मुफ्त की रेवड़ियां, कब लगेगी लगाम?
जनकल्याण के नाम पर ऐसी योजनाएं स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों के विपरीत हैं, जिनका एकमात्र उद्देश्य लोगों को लालच देकर उनके वोट हासिल करना होता है। सुप्रीम कोर्ट को यह भी देखना होगा कि राजनीतिक दल जनकल्याण के बहाने लोकलुभावन घोषणाएं करते समय राज्य विशेष की आर्थिक स्थिति का ध्यान रखें।
- सुप्रीम कोर्ट लोकलुभावन घोषणाओं पर जनहित याचिका सुनेगा।
- मुफ्त की योजनाएं सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ाती हैं।
- वास्तविक जनकल्याण आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना चाहिए।
यह स्वागतयोग्य है कि सुप्रीम कोर्ट उस जनहित याचिका को महत्वपूर्ण बताते हुए उसकी सुनवाई करने के लिए तैयार हो गया, जिसमें मांग की गई है कि देश पर बढ़ते कर्ज को देखते हुए राजनीतिक दलों की ओर से की जाने वाली लोकलुभावन घोषणाओं का संज्ञान लिया जाए। वैसे तो सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पहले भी यह मामला सामने आ चुका है और उसने चुनाव आयोग को इस संदर्भ में कुछ निर्देश भी दिए थे, लेकिन उनसे बात बनी नहीं।
इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि राजनीतिक दल चुनाव आते ही जनता को लुभाने के लिए जनकल्याण के नाम पर मुफ्त में सुविधाएं और रियायत देने वाली घोषणाएं करने लगते हैं। कुछ दल तो सीधे-सीधे धन देने की घोषणा भी करने लगे हैं। चूंकि ऐसी घोषणाएं चुनाव जीतने में सहायक बनने लगी हैं, इसलिए उनका सिलसिला तेज होता जा रहा है। एक समय जो काम तमिलनाडु में होता था, वह अब शेष देश में भी होने लगा है।
स्थिति यह है कि जो भाजपा लोकलुभावन योजनाओं को मुफ्त की रेवड़ी बताती थी, वह भी ऐसी योजनाओं की घोषणा करने लगी। मुफ्त की योजनाएं यह कहकर शुरू की जाती हैं कि इससे निर्धन-वंचित तबके को लाभ मिलेगा और उनका आर्थिक उत्थान होगा, लेकिन यह देखने में आ रहा है कि ऐसी योजनाएं न केवल सरकारी खजाने पर बोझ बनती हैं, बल्कि निर्धन वर्गों को सरकार पर निर्भर भी बनाती हैं।
नि:संदेह भारत जैसे निर्धन आबादी वाले देश में सरकारों को गरीब एवं वंचित लोगों की चिंता करनी होगी और उनके आर्थिक उत्थान के लिए कुछ विशेष प्रयत्न भी करने होंगे, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं हो सकता कि जनकल्याण के नाम पर आर्थिक नियमों की अनदेखी कर दी जाए। फिलहाल ऐसा ही हो रहा है।
लोकलुभावन घोषणाओं पर लगाम लगाने के लिए पहली आवश्यकता तो इसकी है कि इसे परिभाषित किया जाए कि वास्तविक जनकल्याण क्या है और सरकारों को उसे कैसे करना चाहिए? ऐसी किसी योजना को जनकल्याणकारी नहीं कहा जा सकता, जो लोगों को आत्मनिर्भर न बनाए यानी उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने के लिए प्रेरित न करे।
जनकल्याण के नाम पर ऐसी योजनाएं स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों के विपरीत हैं, जिनका एकमात्र उद्देश्य लोगों को लालच देकर उनके वोट हासिल करना होता है। सुप्रीम कोर्ट को यह भी देखना होगा कि राजनीतिक दल जनकल्याण के बहाने लोकलुभावन घोषणाएं करते समय राज्य विशेष की आर्थिक स्थिति का ध्यान रखें।
उन्हें ऐसी योजनाएं शुरू करने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए, जो राज्य की आर्थिक स्थिति को डांवाडोल करें और उनके पास बुनियादी विकास के काम करने के लिए भी धन का अभाव व्याप्त हो जाए। ध्यान रहे कई राज्यों को अपने कर्मचारियों को समय पर वेतन देने के भी लाले पड़े हैं।

