मध्य प्रदेश

एमपी में महापौर बेबस, अफसर बेलगाम!

एमपी में महापौर बेबस, अफसर बेलगाम!
आधे से ज्यादा मेयर बोले- हमारी नहीं सुनता सिस्टम; पानी से मौत के बाद इंदौर में उठा था सवा

एमपी के आधे से ज्यादा महापौर यह मानते हैं कि अफसर उनकी नहीं सुनते, जिससे विकास कार्य प्रभावित हो रहे हैं। यानी अफसर बेलगाम हैं, जिससे जनता की समस्याओं का समय पर निराकरण नहीं हो पा रहा है। इंदौर में हाल ही में हुए भागीरथपुरा मामले ने इस बहस को और हवा दे दी है, जहां मेयर ने खुले तौर पर अधिकारियों की लापरवाही को जिम्मेदार ठहराया था।

…. ने जब प्रदेश के 16 नगर निगमों के महापौरों से उनके और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच समन्वय को लेकर बात की, तो चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई। इंदौर, छिंदवाड़ा, सतना, उज्जैन, रीवा और सिंगरौली जैसे बड़े शहरों के मेयरों ने खुलकर अपनी पीड़ा व्यक्त की। वहीं, देवास, जबलपुर, ग्वालियर जैसे कुछ शहरों में तालमेल बेहतर दिखा।

इस गंभीर सवाल पर भोपाल और खंडवा के महापौरों ने जवाब देना ही उचित नहीं समझा, यहां तक कि भोपाल की महापौर ने तो सवाल सुनते ही फोन काट दिया।

वो 6 शहर जहां अफसरों से तालमेल नहीं

1.इंदौर के मेयर पुष्यमित्र भार्गव- अधिकारी मेरी सुनते नहीं

दरअसल, मेयर पुष्यमित्र भार्गव का ये दर्द उस समय बाहर आया जब भागीरथपुरा त्रासदी को लेकर रेसीडेंसी कोठी में बैठक बुलाई गई थी। बैठक में नगरीय विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और विभाग के अपर मुख्य सचिव (एसीएस) संजय दुबे भी मौजूद थे। मेयर ने संजय दुबे से कहा मैं किस काम का महापौर हूं। इसके लिए राजनीति में नहीं आया था। फैसलों का ही पालन नहीं हो रहा।

अधिकारियों की वजह से काम प्रभावित हो रहा है। मैं ऐसे सिस्टम में काम नहीं कर सकता। आप मुख्यमंत्री तक यह संदेश पहुंचा दो। इस पर एसीएस दुबे ने कहा कि इंदौर नगर निगम को कुछ और अधिकारी दे देते हैं। इस पर महापौर ने कहा कि अधिकारियों की कमी नहीं है। जो अधिकारी हैं, वे ईमानदारी से काम कर लें तो स्थिति सुधर जाएगी। अधिकारी काम ही नहीं करना चाहते हैं।

2.छिंदवाड़ा महापौर विक्रम अहाके- अफसर सकारात्मक पहल नहीं करते

छिंदवाड़ा के महापौर विक्रम अहाके अधिकारियों के रवैये पर खुलकर अपनी निराशा जाहिर करते हैं। वे कहते हैं, “मुख्यमंत्री जी चाहते हैं कि आम आदमी तक सुविधा पहुंचे, लेकिन नगर निगम एक स्वशासी संस्था है जिसका नियंत्रण महापौर और आयुक्त के हाथों में होता है। जिस गंभीरता से अफसरों को हमारी बातें सुनना चाहिए, उसमें कहीं न कहीं लापरवाही होती है।

जनप्रतिनिधि जनता की भावनाओं को समझकर अपनी बात रखते हैं, लेकिन अधिकारी इसमें सकारात्मक पहल नहीं करते।” अहाके तालमेल की कमी को विकास में सबसे बड़ा रोड़ा मानते हैंउन्होंने एक हालिया घटना का जिक्र करते हुए कहा, “हाल ही में छिंदवाड़ा में एक सड़क दुर्घटना हुई। हमने नगर निगम के अधिकारियों से रोड डिवाइडर पर रिफ्लेक्टिव स्टिकर चिपकाने के लिए कहा था, लेकिन यह काम नहीं हुआ।

