भाजपा के दलदल में अनाथ कमलनाथ !
भाजपा के दलदल में अनाथ कमलनाथ
भारत की राजनीति में जिस दल-बदल को रोकने के लिए कांग्रेस की सरकार किसी जमाने में क़ानून लेकर आई थी,वो क़ानून इतना कमजोर साबित हुआ की कांग्रेस के 78 वर्षीय नेता कमलनाथ भी राजनीति से सन्यास लेने के बजाय पुनर्वास की आस में अपनी मातृ संस्था कांग्रेस से सपरिवार किनारा कर रहे हैं । कांग्रेस के लिए इसमें हैरानी की कोई बात इसलिए नहीं है क्योंकि ऐसा होना तय था ,लेकिन भाजपा इन ‘ नौना ‘लगी ईंटों से अपने किले को कितना मजबूत कार पाएंगी ये महत्वपूर्ण मुद्दा है।
तीसरी बार सत्ता में आने को लालायित भाजपा और उसके नेता इतने बावरे हो गए हैं कि अपना कुनवा बढ़ाने के लिए अब जात-पांत,भेद-भाव और रंग-रूप तो दूर शरणार्थियों का डीएनए भी नहीं देख रहे। पहले भाजपा को बिभीषण प्रजाति के लोगों की महती आवश्यकता थी लेकिन अब वे जामवंत प्रजाति तक को अपने यहां प्रवेश दे रहे हैं। शरणार्थियों को भाजपा में मुंहमांगी कीमत मिल रही है सो अलग ,भाजपा इस समय राजनीति का ऐसा संगम है जिसमें सना-ध्यान करने के बाद किसी भी पापी ,महापापी के पाप धूल सकते हैं। 1984 के दंगों के एक आरोपी कमलनाथ का नाम भी अब इन शर्णार्थियों में शामिल हो रहे हैं ।
कमलनाथ को पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी का तीसरा बेटा कहा जाता था । क्यों कहा जाता था ये कांग्रेसी जानें और कमलनाथ ? लेकिन हम और देश ये जानता है कि कांग्रेस ने बूढ़े हो चुके कमलनाथ को जितना दिया उतना कोई पार्टी अपने किसी नेता को नहीं दे सकती। कांग्रेस ने कमलनाथ को एक -दो बार नहीं बल्कि पूरे 9 बार संसद में भेजा ।केंद्र की कांग्रेस सरकार में मंत्री बनाया। जब कांग्रेस सत्ता में नहीं रही तब कांग्रेस ने कमलनाथ को पार्टी का महासचिव तक बनाया और आखिर में मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया। उनके बेटे नकुलनाथ को संसद की सीढ़ी चढ़वाई और तो और कमलनाथ को पात्र न होते हुए भी मप्र कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया,प्रतिपक्ष का नेता बनाया ,लेकिन कमलनाथ का लालच नहीं मरा और आखिर में राजयसभा न भेजे जाने से खफा होकर वे भाजपा यानि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के श्रीचरणों में जा बैठे।
कांग्रसी से भाजपाई हो रहे कमलनाथ की यदि कोई योग्यता थी तो ये कि वे इंदिरा गाँधी के बेटे संजय गांधी के सहपाठी थे और इसका उन्होंने भरपूर लाभ उठाया। इंदिरा गाँधी के जमाने में ही नहीं बल्कि इंदिरा गाँधी के बाद राजीव गाँधी की सरकार में भी और अंत तक डॉ मन मोहन सिंह की सरकार में भी वे हमेशा नेहरू-गांधी परिवार की आँख का तारा बने रहे। एक सांसद के रूप में और एक मंत्री के रूप में कमलनाथ की उपलब्धियों के मुरीद हमारे एक वरिष्ठ पत्रकार साथी दिल्ली के राकेश कपूर हैं, लेकिन अब वे क्या कहेंगे मै नहीं जानता ? कमलनाथ ने सत्ता के लालच में अपनी मातृ संस्था कांग्रेस,अपने संरक्षक नेहरू-गांधी परिवार का ही नहीं बल्कि उन तमाम लोगों के साथ विश्वासघात किया है जो कमलनाथ को पक्का कांग्रेसी मानते थे।
भाजपा में जाकर कमलनाथ और उनके बेटे नकुलनाथ को ईडी ,सीबीआई और भविष्य में जेल यात्राओं से मुक्ति सम्भव है लेकिन उन्हें जो श्राप इंदिरा गाँधी,संजय गाँधी और राजीव गांधी की आत्माएं देंगीं उससे निजात नहीं मिल सकती। श्रीमती सोनिया गाँधी और सड़कों पर उतरकर कांग्रेस के लिए संघर्ष कर रहे राहुल गांधी की आह भी कमलनाथ को चैन से नहीं जीने देगी। भाजपा के लिए वे कांग्रेस के जामवंत से ज्यादा नहीं हैं । सुग्रीव से ज्यादा नहीं है। ऐसे लोगों के लिए लंकेश ने खुद कहा था –
