उदाहरण बनी भारतीय चुनाव प्रणाली !
भिन्न सामाजिक पहचानों के बीच सामुदायिक संतुलन और सामाजिक सह-अस्तित्व हमारे लोकतंत्र की स्थिरता की गारंटी हैं। इसके पीछे चुनाव आयोग का सोच भी है। इसी सोच के कारण वह लगातार नवाचार को बढ़ावा दे रहा है। ईवीएम, वीवीपैट, महिलाओं एवं दिव्यांगजनों द्वारा संचालित तथा थीम आधारित मतदान केंद्र, पोस्टल बैलेट, सूचना एवं प्रौद्योगिकी आधारित मतदाता सेवाएं और स्वीप जैसी पहलों को तेजी से व्यापक स्तर पर लागू किया जा रहा है।
- भारत को IDEA की अध्यक्षता, वैश्विक स्वीकार्यता बढ़ी।
- बढ़ती मतदाता भागीदारी, चुनाव आयोग के प्रभावी नवाचार।
- भारतीय मॉडल पश्चिमी लोकतंत्र से अधिक स्थिर, प्रेरक।
….पश्चिमी देशों की नजर में लोकतंत्र वही है, जो 1215 ईस्वी में इंग्लैंड में हुई मैग्नाकार्टा की संधि से उपजा। इस लोकतंत्र के नाते पश्चिमी देशों में एक खास तरह का श्रेष्ठताबोध है। ऐसे सोच वाले देशों में चुनाव कराने वाली संस्थाओं के संगठन इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट आफ डेमोक्रेटिक एंड इलेक्टोरल असिस्टेंस (आइडीईए) की अध्यक्षता भारत को मिलना मामूली बात नहीं। हाल में दिल्ली में चुनाव आयोग की अध्यक्षता में इस संगठन का सम्मेलन हुआ। इसके जरिये आयोग ने भारतीय लोकतांत्रिक मूल्यों से पश्चिमी देशों को एक तरह से परिचित कराने की कोशिश की। 1995 में 14 देशों द्वारा स्थापित इस संगठन के सदस्य देशों की संख्या अभी 37 है।
अमेरिका और जापान इसके स्थायी पर्यवेक्षक हैं। इस समय दुनिया की आबादी करीब आठ अरब है। इस लिहाज से यह संगठन करीब दो अरब बीस करोड़ पंजीकृत मतदाताओं का प्रतिनिधित्व कर रहा है। इसमें अकेले भारत की हिस्सेदारी 99 करोड़ 10 लाख से ज्यादा है। इसके हिसाब से भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। घरेलू मोर्चे पर जिस समय भारतीय चुनाव प्रणाली और मशीनरी सवालों के घेरे में है, उसी वक्त चुनाव आयोग के हाथ इस संस्था की कमान आने का अर्थ है कि आयोग की वैश्विक स्वीकार्यता बढ़ रही है। इस दृष्टि से संगठन की अध्यक्षता भारत के लिए केवल औपचारिक दायित्व नहीं, बल्कि वैचारिक नेतृत्व का भी अवसर है।
आज भारत में मतदाताओं की चुनावों में भागीदारी लगातार बढ़ रही है। यह एक तरह से चुनाव व्यवस्था की सफलता है। चुनावी प्रबंधन में बढ़ता नवाचार, डिजिटल चुनाव प्रबंधन पर जोर, दिव्यांग और दूरस्थ क्षेत्रों के मतदाताओं तक बढ़ती पहुंच-ये सभी चुनाव आयोग के प्रयासों से ही संभव हुए हैं। चुनावी साक्षरता बढ़ाने को लेकर चुनाव आयोग ने बहुत प्रयोग किए हैं। विपक्षी सवालों के बावजूद चुनावों में मतदाताओं की बढ़ती भागीदारी दिखाता है कि चुनाव आयोग के प्रति लोगों का भरोसा कम नहीं हुआ है। देश में चुनावी पवित्रता बनी हुई है, तो उसकी एक वजह भारत का पारंपरिक लोकतांत्रिक सोच है। दक्षिण भारत में दसवीं सदी के चोल शासकों ने ग्रामीण शासन व्यवस्था के लिए जो तंत्र विकसित किया था, उसे आधुनिक राजनीतिक विज्ञानी भी श्रेष्ठ मानते हैं।
