अच्छी विकास दर के बावजूद तेजी से नहीं बढ़ रहे हैं हम !!!
सबसे आश्चर्य की बात यह है कि आम तौर पर किसी भी देश में कॉर्पोरेट राजस्व अर्थव्यवस्था के साथ-साथ ही बढ़ता या घटता है। लेकिन पिछले साल भारत में सूचीबद्ध कंपनियों की कॉर्पोरेट राजस्व वृद्धि दर, जीडीपी वृद्धि की तुलना में मुश्किल से आधी रही। जीडीपी आंकड़ों से संतुष्ट होने के बजाय भारत के नीति-निर्माताओं को समस्याओं पर ध्यान देना होगा।
कमजोरी के प्रमुख संकेतों में एक यह है कि भारत से पहले की तुलना में ज्यादा लोग पलायन कर रहे हैं और वह बहुत कम पूंजी आकर्षित कर पा रहा है। इस दशक में हर साल औसतन 6.75 लाख लोग भारत से बाहर जाकर बस रहे हैं, जबकि 2010 के दशक में यह संख्या 3.25 लाख थी।
पाकिस्तान, बांग्लादेश और यूक्रेन ने ही इससे बड़ा पलायन देखा है। चीन अभी भी पिछले दशक की तरह ही सालाना लगभग 3 लाख लोगों को खो रहा है। भारत से बाहर जाने वालों में एक बड़ा हिस्सा ‘ब्रेन ड्रेन’ का है- यानी ठीक वे ही कुशल पेशेवर, जिनकी जरूरत उसे उन्नत क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा करने के लिए है। इसका नतीजा यह है कि आज सिलिकॉन वैली के तकनीकी कार्यबल का लगभग एक-तिहाई हिस्सा भारतीयों का हो गया है।
युवाओं को नौकरियां नहीं मिल रही हैं। यहां तक कि प्रतिष्ठित आईआईटी में भी 2024 में 38% छात्र ऐसे रहे, जिन्हें कैम्पस प्लेसमेंट के दौरान नौकरी का एक भी प्रस्ताव नहीं मिला। बेहतर रोजगार की तलाश में कई भारतीय उन गिने-चुने देशों की ओर जा रहे हैं, जो अभी भी प्रवासियों के प्रति अपेक्षाकृत अनुकूल हैं- जैसे यूएई और सऊदी अरब- जहां कंस्ट्रक्शन-बूम ने उन्हें अपनी ओर आकर्षित किया है।
भारत लंबे समय से विदेशों से सीमित मात्रा में पूंजी ही आकर्षित कर पाया है, जिसका एक बड़ा कारण अब भी बना हुआ ‘लाइसेंस राज’ है। यह जमीन हासिल करने या श्रमिकों को नियुक्त करने या हटाने की प्रक्रिया को अत्यधिक महंगा और जटिल बना देता है। जिन एशियाई अर्थव्यवस्थाओं ने तेज और टिकाऊ वृद्धि दर्ज की है- जैसे पहले चीन और हाल के वर्षों में वियतनाम- उनके उछाल के दौर में शुद्ध एफडीआई जीडीपी के 4% से ऊपर पहुंच गया था।
भारत में यह आंकड़ा कभी भी 1.5% से आगे नहीं बढ़ पाया और अब तो यह घटकर मात्र 0.1% रह गया है। पिछले एक दशक में, शुद्ध एफडीआई/जीडीपी के आधार पर भारत की रैंकिंग 25 सबसे बड़े उभरते देशों में 12वें स्थान से फिसलकर 19वें स्थान पर आ गई है।
बिजनेस के लिए एक मुश्किल जगह होने की भारत की पुरानी छवि के अलावा कुछ नए जोखिम भी विदेशी निवेशकों को रोक रहे हैं। इनमें पड़ोसी देशों के साथ नई दिल्ली के बिगड़ते रिश्ते, अमेरिका के साथ टैरिफ युद्ध और भारत की तकनीकी क्षमता को लेकर संदेह शामिल हैं। चीन और ताइवान अपनी जीडीपी का 2.5% से अधिक रिसर्च एवं विकास (आरएंडडी) पर खर्च करते हैं; जबकि भारत में यह खर्च पिछले वर्ष मात्र 0.65% रहा। ऐसे में हैरानी की बात नहीं कि एआई के क्षेत्र में भारत के पास कोई बड़े नाम नहीं हैं।
इन कमजोरियों का असर वित्तीय बाजारों पर भी पड़ रहा है। लंबे सूखे के बाद, उभरती अर्थव्यवस्थाओं के शेयर बाजारों में पिछले वर्ष अंततः शुद्ध निवेश प्रवाह लौटा। लेकिन भारत ने इसके उलट 19 अरब डॉलर का रिकॉर्ड नेट आउट-फ्लो देखा। विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली का सामना घरेलू निवेशकों ने किया, जहां परिवारों ने इक्विटी में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने में ऐतिहासिक रूप से कम रुचि दिखाई। इसके बावजूद, भारतीय शेयर बाजार पिछले वर्ष अपने समकक्ष देशों की तुलना में काफी पीछे रहा।
तेज ग्रोथ के लिए भारत को कहीं अधिक विदेशी पूंजी की आवश्यकता है, क्योंकि उसका घरेलू बचत आधार पर्याप्त नहीं है। पूर्वी एशिया के आर्थिक चमत्कारों के विपरीत भारत का मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र कमजोर रहा है, इसलिए वह कभी निर्यात महाशक्ति नहीं बन सका और लगभग हमेशा चालू खाते के घाटे में रहा। यह कोई संयोग नहीं है कि पिछले एक दशक में भारत में घरेलू निजी निवेश भी सुस्त रहा है। भारत किसी ‘आर्थिक चमत्कार’ के रास्ते पर तभी दिखाई देगा, जब उसके यहां अधिक पूंजी आएगी और उसके यहां से कम प्रतिभाएं बाहर जाएंगी।
युवाओं को नौकरियां नहीं मिल रही हैं। आईआईटी में भी 2024 में 38% छात्र ऐसे रहे, जिन्हें कैम्पस प्लेसमेंट के दौरान नौकरी का एक भी प्रस्ताव नहीं मिला। बेहतर रोजगार की तलाश में कई भारतीय दूसरे देशों की ओर जा रहे हैं।

