दिल्ली

बंगाल SIR,गड़बड़ी वाले 1.25 करोड़ नाम सार्वजनिक करने का निर्देश !!!

बंगाल SIR,गड़बड़ी वाले 1.25 करोड़ नाम सार्वजनिक करने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट बोला- जांच पारदर्शी रहे, ताकि आम लोगों को परेशानी न हो

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पश्चिम बंगाल के 1.25 करोड़ वोटर्स को अपना नाम वोटर लिस्ट में जुड़वाने के लिए एक और मौका दिया। कहा कि वे 10 दिन में अपने डॉक्यूमेंट्स चुनाव आयोग को पेश करें।

चुनाव आयोग ने राज्य में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान नाम, सरनेम, आयु में गड़बड़ी की वजह 1.25 करोड़ वोटर्स को लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी नोटिस जारी किया था।

कोर्ट ने कहा कहा चुनाव आयोग गड़बड़ी वाली वोटर लिस्ट ग्राम पंचायत भवन, ब्लॉक कार्यालय और वार्ड कार्यालय में सार्वजनिक लगाए, ताकि लोगों को पता चल सके।

सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच ने कहा- सिर्फ तर्क के आधार पर आम लोगों को परेशान नहीं किया जा सकता है। वोटर लिस्ट में सुधार की प्रक्रिया जरूरी है, लेकिन यह पारदर्शी और समय पर हो। चुनाव आयोग लोगों की परेशानी को समझे।

 

कोर्ट रूम लाइव: याचिकाकर्ता के वकील कपिल सिब्बल, चुनाव आयोग के वकील राकेश द्विवेदी

  • सिब्बल: लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी के नाम पर अगर पिता और बच्चे की उम्र में 15 साल का अंतर दिखता है तो नोटिस भेज दिया जा रहा है, जबकि ड्राफ्ट रोल पहले से मौजूद है। मेरा कहना है कि पूरी लिस्ट प्रकाशित की जाए। कोर्ट निर्देश दे कि सभी BLO बीएलओ सुधार प्रक्रिया में सहयोग करें।
  • सिब्बल: बंगाली नामों की स्पेलिंग, जैसे- Datta अलग तरह से बोली जाती है, लेकिन इसे भी लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी माना जा रहा है।
  • द्विवेदी (ECI): हम स्पेलिंग की छोटी गलतियों पर नोटिस नहीं दे रहे हैं। कई बार उम्र का अंतर गलत एंट्री के कारण होता है। नोटिस का मतलब नाम हटाना नहीं, बल्कि मतदाता को सुधार का अवसर देना है। बूथ लेवल एजेंट (BLA) सभी राजनीतिक दलों से नियुक्त होते हैं।
  • जस्टिस बागची: यानी राजनीतिक दलों को सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए?
  • द्विवेदी (ECI): हां, घर-घर जाकर।
  • जस्टिस बागची: फिर सुनवाई के समय क्यों नहीं?
  • CJI: अगर कोई मतदाता अपने BLA के साथ आना चाहता है और वह उसकी मदद करता है, तो उसे क्यों न लिया जाए?
  • द्विवेदी (ECI): हर सुनवाई में पार्टी का BLA मौजूद रहे, ऐसा संभव नहीं। यह मतदाता पर निर्भर करता है।
  • जस्टिस बागची: अभी केवल जिनके नाम हटाए गए हैं, उनकी सूची है। लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी वाले मतदाताओं के नाम भी लिस्ट में होने चाहिए।
  • सिब्बल: हमें निर्धारित सुनवाई का मौका दिया जाए, हम पूरी तैयारी के साथ आएंगे।
  • द्विवेदी (ECI): ‘हम तैयार होकर आएंगे’ का मतलब TMC?
  • सिब्बल: स्वाभाविक है।
  • द्विवेदी (ECI): कृपया राजनीतिक दलों के नाम न लें।
  • सिब्बल: नाम आप ले रहे हैं।
  • एक अन्य वकील: बल्क फॉर्म स्वीकार नहीं किए जा रहे। केवल मतदाता ही फॉर्म जमा कर सकता है। हालात बदल चुके हैं। मैं किसी पार्टी का नाम नहीं ले रहा, लेकिन एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया है।
  • CJI: यह सुनिश्चित होना चाहिए कि पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष और समयबद्ध हो। सभी को उचित अवसर मिले।
  • इंटरवीनर वकील श्याम दिवान: DEOs को CEOs की ओर से व्हाट्सएप पर निर्देश भेजे जा रहे हैं कि BLAs को सुनवाई में शामिल न होने दिया जाए। इसमें पारदर्शिता नहीं है।
  • दिवान: माता-पिता या दादा-दादी की उम्र के आधार पर लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी तय करना अप्रासंगिक और आपत्तिजनक है।
  • CJI: आज ये केवल उदाहरण के तौर पर बताए गए हैं, ताकि निचले स्तर के अधिकारी समझ सकें कि डिस्क्रेपेंसी क्या है।
  • सिब्बल: सिर्फ 500 सुनवाई केंद्र हैं। अगर केंद्र बढ़ाए जाएं तो लोग पहुंच सकेंगे।
  • दिवान: इस तरह की प्रोफाइलिंग सबसे अवांछनीय है। ये मानक कहां से आए? इन्हें कौन तय कर रहा है?
  • दिवान: बिना वैधानिक आधार के इन मानकों पर कार्रवाई नहीं हो सकती।
  • CJI: इन मानकों का उद्देश्य नाम हटाना नहीं, बल्कि गलतियों को सुधारना है।
  • द्विवेदी (ECI): 7 ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां 100 बच्चे दर्ज हैं।
  • सिब्बल: सवाल यह है कि 1.32 करोड़ लोगों की प्रोफाइलिंग क्यों की जा रही है?
  • सिब्बल: गरीब लोगों को दूर-दराज से आना पड़ रहा है, नदियां पार करनी पड़ती हैं, यह अस्वीकार्य है।
  • CJI: कुछ सुधार प्रक्रिया जरूरी है, लेकिन वह पारदर्शी होनी चाहिए।
  • सिब्बल: और असुविधाजनक नहीं। हमें केवल पूरी सूची चाहिए।

SIR पर पिछली मुख्य 4 सुनवाई

15 जनवरी: चुनाव आयोग ने कहा था- हम देश निकाला नहीं दे रहे

चुनाव आयोग ने SC में कहा था- SIR के तहत आयोग सिर्फ यह तय करता है कि कोई व्यक्ति वोटर लिस्ट में रहने के योग्य है या नहीं। इससे सिर्फ नागरिकता वेरिफाई की जाती है। SIR से किसी का डिपोर्टेशन (देश से बाहर निकालना) नहीं होता, क्योंकि देश से बाहर निकालने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है।

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