भारत की सनातन संस्कृति में शंकराचार्य बनते कैसे हैं?

प्रयागराज के संगम तट पर इस समय धर्म और आस्था का दुनिया का सबसे बड़ा मेला लगा हुआ है। देश-विदेश के लोग त्रिवेणी संगम में आस्था की डुबकी लगा रहे हैं और पुण्य की लगातार प्राप्ति कर रहे हैं। इसी माघ मेले के बीच शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद भी चर्चा में हैं। दरअसल पिछले दिनों मौनी अमावस्या पर संगम में स्नान को लेकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और माघ मेला प्रशासन के बीच तनातनी की दौर जारी है। माघ मेला प्रशासन ने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शंकराचार्य होने पर सवाल पैदा किया है और उनको नोटिस देकर पूछा कि वह ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य कैसे हैं। इन सभी विवादों के बीच आइए जानते हैं। हिंदू धर्म में शंकराचार्य क्या होते हैं? आदिगुरु शंकराचार्य कौन थे? शंकराचार्य कैसे बनते हैं और सनातन धर्म में इस उपाधि का क्या है महत्व।

आदि गुरु शंकराचार्य को भगवान शिव का अवतार माना जाता है। सनातन धर्म में शंकराचार्य पद की स्थापना आदि गुरु शंकराचार्य ने की थी, जिसके लिए उन्होंने भारत में चार मठों की स्थापना की थी। भारतीय सनातन परंपरा के विकास, धर्म के प्रचार-प्रसार और हिंदू धर्म के उत्थान में आदि गुरु शंकराचार्य की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण रही है। आदि शंकराचार्य अद्वैत वेदांत के प्रेणता, संस्कृत के विद्वान, उपनिशद व्याख्याता और सनातन धर्म सुधारक थे।
हिंदू कैलेंडर के अनुसार आदि गुरु शंकराचार्य का जन्म आठवीं सदी में वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को केरल के कालड़ी गांव में एक नम्बूदरी ब्राह्राण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम शिवगुरु और माता का नाम आर्यम्बा था। माता-पिता दोनों को ही धर्म शास्त्रों को अच्छा ज्ञान था। इनके बचपन का नाम शंकर था जो बाद में आदि गुरु शंकराचार्य कहलाए। ऐसा कहा जाता है आदि शंकराचार्य ने महज 3- 4 वर्ष की आयु में ही अपनी भाषा मलयासम सीख ली थी। आदि शंकराचार्य ने 8 वर्ष की छोटी आयु में चारों वेदों में निपुण हो गए और उन्होंने चारों वेदों को कठस्थ कल लिया था। ये महज 12 वर्ष की आयु में सभी शास्त्रों में पारंगत हो चुके थे और 32 वर्ष की आयु में उन्होंने शरीर त्याग दिया। इतनी अल्प आयु में आदि गुरु शंकराचार्य ने चारों दिशाओं में चार पीठों की स्थापना की थी। जो कि आज के चार धाम है और 3 बार पूरे भारत की यात्रा की। जगन्नाथ पुरी में गोवर्धन पुरी मठ, रामेश्वरम् में श्रंगेरी मठ, द्वारिका में शारदा मठ, बद्रीनाथ में ज्योतिर्मठ स्थापित किया। इसके बाद 32 वर्ष की उम्र में आदि शंकराचार्य ने हिमालय में समाधि ले ली थी।

