। इससे पहले 1990 से 1999 तक पंचायत की कम्यूनिटी लैंड वन विभाग के पास थी। वन विभाग के गार्ड इसका संरक्षण कर रहे थे। वर्ष 1999-2000 में अरावली के साथ की जमीनें पंचायतों को दे दी गई। 

अवैध खनन की शिकायतों के बाद सुप्रीम कोर्ट के सेंटर्ड इम्पावर्ड कमेटी ने इसकी जांच कराई। शिकायत मिली कि खनन को राजनीतिक संरक्षण मिलता है। 18 मार्च 2004 को सुप्रीम कोर्ट ने अरावली के पास डीम्ड फॉरेस्ट पर वन अधिनियम 1980 के लागू होने का फैसला सुनाया था। इससे पहले 12 दिसंबर 1996 के गोदावर्मन निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने वन क्षेत्र की परिभाषा स्पष्ट करते हुए निर्देशित किया कि किसी प्रकार का मालिकाना हक वन भूमि को वन संरक्षण अधिनियम 1980 की अनुमति के बिना गैर वानिकी कार्यों के लिए प्रयोग नहीं किया जाएगा।

राजस्थान में खत्म हो चुकी हैं 31 पहाड़ियां 
द अरावली इको सिस्टम मिस्ट्री ऑफ सिविलाइजेशन पुस्तक लिखने वाले डॉ. आरपी बलवान बताते हैं कि तर्क दिया जा रहा है कि राजस्थान में ऐसा आदेश 2006 से लागू है। सुप्रीम कोर्ट के सेंट्रल इंपावर्ड कमेटी की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार अरावली की 31 पहाड़ियां खनन से खत्म हो गईं। कमेटी ने राजस्थान के 15 जिलों को इससे प्रभावित बताया था। इस फैसले के बाद हरियाणा और दिल्ली से अरावली खत्म हो जाएगी। पर्यावरण के नुकसान को धता बताते हुए खनन से हर साल करीब 5000 करोड़ की रॉयलिटी विभिन्न माइनिंग कंपनियों को मिलती है।

छेड़छाड़ हुई तो उजड़ जाएंगे गांव, बिगड़ जाएगा संतुलन
अरावली पर्वत शृंखला आसपास बसी आबादी के लिए प्राकृतिक धरोहर के साथ हवा, पानी, आजीविका और सांस्कृतिक परंपराओं की रीढ़ है। फरीदाबाद में ही अरावली क्षेत्र के अंतर्गत करीब 20 गांव बसे हैं, जिनमें पाली, धौज, मांगर, सिलाखरी, मेवला महाराजपुर, अनखीर, बड़खल, कोट, सिरोही, खोरी जमालपुर, मोहबताबाद समेत कई गांव इस पर्वतमाला पर निर्भर हैं। 

मवेशियों के लिए चारा, पानी और खुले चरागाह अरावली से मिलते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि अरावली को नुकसान पहुंचा तो पशुपालन सबसे पहले प्रभावित होगा, जिससे हजारों परिवारों की आजीविका संकट में पड़ जाएगी। जंगली जड़ी-बूटियों और प्राकृतिक तत्वों से होकर गुजरने वाला यह पानी मिट्टी की उपजाऊ क्षमता को भी बढ़ाता है।

  • अरावली पर्वत शृंखला दुनिया की सबसे प्राचीन फोल्ड माउंटेन रेंज में से एक है, जो मुख्य रूप से प्रोटेरोजोइक युग लगभग 2.5 अरब वर्ष पूर्व बनी हैं। इनका निर्माण टेक्टोनिक प्लेट्स के टकराव और ओरोजेनी (पर्वत निर्माण) प्रक्रियाओं से हुआ। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) और अन्य वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, यह भारतीय शील्ड का हिस्सा है, जो प्राचीन क्रेटॉन्स के टकराव से बना है। 

ऋषि पराशर की तपोभूमि 
फरीदाबाद से सटी अरावली की पहाड़ियों में पांच हजार साल पुराना परसोन मंदिर है। मंदिर के महंत का कहना है कि ऋषि पराशर की तपोभूमि है। मान्यता है कि महर्षि वेद व्यास का जन्म भी इसी स्थल पर हुआ था। 

उर्वरक की जरूरत नहीं 
कुछ किसानों का कहना है बारिश के मौसम में अरावली से नीचे उतरने वाला पानी इतना पोषक होता है कि फसलों में अलग से उर्वरक डालने की जरूरत नहीं पड़ती। 

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अरावली से जुड़ा 100 मीटर विवाद क्या है, मामला सुप्रीम कोर्ट कैसे पहुंच गया? 10 बड़ी बातें

अरावली पहाड़ियों का विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है. इन पहाड़ियों को बचाने के लिए कई जगहों पर प्रदर्शन हुआ. इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले के खिलाफ याचिका मंजूर कर ली है.

सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों की ‘परिभाषा’ और उससे जुड़े 100 मीटर के फॉर्मूले वाले विवाद के खिलाफ याचिका मंजूर कर ली है. यह याचिका हरियाणा के रिटायर्ड वन अधिकारी आरपी बलवान ने दायर की है. कोर्ट ने 17 दिसंबर को अपने आदेश में केंद्र सरकार, हरियाणा और राजस्थान सरकारों तथा पर्यावरण मंत्रालय (MoEFCC) से इस याचिका पर जवाब मांगा है.