‘तुम्ह सुग्रीव कूलद्रुम दोऊ। अनुज हमार भीरु अति सोऊ॥
जामवंत मंत्री अति बूढ़ा। सो कि होइ अब समरारूढ़ा॥’
आने वाले दिनों में 2024 के आम चुनाव में कमलनाथ भाजपा का कोई लाभ नहीं कर सकते । भाजपा के पास 2019 में मप्र की 29 में से 28 सीटें तो पहले से थीं। अब ज्यादा से ज्यादा एक सीट का और इजाफा हो जाएगा ,लेकिन भाजपा को कमलनाथ के भाजपा में आने से जो नुक्सान होगा उसकी कल्पना न मोदी जी को है और न अमित शाह को। कांग्रेस को तो मप्र में जो नुक्सान होना था ,वो विधानसभा चुनाव में कमलनाथ की वजह से हो ही चुका है । कमलनाथ की वजह से 2020 में कांग्रेस मप्र में अपनी सत्ता और ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसा नेता पहले ही खो चुकी है। इसलिए कांग्रेस को कमलनाथ और उनके बेटे के भाजपा में जाने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा । कमलनाथ का कुनवा तो सिंधिया के कुनबे से भी छोटा है। उनके साथ 20 विधायक भी नहीं है। फर्क अब सिंधिया को पडेगा। वे कमलनाथ का स्वागत कैसे करेंगे ? सिंधिया ने तो कमलनाथ की मिमक्री कर-करके ही भाजपा में जगह बनाई थी।
भाजपा कांग्रेस को जनादेश के जरिये ध्वस्त नहीं कर पा रही है ,इसलिए मजबूरन उसे तोड़फोड़ के जरिये,खरीद-फरोख्त के जरिये,सौदेबाजी के जरिये कांग्रेस से जूझना पड़ रहा है । भाजपा ने महाराष्ट्र में यही अभियान चला । वहां पूर्व मुख्य्मंत्री अशोक चव्हाण को पार्टी में शामिल किया जबकि वे भाजपा के महाभ्रष्ट कांग्रेसी नेताओं की सूची में थे। कमलनाथ तो सिख दांगों के आरोपी थे ही। लेकिन भाजपा को अब इससे कोई फर्क नहीं पड़ता । भाजपा तो हजारों करोड़ के भ्र्ष्टाचार के आरोपी एनसीपी नेता अजित पंवार को भी अपने कन्धों पर लादकर चल रही है। यानि आज देश के सामने भाजपा एक ऐसी मजबूर पार्टी के रूप में खड़ी है जो सत्ता में बने रहने के लिए केर-बेर में फर्क करने की क्षमता खो चुकी है । भाजपा को अब आपने शाखामृगों की क्षमता पर भरोसा नहीं रहा। बेचारी भाजपा के नेता भानुमति बन गए हैं।
मै अक्सर विनोद में कहा करता हूँ कि अगले आम चुनाव तक भाजपा का नाम भाजपा [आई ] हो जाएगा। क्योंकि कांग्रेस के नेताओं को भाजपा जिस गति से अपनी पार्टी में शामिल कार रही है उसे देखते हुए मूल भाजपाई कहीं अल्पसंख्यक न हो जाएँ। एक जमाने में कांग्रेस जब विभाजत हुई थी तब उसके नाम के साथ [आई ] शब्द अंकित हुआ था। मजे की बात ये है कि भाजपा के कांग्रेसीकरण के इस अभियान को नागपुर का भी समर्थन हासिल है। नागपुर को भी आपने स्वयं सेवकों की क्षमता पर शायद भरोसा नहीं है। अन्यथा नागपुर 2024 के रण के लिए अपनी फ़ौज में आँखें बंद कर कांग्रेसियों की भर्ती न करता।
बहरहाल मप्र में भाजपा का कमलनाथकरण तब हो रहा है जब कांग्रेस के सेनापति राहुल गांधी अपनी भारत जोड़ो न्याय यात्रा लेकर मद्ध्य्प्रदेश में प्रवेश कर रहे हैं। उनके स्वागत के लिए ही भाजपा ने कमलनाथ को आपने कन्धों पर बैठाया है । इससे पहले जब वे बिहार में थे तब भाजपा ने जदयू के नीतीश कुमार की पालकी उठाई थी । उससे पहले झारखंड में कांग्रेस के सहयोगी झामुमो के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को जेल भेजा था। आगे भी ये सिलसिला जारी रहने वाला है। इसलिए किस राज्य में, कौन सा कमलनाथ भाजपा का हाथ थाम ले कहना कठिन है। लेकिन एक बात तय है कि तीसरी बार सत्ता में आने के बाद भी ये देश न हिन्दू राष्ट्र बन पायेगा और न इस देश की राजनीति से कांग्रेस हमेशा के लिए गायब हो पाएगी ,क्योंकि कांग्रेस आखिर कांग्रेस है। कांग्रेस का सर्वनाश फिलहाल असम्भव दिखाई देता है।