मुख्यमंत्री पद से उद्धव ठाकरे के इस्तीफे के बाद कमजोर हुई शिवसेना की राजनीति
महाराष्ट्र में जिस तरह से शिवसेना का विघटन हुआ है, वह बताता है कि विचारधारागत समझौते के क्या खतरे हो सकते हैं। जनता राजनीतिक दलों पर यह आरोप लगाती रही है कि वे विचारधारा पर अडिग नहीं रहते। मोटे तौर पर देखें तो राजनीति का स्वरूप ही कुछ ऐसा सर्वसमावेशी होता है, जिसमें विचारधारागत यू-टर्न की गुंजाइश बनी रहती है। अलबत्ता इस रणनीति की अपनी सीमाएं हैं और बीते हफ्ते हमने इसे शिवसेना और भाजपा दोनों के ही परिप्रेक्ष्य में सच होते देखा।
ये दोनों ही हिंदुत्ववादी पार्टियां हैं, लेकिन भाजपा-शिवसेना के बीच समानताएं यहीं पर समाप्त भी हो जाती हैं। क्योंकि शिवसेना का हिंदुत्व क्षेत्रीय है। वह मराठी अस्मिता की राजनीति करती है। अतीत में गैर-मराठियों के प्रति उसका रवैया आक्रामक भी रहा है। लेकिन यह शिवसेना ही थी, जिसने उस समय विस्थापित कश्मीरी पंडितों की मदद की थी, जब भाजपा भी उनके नरसंहार पर मौन धारण किए बैठी थी।
उसके बाद समय-समय पर शिवसेना हिंदुत्व की आवाज बुलंद करती रही और बम्बई दंगों के बाद तो उसे भाजपा से भी ज्यादा कट्टरपंथी हिंदू पार्टी मान लिया गया था। यही कारण था कि जब शिवसेना ने कश्मीरी पंडितों के लिए अपनी मराठी-प्रथम की नीति बदली तो इस पर किसी ने ऐतराज नहीं लिया। लेकिन जब उसने कांग्रेस और राकांपा के साथ गठजोड़ किया तो यह उसके अस्तित्व के लिए घातक सिद्ध हुआ।
यहां हमें दो बातों पर स्पष्ट होना चाहिए। पहली यह कि क्या शिवसेना को मिले 16 प्रतिशत वोट ठाकरे परिवार के कारण थे और दूसरी यह कि क्या शिवसेना से टूटने वाले लगभग 40 विधायकों ने ऐसा ईडी के दबाव में किया था। सवाल उठता है कि ग्रामीण क्षेत्रों के विधायकों- जिनका शहर में न कोई आधार है, न कोई अंडरवर्ल्ड कनेक्शन हैं- को ईडी के दबाव में क्यों आना चाहिए? या क्या हम यह मान लें कि समूची शिवसेना ही आपराधिक संगठन है और इसलिए ईडी के दबाव में रहती है?
यकीनन, यह सच नहीं है और इतने सारे विधायकों को महज धमकियों के बलबूते नहीं तोड़ा जा सकता। वास्तव में इस टूट को जमीनी स्तर पर एक विद्रोह की तरह देखना चाहिए। यह इस बात का संकेत था कि महाविकास अघाड़ी इतना बड़ा यू-टर्न था कि उसके राजनीतिक जोखिमों से बचा नहीं जा सकता था। बात केवल इतनी ही नहीं थी कि शिवसेना ने हिंदुत्व से समझौता किया था, समस्या यह भी थी कि कार्यकर्ताओं का उद्धव ठाकरे से जीवंत सम्पर्क नहीं रह गया था।
दूसरी तरफ आदित्य ठाकरे वैसी लिबरल-भाषा बोलने लगे थे, जिसका शिवसेना में कोई महत्व नहीं था। शिवसेना सड़क की राजनीति में माहिर है, लेकिन मौजूदा मामले में विद्रोही जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध वैसा आक्रोश नजर नहीं आया है। शिवसेना का संगठन और कार्यकर्ता आज भी बालासाहेब के प्रति समर्पित हैं और यह मानते हैं कि उद्धव अपने पिता के दृष्टिकोण से दूर छिटक गए हैं। भाजपा भी इसी स्थिति में हो सकती थी, अगर उसने अपने जनाधार को विविधतापूर्ण नहीं बनाया होता।
आरम्भ में उसे बनिया-बामण पार्टी माना जाता था, लेकिन उसने कालान्तर में स्वयं को जातिविहीन हिंदुत्व की प्रस्तोता के रूप में सामने रखा और अब उसे पिछड़ा वर्ग, दलितों और आदिवासियों के भी वोट मिलने लगे हैं। प्रधानमंत्री खुद अन्य पिछड़ा वर्ग से आते हैं, जबकि भाजपा ने अपने दो कार्यकालों में एक दलित और एक आदिवासी को राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनाया। यही कारण था कि नोटबंदी और जीएसटी ने भाजपा के व्यापारी-समर्थक वर्ग को हताश किया, इसके बावजूद पार्टी को ज्यादा नुकसान नहीं हुआ।
एक फैक्टर यह भी है कि भाजपा के समर्थक-वर्ग के पास आज हिंदुत्व की राजनीति का कोई दूसरा विकल्प नहीं है। राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस और अन्य सेकुलर पार्टियां वामपंथी रुख कायम रखे हुए हैं, जिससे हिंदुत्व की राजनीति में भाजपा को एकाधिकार प्राप्त हो गया है। लेकिन सुरक्षा के मामले पर भाजपा अब भी कमजोर बनी हुई है।
दिल्ली में जिस तरह से शाहीनबाग को घटित होने दिया गया, उसके बाद उसने दिल्ली चुनावों में मुंह की खाई। दूसरी तरफ योगी आदित्यनाथ की बुलडोजर राजनीति ने उन्हें सपा के गढ़ माने जाने वाले आजमगढ़ और रामपुर उपचुनावों में शानदार जीत दिलाई है। जबकि शिवसेना यह तक नहीं समझ पाई कि महाराष्ट्र इकलौता ऐसा राज्य है, जहां मतदाताओं को दो हिंदुत्ववादी पार्टियों का विकल्प उपलब्ध है।
इंदिरा गांधी ने कहा था, सभी लोगों को एक साथ अपने से दूर मत कर दो। भाजपा ने इस नीति को अच्छे से अपनाया है। लेकिन शिवसेना ने अपने समूचे जनाधार को दूर कर दिया। खामियाजा वह भुगत रही है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)