यूजीसी के नए नियम !
यूजीसी के नए नियम
यूजीसी के नए नियमों को लेकर यह भ्रम भी दूर किया जाए कि समानता अवसर केंद्रों के सदस्य केवल आरक्षित वर्गों के लोग ही होंगे। इस सबके साथ ही सबसे अधिक आवश्यक यह है कि नए नियमों में झूठी शिकायत करने वालों को हतोत्साहित या फिर आवश्यक हो तो दंडित करने के भी उपाय किए जाएं, ताकि ऐसी शिकायतें न की जा सकें।
- यूजीसी के नए नियम भेदभाव रोकने हेतु विवादों में।
- झूठी शिकायतों पर कार्रवाई का प्रावधान न होने पर चिंता।
- केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय नियमों पर कर रहा है पुनर्विचार।
इससे बड़ी विडंबना और कोई नहीं कि उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव रोकने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी की ओर से लागू किए गए नए नियम इस कारण निशाने पर हैं कि वे बदले की कार्रवाई का जरिया बन सकते हैं। इसकी बड़ी वजह नए नियमों में भेदभाव को स्पष्ट रूप से परिभाषित न किया जाना तो है ही, झूठी शिकायत करने वालों के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई न करने का प्रविधान भी है। चूंकि इन नियमों को लेकर हो रहे विरोध का दायरा बढ़ता जा रहा है और विरोध करने वालों में सत्तारूढ़ भाजपा के नेता भी हैं, इसलिए केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने इन पर नए सिरे से विचार-विमर्श शुरू कर दिया है।
इसी के साथ इस पर राजनीति भी शुरू हो गई है और इसके तहत यूजीसी के नए नियमों को सामान्य बनाम अन्य के रूप में रेखांकित करने की कोशिश की जा रही है। इस क्रम में कुछ भ्रम भी फैलाए जा रहे हैं। यूजीसी के नए नियमों के अनुसार सभी शिक्षा संस्थानों को समानता अवसर केंद्र बनाने होंगे, जिनमें एससी-एसटी के साथ ओबीसी वर्ग के छात्र, कर्मचारी और शिक्षक भी अपने खिलाफ जातिगत आधार पर हो रहे भेदभाव की शिकायत कर सकते हैं। पहले के नियमों में केवल एससी-एसटी वर्ग के छात्र ही शामिल थे।
जीसी के नए नियमों के तहत नस्ल, पंथ, क्षेत्र, जेंडर, दिव्यांगता आदि के आधार पर भी किए जाने वाले भेदभाव के खिलाफ शिकायत की जा सकती है। विरोधियों का तर्क है कि इन आधारों पर तो किसी भी वर्ग के छात्र, कर्मचारी या शिक्षक के खिलाफ भेदभाव हो सकता है। चूंकि यह तर्क निराधार नहीं, इसलिए यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि नए नियम केवल एससी, एसटी, ओबीसी वर्गों के लिए ही नहीं हैं। आखिर नए नियमों में यह प्रविधान शामिल करने में क्या कठिनाई है कि किसी भी वर्ग का छात्र, कर्मचारी या शिक्षक अपने खिलाफ भेदभाव की शिकायत कर सकता है
ऐसे किसी प्रविधान के न होने से यह ध्वनित हो रहा है कि भेदभाव तो केवल सामान्य वर्ग के लोग ही करते हैं। क्या इस धारणा को सही कहा जा सकता है? यूजीसी के नए नियमों को लेकर यह भ्रम भी दूर किया जाए कि समानता अवसर केंद्रों के सदस्य केवल आरक्षित वर्गों के लोग ही होंगे। इस सबके साथ ही सबसे अधिक आवश्यक यह है कि नए नियमों में झूठी शिकायत करने वालों को हतोत्साहित या फिर आवश्यक हो तो दंडित करने के भी उपाय किए जाएं, ताकि ऐसी शिकायतें न की जा सकें।
इसकी अनदेखी न की जाए कि ऐसे कई कानून हैं, जिनका दुरुपयोग बढ़ता जा रहा है। इनमें एससी-एसटी उत्पीड़न के साथ दहेज और यौन हिंसा रोधी कानून प्रमुख हैं। यह ठीक नहीं कि समानता कायम करने वाले नियम समानता के ही सिद्धांत की अनदेखी करते दिखें।