आदि गुरु शंकराचार्य ने देश के चारों दिशाओं में चार पीठों की स्थापना की और इन सभी चार पीठों में अपने शिष्यों को पीठाधीश्वर नियुक्त कर केदारनाथ चले गए और यहीं 32 वर्ष की आयु में समाधि ले ली। आदिगुरु शंकराचार्य की समाधि के बाद इन चारों मठों से आज तक शंकराचार्य की परंपरा जारी है। इन चारों मठों में शंकराचार्य के चयन के लिए एक लंबी और काफी जटिल प्रक्रिया अपनाई जाती है।
शंकराचार्य बनने के लिए ब्राह्राण कुल में जन्म और संन्यासी होना जरूरी है। एक संन्यासी को शंकराचार्य बनने के लिए गृहस्थ जीवन का त्याग, मुंडन, पिंडदान और रुद्राक्ष को धारण करना बहुत ही अहम हिस्सा है। शंकराचार्य की पदवी पर आसीन होने वाला संन्यासी चारों वेदों और 6 वेदांगों का ज्ञाता होना चाहिए, साथी ही तन-मन से पवित्र होना जरूरी है।
शंकराचार्य की उपाधि को हासिल करने के लिए व्यक्ति को शंकराचार्यों के प्रमुखों, आचार्य महामंडलेश्वरों, प्रतिष्ठित संतों की सभी की सहमति और काशी विद्वत परिषद की सहमित लेनी जरूरी होती है। इसके बाद ही व्यक्ति को शंकराचार्य की पदवी हासिल होती है।
चारों मठों में किसी एक मठ के शंकराचार्य के चयन प्रक्रिया की शुरुआत अन्य मठों के प्रमुखों के साथ होती है। मठों का प्रमुख किसी एक योग्य और विद्वान उम्मीदवार का चयन करते हैं। फिर इस प्रस्ताव को आचार्य महामंडलेश्वरों के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। आचार्य महामंडलेश्वर उम्मीदवार के वेदों, शास्त्रों के ज्ञान और योग्यता की जांच करते हैं, फिर ये आचार्य महामंडलेश्वर योग्य उम्मीदवाप को प्रतिष्ठित संतों की सभा के समक्ष प्रस्तुत करते हैं।
फिर सभा के सामने उम्मीदवार को एक परीक्षा देनी होती है, जिसमें ज्ञान, दर्शन और आध्यात्मिकता का परीक्षण किया जाता है। यदि उम्मीदवार परीक्षा में सफल होता है तो उसे काशी विद्वत परिषद के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। काशी विद्वत परिषद शंकराचार्य के उम्मीदवार की योग्यता का आखिरी मूल्यांकन करती है, उस व्यक्ति को शंकराचार्य की उपाधि प्रदान करती है।

आदि गुरु शंकराचार्य ने पूरे भारतवर्ष की यात्राएं की और इस दौरान बड़े-बड़े विद्वानों से शास्त्रार्थ किया। आदि गुरु शंकराचार्य अद्वेत वेदांत के सिद्धांत ,धर्म, भारतीय संस्कृति और दर्शन को बढ़ाने के लिए चार पीठों की स्थापना की और हर एक पीठ के प्रमुख को शंकराचार्य की उपाधि प्रदान की। उत्तर में ज्योतिर्मठ, पूर्व में यानी ओडिशा के पुरी में गोवर्धन पीठ, दक्षिण में कर्नाटक में शृंगेरी शारदा पीठ और पश्चिम में गुजरात के द्वारका में द्वारका पीठ। इन चारों पीठों के मठाधीश को ही शंकराचार्य कहते हैं। इस प्रकार कुल चार शंकराचार्य होते हैं

सभी चारों मठों के शंकराचार्यों के हाथ में एक विशेष प्रकार की छड़ी होती है, जिसे दंड कहते हैं। यह दंड गुरु से दीक्षा हासिल करते समय मिलती है। इस दंड को भगवान विष्णु का प्रतीक माना जाता है। यह दंड दंडी सन्यासी की पहचान होती है। दंड संन्यासी सभी तरह के भौतिक सुखों का त्याग करते हुए ब्रह्राचर्य का पालन करता है और इनके ऊपर धर्म की रक्षा और प्रचार-प्रसार की जिम्मेदारी होती है। यह दंड एक विशेष प्रकार की लकड़ी यानी छड़ी होती है जो बांस की होती है, जिसमें गांठें होती है। इसमें एक सफेद या भगवा कपड़ा बांधा होता है। जिससे जल को छाना जाता है। दंडी संन्यासी हर दिन इस दंड का अभिषेक और तर्पण करते हैं।
दंड कई तरह के होते हैं।
- पहला 6 गांठ वाला दंड (सुदर्शन मंत्र का प्रतीक)
- दूसरा 8 गांठ वाला नारायण दंड (नारायण मंत्र का प्रतीक)
- तीसरा 10 गांठ वाला गोपाल दंड (गोपाल मंत्र का प्रतीक)
- चौथा 12 गांठ वाला वासुदेव दंड (वासुदेव मंत्र का प्रतीक)
- पांचवां 14 गांठ वाला अनंत दंड (अनंत मंत्र का प्रतीक)

