गाय और भैंस के मांस में क्या होता है अंतर !!!
गाय और भैंस के मांस में क्या होता है अंतर, जांच में कैसे पता चलता है डिफरेंस?
Cow And Buffalo Meat: गाय और भैंस का मांस देखने में मिलता-जुलता जरूर है, लेकिन रंग, फैट और बनावट से सच्चाई सामने आ जाती है. चलिए जान लेते हैं कि शक की गुंजाइश होने पर कैसे पहचान की जाती है.
खाने की थाली में परोसा गया मांस आखिर किस जानवर का है, यह सवाल कई बार बहस और जांच का कारण बन जाता है. खासकर जब बात गाय और भैंस के मांस की हो, तो मामला सिर्फ स्वाद तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कानून, आस्था और स्वास्थ्य से भी जुड़ जाता है. देखने में दोनों मांस मिलते-जुलते जरूर लग सकते हैं, लेकिन वैज्ञानिक जांच और विशेषज्ञों के अनुसार इनके बीच कई साफ अंतर होते हैं, जिन्हें आसानी से पहचाना जा सकता है.

गाय और भैंस के मांस में सबसे बड़ा अंतर उनके रंग, वसा की मात्रा और बनावट में पाया जाता है. यही तीन बातें किसी भी शुरुआती जांच में सबसे पहले देखी जाती हैं. भैंस का मांस आमतौर पर गहरे लाल या लाल-भूरे रंग का होता है, जबकि गाय का मांस चमकीले चेरी-लाल रंग का दिखाई देता है.
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यह रंग का फर्क जानवर की मांसपेशियों और खून में मौजूद तत्वों की वजह से होता है. वसा की मात्रा और उसका रंग भी दोनों मांस को अलग पहचान देता है. भैंस के मांस में फैट कम होता है और जो वसा होती है, वह दूधिया सफेद रंग की होती है.
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इसके उलट गाय के मांस में वसा की मात्रा ज्यादा पाई जाती है. यह वसा मांसपेशियों के बीच सफेद लकीरों के रूप में दिखती है, जिसे मार्बलिंग कहा जाता है. ज्यादा मार्बलिंग की वजह से गाय का मांस पकने के बाद ज्यादा नरम महसूस होता है.
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भैंसों को लंबे समय तक काम में लिया जाता है, जैसे खेतों में या भारी बोझ ढोने में. इसी कारण उनकी मांसपेशियां ज्यादा मजबूत और सख्त होती हैं. इसका असर मांस की बनावट पर भी पड़ता है. भैंस का मांस कच्चे रूप में थोड़ा सख्त लगता है, जबकि गाय का मांस आमतौर पर ज्यादा मुलायम होता है.
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हालांकि सही तरीके से पकाने पर भैंस का मांस भी काफी स्वादिष्ट बन जाता है. पोषण के लिहाज से देखें तो भैंस का मांस दुबला यानी कम फैट वाला माना जाता है. इसमें प्रोटीन की मात्रा अच्छी होती है और लाइसिन जैसे जरूरी अमीनो एसिड ज्यादा पाए जाते हैं.
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कम वसा होने के कारण इसे कई लोग सेहत के लिए बेहतर विकल्प मानते हैं. वहीं गाय के मांस में फैट ज्यादा होने से कैलोरी भी अधिक होती है, जिससे यह ज्यादा ऊर्जा देता है, लेकिन ज्यादा सेवन स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं माना जाता है.
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जब शक की स्थिति होती है, तो लैब में वैज्ञानिक तरीके अपनाए जाते हैं. डीएनए टेस्ट, माइक्रोस्कोपिक जांच और फैट प्रोफाइल के जरिए यह साफ किया जाता है कि मांस गाय का है या भैंस का. इसके अलावा अनुभवी कसाई और खाद्य निरीक्षक रंग, वसा और रेशों को देखकर भी शुरुआती पहचान कर लेते हैं.