3. उज्जैन महापौर मुकेश टेटवाल- अधिकारियों को प्राथमिकता तय करनी चाहिए

उज्जैन के महापौर मुकेश टेटवाल का मानना है कि अधिकारियों को जनप्रतिनिधियों की बातों को गंभीरता से लेना चाहिए क्योंकि वे सीधे जनता से जुड़े होते हैं। वे कहते हैं, “मेरा मानना है कि किसी भी अधिकारी को जनप्रतिनिधि की सारी बातें सुनना चाहिए। अगर अधिकारी हमारे अनुसार कार्य नहीं करेंगे तो निश्चित रूप से अव्यवस्था पैदा होगी और इसका नुकसान जनता को भुगतना पड़ेगा।”

टेटवाल काम की प्राथमिकता तय करने पर जोर देते हैं। “जब जनता की समस्याएं जैसे- सफाई, नाली चोक होना या गंदा पानी आना, हम अधिकारियों को बताते हैं, तो उन्हें प्राथमिकता के आधार पर यह तय करना चाहिए कि कौन सा काम तुरंत करना है। इसी सोच के साथ काम करने से जनता को तत्काल लाभ मिलेगा।”

4. सतना महापौर योगेश ताम्रकार- कई बार अफसर सहयोग नहीं करते

सतना के महापौर योगेश ताम्रकार का अनुभव मिला-जुला है, लेकिन वे भी अधिकारियों के असहयोगात्मक रवैये को स्वीकार करते हैं। “इसमें कोई दो राय नहीं है कि कई बार अधिकारी सहयोग नहीं करते। हालांकि, ऐसा हमेशा नहीं होता। मुझे महापौर बने तीन साल हो गए हैं। बहुत सारे विकास कार्य हुए हैं, लेकिन अधिकारियों में काम को टालने की प्रवृत्ति है।

5.सिंगरौली महापौर रानी अग्रवाल- अधिकारियों पर दबाव बनाना पड़ता है

आम आदमी पार्टी से सिंगरौली की महापौर रानी अग्रवाल का रुख थोड़ा आक्रामक है। उन्होंने कहा, “अधिकारी कैसे नहीं सुनेंगे? अधिकारियों को सुनना पड़ेगा और वे मेरी सुनते भी हैं।” हालांकि, वे यह भी मानती हैं कि यह आसानी से नहीं होता। “को-ऑर्डिनेशन में समस्या है, पर अधिकारी काम करने के लिए हैं और महापौर का पद संवैधानिक है।

यहां पर अधिकारियों पर काम करने के लिए दबाव बनाना पड़ता है। कई बार इसी वजह से मेरी और निगम कमिश्नर के बीच विवाद की स्थिति भी बनी, लेकिन मैं पूरे विश्वास के साथ काम कर रही हूं और अधिकारियों से काम करवा भी रही हूं।”

6.रीवा महापौर अजय मिश्रा- इंदौर मेयर ने सही कहा, अधिकारी नहीं सुनते रीवा मेयर अजय मिश्रा का कहना है कि इंदौर एमपी का सबसे बड़ा शहर है और वहां के मेयर पुष्यमित्र भार्गव हमारे महापौर संघ के अध्यक्ष भी है। महापौर संघ के साथ सरकार की चार-चार बैठकें हुईं। इसमें सीएम और नगरीय प्रशासन मंत्री भी शामिल थे। हर बार बैठक में कहा गया कि महापौर और मेयर इन काउंसिल को अधिकार देंगे।

संघ ने मांग की थी कि जो स्थानीय स्तर पर काम होते हैं, उसके नियम शिथिल किए जाएं। अभी ऐसे नियम बने हैं कि निगम कमिश्नर तक फाइल जाएगी मेयर इन काउंसिल के जरिए, लेकिन निगम कमिश्नर इस फाइल पर निर्णय लेने के लिए बाध्य नहीं है। ऐसे में विकास काम प्रभावित होते हैं। इंदौर के मेयर ने गलत नहीं कहा, अधिकारी किसी की नहीं सुनते।