मैग्नाकार्टा से पहले कर्नाटक में लिंगायत संप्रदाय के संस्थापक संत बसवेश्वर द्वारा स्थापित अनुभव मंडपम में समाज के हर वर्ग के लोग अपने धार्मिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर खुलकर चर्चा करते थे। राजनीतिशास्त्री इसे आधुनिक संसद का प्रारंभिक रूप मानते हैं। दुनिया में बढ़ता ध्रुवीकरण, दुष्प्रचार और साइबर हस्तक्षेप, चुनावों में काले धन का बढ़ता उपयोग तथा युवाओं की घटती रुचि ने आधुनिक लोकतंत्र के समक्ष गंभीर खतरे खड़े कर दिए हैं। जनमत को प्रभावित करने के लिए एआइ का बढ़ता इस्तेमाल कोढ़ में खाज का काम कर रहा है। ऐसे चुनौतीपूर्ण माहौल में भारत के अनुभव और उसका सफल चुनावी माडल वैश्विक मंच पर लोकतांत्रिक देशों की चुनाव प्रणालियों के लिए आशा की किरण बन सकता है।
हमारे लोकतंत्र की ताकत केवल चुनाव प्रक्रिया नहीं, बल्कि हर वोट को मिली अहमियत से है। इसी वजह से विविधतापूर्ण समाज, भाषा, धर्म और असमानताओं के बावजूद भारतीय चुनाव प्रणाली शांतिपूर्ण बनी हुई है। बहुलतावादी समाज भारतीय लोकतंत्र की बाधा नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी ताकत है। पश्चिमी देशों और ग्लोबल साउथ की लोकतांत्रिक प्रवृत्तियों की तुलना में भारतीय चुनाव प्रबंधन कहीं अधिक उपलब्धिपूर्ण दिखाई देता है। अमेरिका और यूरोप में न केवल मतदाता भागीदारी लगातार घट रही है, बल्कि अविश्वास और सामाजिक टकराव जैसी चुनौतियां भी बढ़ रही हैं।
इसके विपरीत विविधता के बावजूद हमारी व्यवस्था समाधान का शांतिपूर्ण माध्यम बनी हुई है। इसमें महिलाओं और युवा मतदाताओं की बढ़ती भागीदारी ने लोकतंत्र की जड़ों को और मजबूत किया है। आमजन का राजनीतिक व्यवस्था के प्रति बढ़ता भरोसा भी इसी का प्रतीक है। विविध सामाजिक पहचान, जाति, पंथ और भाषा होने के बावजूद यदि भारत में पश्चिम जैसा सामाजिक टकराव नहीं है, तो इसकी प्रमुख वजह लोकतांत्रिक एवं चुनावी प्रक्रिया में भारतीय मतदाता का अटूट विश्वास है।
भिन्न सामाजिक पहचानों के बीच सामुदायिक संतुलन और सामाजिक सह-अस्तित्व हमारे लोकतंत्र की स्थिरता की गारंटी हैं। इसके पीछे चुनाव आयोग का सोच भी है। इसी सोच के कारण वह लगातार नवाचार को बढ़ावा दे रहा है। ईवीएम, वीवीपैट, महिलाओं एवं दिव्यांगजनों द्वारा संचालित तथा थीम आधारित मतदान केंद्र, पोस्टल बैलेट, सूचना एवं प्रौद्योगिकी आधारित मतदाता सेवाएं और स्वीप जैसी पहलों को तेजी से व्यापक स्तर पर लागू किया जा रहा है।
इसके अतिरिक्त आइआइटी, आइआइएम जैसे प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों की सहभागिता यह दर्शाती है कि चुनाव प्रबंधन को केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि एक अकादमिक और नीति-आधारित अध्ययन क्षेत्र के रूप में भी विकसित किया जा रहा है। इसके चलते भारतीय लोकतंत्र का भविष्य पश्चिम की तुलना में अधिक व्यापक और स्थायी हुआ है। यही कारण है कि वैश्विक विमर्श में भारतीय चुनाव माडल दुनिया के लिए प्रेरक बन चुका है