100 मीटर से छोटी पहाड़ियों को खतरा

यह मामला पुराने टीएन गोदावरमन थिरुमुलपाद बनाम यूनियन ऑफ इंडिया केस से जुड़ा है, जिसमें 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने ‘वन’ की व्यापक परिभाषा दी थी. नवंबर 2025 में कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय की कमेटी की सिफारिश को मानते हुए अरावली पहाड़ियों की एक समान परिभाषा तय की थी.

इसके तहत स्थानीय स्तर से 100 मीटर या उससे ज्यादा ऊंची पहाड़ियां ही अरावली मानी जाएंगी, साथ ही उनकी ढलान और आसपास की जमीन भी इसी दायरे में आएंगी. लेकिन याचिकाकर्ता का कहना है कि इससे 100 मीटर से कम ऊंची पहाड़ियां सुरक्षा से बाहर हो जाएंगी, जिससे पर्यावरण को बड़ा नुकसान होगा.

कई राज्यों के पर्यावरण पर खतरा बढ़ेगा

आरपी बलवान ने कहा कि अरावली श्रृंखला गुजरात से दिल्ली तक फैली है और थार रेगिस्तान को रोकने वाली दीवार की तरह काम करती है. 100 मीटर का नियम अपनाने से इसकी बड़ी हिस्सेदारी कानूनी सुरक्षा खो देगी. उन्होंने मंत्रालय के हलफनामे में विरोधाभास भी बताया और कहा कि यह सिर्फ तकनीकी मुद्दा नहीं, बल्कि राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और पूरे उत्तर-पश्चिम भारत के पर्यावरण पर असर डालेगा.

100 मीटर नियम पर विरोध गलतफहमी

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि 100 मीटर नियम पर विरोध गलतफहमी पर आधारित है. जब तक टिकाऊ खनन की योजना तैयार नहीं हो जाती, तब तक कोई नया खनन पट्टा नहीं दिया जाएगा. मंत्रालय का कहना है कि यह परिभाषा राजस्थान में 2006 से लागू है और इससे ज्यादातर क्षेत्र सुरक्षित रहेगा. कोर्ट ने पहले गुरुग्राम, फरीदाबाद और नूंह जैसे इलाकों में अरावली में खनन पर सख्त रोक लगाई है, क्योंकि अनियंत्रित खनन से बेहद नुकसान होता है.

यह याचिका ऐसे समय आई है जब अरावली संरक्षण को लेकर बहस चल रही है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि सही परिभाषा से ही इस प्राचीन श्रृंखला की रक्षा हो सकेगी. कोर्ट अब सभी पक्षों के जवाब के बाद आगे सुनवाई करेगा.

अब इस पूरे मामले की 10 बड़ी बातें समझते हैं…

1. 100 मीटर नियम क्या है?

अरावली पहाड़ियों को खनन के लिए तब ही माना जाएगा जब वे स्थानीय जमीन से 100 मीटर या ज्यादा ऊंची हों, साथ ही उनकी ढलान और आसपास की जमीन भी शामिल हों.

2. यह नियम कब कब अपनाया गया?

नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय की कमेटी की सिफारिश को एक समान परिभाषा के रूप में स्वीकार किया था.

3. याचिका किसने दायर की?

हरियाणा के रिटायर्ड वन संरक्षक आरपी बलवान ने याचिका दायर की, जो कहते हैं कि इससे कम ऊंची पहाड़ियां सुरक्षा से बाहर हो जाएंगी.

4. कोर्ट का हालिया कदम क्या है?

17 दिसंबर 2025 को याचिका स्वीकार की और केंद्र, हरियाणा, राजस्थान सरकारों और मंत्रालय से जवाब मांगा है.

5. याचिकाकर्ता की चेतावनी क्या है?

100 मीटर से कम पहाड़ियां अरावली का हिस्सा न मानने से बड़ा पर्यावरणीय नुकसान होगा, रेगिस्तान फैलेगा और पानी की समस्या बढ़ेगी.

6. सरकार का पक्ष क्या है?

केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव कहते हैं कि विरोध गलतफहमी है, कोई छूट नहीं दी गई और ज्यादातर क्षेत्र सुरक्षित है. नया खनन पट्टा नहीं होगा.

7. अरावली का महत्व क्या है?

यह गुजरात से दिल्ली तक फैली प्राचीन श्रृंखला है, जो थार रेगिस्तान को रोकती है और पानी रिचार्ज करती है.

8. इस मामले पर पुराना केस क्या है?

यह 1996 के टीएन गोदावरमन केस से जुड़ा है, जिसमें वन की व्यापक परिभाषा दी गई थी.

9. क्या खनन पर रोक लगी है?

कोर्ट ने पहले कई इलाकों में खनन बैन किया है, क्योंकि इससे बहुत ज्यादा नुकसान होता है, जिसकी भरपाई नहीं हो सकती है.

10. इस मामले में आगे क्या होगा?

सभी पक्षों के जवाब आने के बाद कोर्ट फैसला लेगा, जो अरावली संरक्षण के लिए अहम होगा.

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