1. जबलपुर महापौर जगत बहादुर सिंह ‘अन्नू’- हमारा नगर निगम ऑटो की तरह है

जबलपुर के महापौर जगत बहादुर सिंह एक अनूठा उदाहरण देते हैं। “हमारा नगर निगम एक ऑटो की तरह है, जिसके तीन पहिए हैं- महापौर, नगर निगम कमिश्नर और नगर निगम अध्यक्ष। हम तीनों पहियों की तरह मिलकर काम करते हैं। हमारा गठबंधन, हमारी एमआईसी और हमारा पार्षद दल, सब एक मुट्ठी की तरह बंधकर काम करते हैं। प्रशासनिक अधिकारियों का भी पूरा सहयोग मिलता है।”

2. ग्वालियर महापौर डॉक्टर शोभा सिकरवार- तालमेल के साथ काम करते हैं

ग्वालियर में कांग्रेस की महापौर होने के बावजूद, डॉ. शोभा सिकरवार का अनुभव सकारात्मक है। वे कहती हैं, “इंदौर में भाजपा के महापौर हैं, फिर भी अधिकारी उनकी नहीं सुनते। ग्वालियर में तो कांग्रेस का महापौर है, लेकिन यहां ऐसी स्थिति नहीं है। हम अधिकारियों से तालमेल बना लेते हैं। ज्यादातर काम होते हैं।

3.रतलाम महापौर प्रहलाद पटेल- अधिकारियों पर महापौर की नकेल होनी चाहिए

रतलाम के महापौर प्रहलाद पटेल नियंत्रण को महत्वपूर्ण मानते हैं। “रतलाम में ऐसी स्थिति नहीं है। अधिकारियों को जो काम बोला जाता है, वे करते हैं। हां, स्टाफ की कमी है, लेकिन हमारा अधिकारियों पर पूरा कंट्रोल है। मैं रोज 4 घंटे नगर निगम में बैठता हूं। इंदौर में पानी की समस्या सामने आने के बाद हम सतर्क हो गए थे और हमने दो महीने पहले ही शहर की सभी टंकियों की सफाई करवा ली थी।”

देवास, मुरैना, सागर और कटनी में भी बेहतर तालमेल

  • देवास महापौर गीता दुर्गेश अग्रवाल ने कहा, “हम अधिकारियों के साथ तालमेल बनाकर रखते हैं और हमारी बात अधिकारी सुनते हैं।”
  • मुरैना मेयर ने बताया, “काम हो रहा है और अधिकारी सुनते हैं। जनता के हित में लिए गए निर्णयों का अधिकारियों को पालन करना ही पड़ता है।”
  • सागर महापौर संगीता तिवारी के अनुसार, “अधिकारी हमारी बात सुनते हैं और जो काम बताया जाता है, वह प्राथमिकता से करते हैं।”
  • कटनी महापौर प्रीति सूरी ने कहा, “अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर विकास कार्यों को गति दी जा रही है।”

सवाल सुनते ही भोपाल महापौर ने काट दिया फोन

दैनिक भास्कर ने जब भोपाल की महापौर मालती राय से संपर्क किया और इंदौर के मामले का हवाला देते हुए पूछा कि क्या भोपाल में भी ऐसी स्थिति बन रही है, तो उन्होंने कोई भी जवाब देने के बजाय तुरंत फोन काट दिया। खंडवा महापौर ने भी इस मुद्दे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

एक्सपर्ट बोले- पावर गेम में जनता पिस रही

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक एन के सिंह कहते हैं कि मेयर और अधिकारियों के बीच तालमेल का अभाव हमेशा से ही रहा है। इनके बीच पावर की लड़ाई हमेशा से चलती रही है। यदि करप्ट मेयर या अफसर आ जाए तो फंड्स पर किसका कंट्रोल होगा? इसी बात की लड़ाई होती है।

दूसरी वजह ये है कि नगरीय निकायों के लिए नियम तो बना दिए, लेकिन पावर सेंट्रलाइज्ड होता जा रहा है। चाहे वो केंद्र हो या राज्य सभी जगह ये हालात है। सीएम सेक्रेट्रिएट को देखें तो ये कभी इतना पावरफुल नहीं रहा। जब अफसर आते हैं, खासतौर पर आईएएस, वो तो सरकार के नुमाइंदे होते हैं वो नगर निगम के प्रति अपनी जिम्मेदारी नहीं समझते।

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