कहानी में वो ताकत है कि एक भी राजनीतिक नारे के बिना सबसे जरूरी राजनीतिक बात कह दे
रॉकेट बॉयज’ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि वो दो वैज्ञानिकों की कहानी है. वो इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दो सौ साल की गुलामी से रीढ़ और आत्मा को छलनी कर चुके भारत के पुनर्निर्माण की कहानी है. अपने पैरों पर खड़े होने, अपने सत्व को तलाशने, आत्मनिर्भरता की राह पर एक-एक कदम कर आगे बढ़ने की कहानी है.
रॉकेट बॉयज की कहानी की सबसे बड़ी बात ये है कि मर्डर, मिस्ट्री, क्राइम, ड्रग्स, माफिया और कारटेल की कहानियों को देख-देख अघा चुके लोगों के लिए यह कहानी हवा के ताजे झोंके की तरह है. ये सोचकर अच्छा लगा कि किसी ने ऐसे भी सोचा कि दो वैज्ञानिकों के जीवन की कहानी भी सुनाई जा सकती है. वैज्ञानिकों की कहानी में भी कुछ थ्रिल हो सकता है. लोग उसे देखकर उससे जुड़े सकते हैं. यह कहानी भी सुनी और सुनाई जा सकती है. याद रह सकती है, दिलों में ठहर सकती है.
रॉकेट बॉयज आजादी की लड़ाई के बाद नए भारत के निर्माण की पृष्ठभूमि में चल रही दो वैज्ञानिकों होमी जहांगीर भाभा और विक्रम साराभाई की कहानी है. कहानी में सीवी रमन भी आते हैं और एपीजे अब्दुल कलाम भी. कहने वालों ने कहानी को इतने प्यार और खूबसूरती से बुना है कि आप उसके असर में डूबे बिना नहीं रह सकते. लेकिन मुख्य कहानी के पीछे एक और कहानी है, जो खुली आंखों से देखने पर शायद न दिखाई दे. उसे देखने के लिए कहानी में गहरे उतरना पड़ेगा.
संसार की सब कलाओं में अकेले इतना बल है कि जितना संसार की सारे सत्ताओं, ताकतों, हथियारों और सैन्य बलों में भी नहीं होगा. जब जोर से सच कहने की इजाजत न हो तो कला धीरे से सच का कोई एक सिरा आपको पकड़ा देती है और उससे बंधे आप सच की तलाश में खुद ही निकल जाते हैं. सब सियासत जोर-जोर से चिल्लाकर झूठ बोल रही हो तो कला धीरे से एक सच बोल देती है. लेकिन उसकी आवाज इतनी गहरी होती है कि बहुत दूर तक और देर तक सुनाई देती है.

Rocket Boys
पिछले एक दशक के दौरान हमारे देश में इतिहास को सत्य को देखने और दिखाने का नजरिया जिस तरह बदला है, उसे देखकर ऐसा लगता है मानो यह देश अब तक किसी अंधकार युग में जी रहा था. प्रगति, उन्नति और ज्ञान की राह पर हमने अभी-अभी तो चलना शुरू किया है, जब देश के राजनीतिक नेतृत्व की राह थोड़े बाएं से चलकर केंद्र से होते हुए दाहिनी ओर मुड़नी शुरू हो गई और फिर इतना मुड़ी कि मानो कमर ही झुक गई.
रॉकेट बॉयज की कहानी इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि वो दो वैज्ञानिकों की कहानी है. वो इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अंग्रेजों की दो सौ साल की गुलामी में रीढ़ और आत्मा को छलनी कर चुके भारत के पुनर्निर्माण की कहानी है. उसके अपने पैरों पर खड़े होने, अपने सत्व को तलाशने, आत्मनिर्भरता की राह पर एक-एक कदम कर आगे बढ़ने, खुद को पाने और गढ़ने की कहानी है.
अंग्रेज जिस मुकाम पर इस देश को छोड़कर गए थे, वह एक नाजुक और चुनौतियों भरा मोड़ था. भारत के पास इतना रिसोर्स, पैसा, संसाधन और सुविधाएं नहीं थीं. लेकिन प्रखर दिमाग थे, बुलंद इरादे थे, सपने थे, मुल्क को खड़ा करने का जज्बा था. कैंब्रिज और हार्वर्ड से पढ़कर गरीब, पिछड़े मुल्क में लौटे लोगों के लिए हमेशा यह विकल्प था कि वो वहीं रह जाते. ज्यादा पैसे कमाते, बेहतर जिंदगी जीते. लेकिन उन्होंने लौटना और अपने देश के लिए काम करना चुना.

