आर्थिक प्रश्नों से भविष्य जुड़ा है। राजनीति आम सहमति से लक्ष्मणरेखा तय करे
आर्थिक प्रश्न इतिहास के ड्राइविंग फोर्स (चालक) हैं। आज भी हैं, अतीत में भी रहे हैं। भविष्य गढ़ने के भी सूत्र हैं। इसलिए लोक जीवन की मुख्यधारा में मूल बहस के केंद्र ‘आर्थिक प्रसंग’ हों, इसमें ही मुक्ति है। सामाजिक बदलाव व राजनीतिक क्रांतियों के मूल में, मार्क्स ने माना है आर्थिक कारण ही होते हैं। एंगेल्स एक कदम आगे बढ़ा, कहा इतिहास का सबसे निर्णायक तत्व आर्थिक मुद्दे ही हैं।
233 वर्षों पहले जुलाई माह में हुई फ्रांसीसी क्रांति या अब जुलाई में ही श्रीलंका संकट के मूल में आर्थिक प्रश्न ही हैं। इस इतिहास से दुनिया चलाने वाले शासकों के एक बड़े तबके ने बहुत कुछ सीखा है। पर शासकों का एक बड़ा हिस्सा आज भी फ्रांसीसी शासकों की तरह आग से खेल रहा है। वह भी लोकतंत्र में।
मशहूर प्रसंग है कि फ्रांस की सड़कों पर जन-आक्रोश के स्वर सुनकर लुई सोलहवें की सम्राज्ञी मेरी ने पूछा, कैसी आवाज है? उन्हें बताया गया, भूखे लोग ब्रेड मांग रहे हैं। रानी ने फरमाया, ब्रेड की किल्लत हो तो उन्हें केक खाने को कहें।
आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपैया? नहीं, बल्कि आमदनी से कई गुना खर्च। बेलगाम खर्च- बिना भविष्य सोचे, और तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए। कुछ राज्यों ने सब जानते हुए भी श्रीलंका की राह अपना ली है।
रिजर्व बैंक बुलेटिन (जून, 2022) में विशेषज्ञ अर्थशास्त्रियों की एक रिपोर्ट छपी है। ‘स्टेट फाइनेंस ः अ रिस्क एनालिसिस’ (राज्य वित्त ः खतरों का एक विश्लेषण)। इसमें दस राज्यों की आर्थिक चुनौतियों एवं खतरों के तथ्य हैं। सालाना, देशभर के सभी राज्यों के कुल खर्च का आधा यही दस राज्य व्यय करते हैं। इनका कुल राजस्व, वार्षिक सूद अदायगी करने की स्थिति में नहीं है। मूल कर्ज चुकाने की बात तो सपना है। पिछले पांच वर्षों से तीन राज्यों का कर राजस्व लगातार घट रहा है। यानी आमदनी घट रही, खर्च बढ़ रहा है।
इस पूरी बीमारी की जड़ क्या है? आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपैया? नहीं, बल्कि आमदनी से कई गुना खर्च।
बेलगाम खर्च- बिना भविष्य सोचे, और तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए। कुछ राज्यों ने भलीभांति यह सब जानते हुए भी श्रीलंका की राह अपना ली है। उत्तर के सीमावर्ती एक राज्य पर तो तीन लाख करोड़ रुपयों का कर्ज है, यानी उसका प्रत्येक व्यक्ति एक लाख रुपए का कर्जदार है।
वह राज्य अपने बजट के 100 रुपए से पांच या छह रुपए से अधिक विकास पर खर्च नहीं कर सकता। राज्य का कुल ऋण, सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में 53 फीसदी है। बेरोजगारी 25 फीसदी है। इस राज्य का कुल कमिटेड एक्सपेंडिचर 50 फीसदी है। यानी वेतन, पेंशन, भत्ता, प्रशासनिक खर्च, कर्ज भुगतान वगैरह। बिजली की हालत क्या है? बिजली वितरित करने वाली कंपनियां तबाह हो चुकी हैं। उनका घाटा भी जोड़ दें तो राज्य आर्थिक तबाही के भंवर में है।
अब इस राज्य के सामने क्या विकल्प है? अगर केंद्र से पैसा मांगे, तो केंद्र की अपनी सीमाएं हैं।
दूसरा रास्ता यह है कि खूब शराब बेचे। तो शराब बिक्री के ठेके बढ़ रहे हैं। अधिक शराब बिक्री, अधिक आमद। जनता को रोजगार चाहिए, नए संस्थान या विकास के काम चाहिए, पर आर्थिक बदइंतजामी से यह सब नहीं हो रहा। पीने वालों की जमात खड़ी हो रही है। उसी राज्य में जहां कृषि विश्वविद्यालय ‘हरित क्रांति’ के इंजिन थे? वे अब किस हालत में हैं? उनका कुल बजट खत्म हो जाता है, वेतन, पेंशन, भत्ता वगैरह पर।
उन विश्वविद्यालयों- संस्थानों के पास, शोध या विकास पर खर्च करने के पैसे नहीं हैं। भविष्य में अपने काम या शोध से वे दूसरी ‘हरित क्रांति’ करने की स्थिति में नहीं रह गए हैं। चूंकि संसाधन ही नहीं है। यह मामला कितना गंभीर है, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि एक सप्ताह के अंदर प्रधानमंत्री ने भी दो बार यह मुद्दा उठाया है।
उन्होंने कहा कि ‘शॉर्टकट की राजनीति’ से देश में ‘शार्ट सर्किट’ हो जाएगा (झारखंड की आमसभा में)। फिर पुनः कहा कि मुफ्त की रेवड़ियां मुल्क को तबाह कर देंगी (उत्तर प्रदेश की जनसभा में)। इन प्रश्नों से देश का भविष्य जुड़ा है। बेहतर हो राजनीतिक दल आपसी आम सहमति से अपनी लक्ष्मण-रेखा खुद तय कर लें।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)