सनातन धर्म में शंकराचार्य को सर्वोच्च माना जाता है। आदि गुरु शंकराचार्य ने अपनी अल्प आयु में ही वेदों का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। आदि गुरु शंकराचार्य ने सनातन धर्म को सही दिशा दी और हिंदू धर्म का पुन: उत्थान करने का काम किया था। आदि शंकराचार्य ने हिंदू धर्म और दर्शन के खोए हुए ज्ञान, तप और साधना को दोबारा से स्थापित करने का काम किया। हिंदू धर्म कई संप्रदायों में बंटा हुआ था। आदि शंकराचार्य ने वैदिक धर्म को एकजुट करने का प्रयास शुरू किया। शंकराचार्य ने भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक को एक करने के लिए देश के चारों दिशाओ में चार मठों की स्थापना की। हिंदू धर्म जिस तरह से ब्रह्रा जी के चार मुख हैं और उनके हर एक मुख से एक वेद की उत्पत्ति हुई। उसी के आधार पर 4 वेदों और शास्त्रों को सुरक्षित रखने के लिए चार पीठों की स्थापना की। दरअसल ये चारों पीठ हर एक वेद से जुड़े हुए हैं। ऋग्वेद से गोवर्धन पुरी मठ, यजुर्वेद से श्रंगेरी मठ, सामवेद से शारदा मठ और अथर्ववेद से ज्योतिर्मठ जुड़ा है
आदि गुरु शंकराचार्य ने जहां देश के चारों दिशाओं में चार पीठों को स्थापित किया, वहीं देश की रक्षा के लिए दशनामी संन्यासी अखाड़ों का निर्माण किया। इन अखाड़ों के सन्यासियों के नाम के पीछे लगने वाले शब्दों से उनकी पहचान होती है। जैसे पीछे वन, अरण्य, पुरी, भारती, सरस्वती, गिरि, पर्वत, तीर्थ, सागर और आश्रम, ये शब्द लगते हैं। आदि शंकराचार्य नाम के अनुसार ही इन्हें अलग-अलग जिम्मेदारियां दी।
वन और अरण्य नाम- इन संन्यासियों को छोटे-बड़े जंगलों में रहकर धर्म और प्रकृति की रक्षा करना
पुरी, तीर्थ और आश्रम नाम- इन सन्यासियों को तीर्थों और प्राचीन मठों की रक्षा करना।
भारती और सरस्वती नाम- इन सन्यासियों का दायित्व देश के इतिहास, आध्यात्म, धर्म ग्रंथों की रक्षा करना।
गिरि और पर्वत नाम- इन सन्यासियों का मुख्य काम पहाड़, औषधि और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करना।
सागर नाम- इन संन्यासियों का दायित्व समुद्र की रक्षा करना।

गोवर्धन मठ
गोवर्धन मठ ओडिशा राज्य के पुरी में स्थापित है। इस मठ के शंकराचार्य है निश्चलानंद सरस्वती। इस मठ के संन्यासियों के नाम के बाद अरण्य सम्प्रदाय नाम लगाया जाता है। गोवर्धन मठ के पहले मठाधीश आदि शंकराचार्य के पहले शिष्य पद्यापाद आचार्य थे। यह मठ ऋग्वेद के अंतर्गत रखा गया है।
शारदा मठ
गुजरात के द्वारकाधाम में शारदा मठ स्थित है। शारदा मठ के शंकराचार्य सदानंद सरस्वती हैं। शारदा मठ के पहले मठाधीश हस्तामलक (पृथ्वीधर) थे। इस मठ के संन्यासियों के नाम के बाद तीर्थ या आश्रम लगाया जाता है। इस मठ के अंतर्गत ‘सामवेद’ को रखा गया है।
ज्योतिर्मठ
उत्तराखंड के बद्रिकाश्रम में ज्योर्तिमठ स्थित है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद इस मठ के शंकराचार्य हैं। ज्योर्तिमठ के संन्यासियों के नाम के बाद सागर का प्रयोग किया जाता है। अथर्ववेद को इस मठ के अंतर्गत रखा गया है। इस मठ के पहले मठाधीश त्रोटकाचार्य थे।
शृंगेरी मठ
दक्षिण भारत के रामेश्वरम में शृंगेरी मठ स्थापित है। इस मठ के संन्यासियों के नाम के पीछे सरस्वती या भारती लगाया जाता है। जगद्गुरु भारती तीर्थ इस मठ के शंकराचार्य हैं। इस मठ के अंतर्गत यजुर्वेद को रखा गया है। बता दें कि मठ के पहले मठाधीश आचार्य सुरेश्वराचार्य थे।