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हम लूटे और छिन्न-भिन्न किए जा चुके थे, जब खुद को गढ़ने की जिम्मेदारी हमारे गैरअनुभवी कंधों पर आ पड़ी थी. इसलिए जब अपनी यात्रा को देखना हो वहां से शुरू नहीं करना चाहिए, जहां से सियासत हमें दिखाने की कोशिश कर रही है. वहां से शुरू करना चाहिए, जहां से छिपाने की कोशिश की जा रही है. पॉपुलर पॉलिटिकल नरेटिव जिस सच को छिपा रहा है, कहानियां प्रकारांतर से उस सच को दिखा देती हैं.
कहने का आशय ये है कि इस देश के साथ हजारों दिक्कतें हैं. बहुत कुछ ऐसा है, जिसे देखकर और सोचकर गर्व नहीं होता. इतिहास में देखें तो वो छोटी-छोटी बेइमानियां, झूठ और स्वार्थ भी दिखाई देता है, जो हमारी इतिहास कथा का सुनहरा पन्ना तो बिलकुल नहीं है. लेकिन उन सबके बीच बहुत कुछ ऐसा है, जो हमारी इतिहास यात्रा का ऐसा मुकाम है, जिसे अनदेखा कर, जिसके गौरव और गरिमा को नजरंदाज कर हम अपने इतिहास को समझ ही नहीं पाएंगे. इतिहास घटनाओं का एक सिलसिला है. उस सिलसिले में कुछ भी स्वतंत्र नहीं है. सारे बदलाव आपस में एक अदृश्य तार से जुड़े हुए हैं.
नए भारत के निर्माण की कहानी को पढ़ना बहुत भावुक और भाव-विभोर कर देने वाला अनुभव भी हो सकता है, यदि आंखों पर अज्ञान का चश्मा न चढ़ा हो. देशभक्ति का जो नरेटिव अब गढ़ा जा रहा है, वो दरअसल देशभक्ति नहीं है. क्योंकि असल देशभक्ति दूसरे देशों और धर्मों को नकारने और खुद को श्रेष्ठ साबित करने में नहीं है. असल देशभक्ति वो प्रेम, श्रम और समर्पण था, जो इस देश को गढ़ने के लिए किया जा रहा था. जो अपने पैरों के नीचे जमीन केा मजबूत करने, अपने सिर पर आकाश को बड़ा करने के लिए किया जा रहा था. देशभक्ति का वह नरेटिव किसी को खारिज नहीं कर रहा था, खुद को खड़ा कर रहा था.
रॉकेट बॉयज सीरीज जब अपने अंत की ओर बढ़ रही होती है, तो मन डूबने-उतराने लगता है. पहले तो लगेगा कि जरूर ये सिनेमाई कल्पना ही होगी. वरना आकाश में रॉकेट छोड़ना क्या कोई बारिश की नदी में नाव बहाना है तो साइकिल, बैलगाड़ी पर रॉकेट धरकर ले जाया जा रहा है. फिर आप उस सच्ची कहानी को पढ़ते हैं और यह देखकर अचंभित रह जाते हैं कि सबकुछ ठीक वैसे ही हुआ था, जैसे हुआ था.

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21 नवंबर, 1963 को केरल के तिरुवनंतपुरम के पास थुंबा नाम की जगह से भारत ने अपना पहला रॉकेट अंतरिक्ष में छोड़ा था. उसके रॉकेट के बनने और अंतरिक्ष तक का सफर तय करने की कहानी एक परीकथा की तरह है. साइकिल और बैलगाड़ी पर रखकर रॉकेट के कुछ हिस्सों को समंदर किनारे उस जगह तक ले जाया गया था, जहां से रॉकेट आकाश में रवाना हुआ. विक्रम साराभाई के काम करने का तरीका कुछ ऐसा था कि चाहे वो कॉटन मिलों का पुनर्निर्माण हो, चाहे आकाश में रॉकेट छोड़ना हो, वो पूरे इकोसिस्टम को अपने साथ लेकर चलते थे. पूरा गांव विक्रम साराभाई और एपीजे अब्दुल कलाम के साथ उस काम में शामिल था.
मैं ऐसे देशभक्तिपूर्ण वैयक्तिक टिप्पणियां नहीं करना चाहती कि ऐसा भारत में ही मुमकिन है. लेकिन वो सारे मनुष्य, सारी सभ्यताएं और सारे देश, जिन्होंने नीचे से शुरू किया हो, जिन्होंने अभाव और गुलामी देखी हो, जो वंचना से गुजरें हों, वो सामूहिकता के और सबको साथ लेकर चलने के महत्व को समझते हैं. भारत में वैज्ञानिकों से लेकर अर्थशास्त्रियों तक की लंबी परंपरा रही है, जिन्होंने वास्तविक अर्थों में सबके साथ, सबके विकास को समझने और समझाने की कोशिश की. यह अनायास नहीं कि अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित वो दोनों अर्थशास्त्री भारतीय हैं, जिन्होंने “कलेक्टिव डेवेलपमेंट” यानि सामूहिक विकास के सिद्धांत की अर्थशास्त्रीय व्याख्या की.
रॉकेट बॉयज की कहानी में एक पॉलिटिकल अंडरटोन है. उस पॉलिटिक्स की भाषा देशभक्ति के महान संवादों और नारों में नहीं, क्रिप्टिक भाषा में है. वो कहीं कही नहीं गई, लेकिन वो मौजूद है. समंदर में घुले हुए नमक की तरह. दिखता नहीं पर होता है. जीभ को छू जाए तो उसका स्वाद महसूस होता है. हाथ को लग जाए तो त्वचा पर उसके नमक की सफेदी छूट जाती है. देश ने रौशनी की राह 2014 के बाद नहीं चुनी. देश ने रौशनी की राह तब चुनी थी, जब अंग्रेज इसे अंधेरों में छोड़ गए थे. हम आज जो हैं, उसके होने की शुरुआत आज से 73 साल पहले उन लोगों ने की थी, जिनके लिए इसे छोड़कर चले जाने और सिर्फ अपने लिए बेहतर जिंदगी चुन लेने के सारे विकल्प मौजूद थे. लेकिन उन्होंने इस देश को चुना. अब ये हम पर है कि इतिहास की उस किताब से हम कौन सा अध्याय चुनते हैं. वो लिखा ही नहीं गया वो, या जिसे मिटाने की कोशिश की जा रही है, वो.