यूपी में दलित वोटों पर मचा है घमासान ?

अखिलेश को मिली चंद्रशेखर नाम की नयी चुनौती, यूपी में दलित वोटों पर मचा है घमासान

आम चुनाव संपन्न हुए हुए और नयी सरकार बने लगभग एक माह बीत गए हैं. सरकार के कार्यकाल की शुरूआत हो चुकी है. इस चुनाव के बाद दो लोगों की सक्रियता खूब देखी जा रही है.  इसमें एक तो लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी हैं जिन्होंने सरकार को हर जगह घेरने की इस बार सोच ली है. इसीलिए, जब हाथरस में भगदड़ होती है तो राहुल वहां दिखते हैं और असम में बाढ़ हो तो वहां पहुंच जाते हैं. वह पूरे देश में घूम-घूम कर अपनी नयी पहचान बनाने में लगे हैं. दूसरा नाम अखिलेश यादव का है जो इन दिनों काफी सक्रिय दिख रहे है. यूपी में दलितों के वोट पर सभी पार्टियों की नजर है क्योंकि इस लोकसभा चुनाव में देखा गया है कि दलित वोटों पर सिर्फ मायावती और बसपा का ही एकाधिकार नहीं रह गया है.

आम चुनाव की करवट

आमचुनाव में जिस प्रकार से जनता ने करवट बदली है वो काफी देखने लायक है. पिछले दस सालों से जो वोट किसी एक पार्टी के लिए फिक्स थे, अब उसमें बदलाव देखने को मिल रहा है. राजनीति के मंच पर मोहरों की स्थिति काफी तेज गति से बदली हैं. अखिलेश यादव ने जब पीडीए (पिछड़ा,दलित, अल्पसंख्यक) का नारा दिया था तो उस समय लगा कि इतना आसान नहीं रहने वाला है. चुनाव नजदीक आते ही अखिलेश यादव ने इसको मुद्दा भी बनाया. राहुल गांधी के दो बयान, जिसमें पहला जातीय जनगणना कराने तथा दूसरा संविधान बचाने वाली बात के तौर पर सामने आए, उसके बाद इन मुद्दों को अखिलेश यादव ने भी उठाना शुरू किया , जिससे कि इस चुनाव में इन दोनों बातों ने काफी प्रभावित किया. यूपी में इंडिया गठबंधन के अंतर्गत कांग्रेस और सपा एक साथ चुनाव में आए तो पिछड़ों का वोट उनकी ओर गया, जिसका एक पक्ष यह भी है कि इस जीत में पीडीए के नारे और टिकट बंटवारे को भी श्रेय जाता है. इसके साथ ही दलित वोटरों का एक बड़ा खेमा इंडिया गठबंधन की ओर भी शिफ्ट हो गया. कांग्रेस के सीटों पर ज्यादा पिछड़ा और दलित वोट मिले, उससे थोड़े कम प्रतिशत वोट सपा के प्रत्याशियों को मिले. चुनाव में इंडिया गठबंधन की ओर दलित वोटों का ट्रांसफर काफी देखा गया है. दूसरी घटना यूपी में ये भी देखने को मिली कि जो मायावती की पारंपरिक सीट थी वहां पर चंद्रशेखर आजाद को जीत मिली है. चंद्रशेखर आजाद कांशीराम को आदर्श मानते हैं जबकि मायावती को आदरणीय मानते हैं जबकि बहुजन पार्टी की राजनीति से वो खुद की राजनीति को परे रखते हैं.

भाजपा-बसपा को काफी नुकसान

इस सबके बीच ये देखने को मिला कि भाजपा को दलित वोटों का काफी नुकसान हुआ है. पिछले तीन दिनों से भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव लखनऊ में मीटिंग कर रहे हैं. समीक्षा बैठक में एक मुद्दा तो अनुसूचित जनजातियों की वोटिंग ही थी. समीक्षा के क्रम में मोर्चा के अधिकारियों की ओर से कहा गया  कि जो आरक्षण का मुद्दा है उसका अभी तक कोई माकूल जवाब नहीं मिल पा रहा है. युवाओं के लिए नौकरियां देने के लिए कोई काम नहीं हो पा रहा है. सरकार स्तर पर नौकरी नहीं मिल पा रही है, प्रदेश में सरकारों ने संविदा पर नौकरी दे रखी है, उसमें आरक्षण का ध्यान नहीं रखना होता है. अगर संविदा की नौकरियों के आरक्षण का ध्यान रखा जाए तो खोया हुआ वोट फिर से लौटने में कुछ हद तक कामयाबी हो सकती है. यूपी में दलित अब नयी पार्टी की ओर देख रहा है. अब मायावती और उनकी राजनीतिक शैली दलितों को मुफीद नहीं लग रही है. मायावती को भाजपा की बी टीम माना जाता रहा है ऐसे में दलित युवा भी कुछ हद तक इसको सही मानने लगे हें. इसी कारण इंडिया गठबंधन की ओर दलितों का रुझान बढ़ा है और इसी बीच में चंद्रशेखर आजाद नई राजनीतिक शैली के साथ यूपी में आगे बढ़ चले हैं.  

मायावती का वोट प्रतिशत 2014 और 2019 का चुनाव में भी कम हुआ, उनका वोट दूसरे पार्टियों की ओर शिफ्ट होता गया. मायावती ने 2022 के चुनाव में बड़ी राजनीतिक गलती की जिसके अंतर्गत उनको काफी नुकसान हुआ. उसके बाद हर तरफ से ये बात सामने आने लगी कि वो भाजपा को फायदा पहुंचाने के लिए चुनाव बसपा लड़ती है. चुनाव के जब नतीजे सामने आए तो ये पाया गया कि अगर बसपा चुनाव नहीं लड़ती तो यूपी में सपा की सरकार बन जाती.

मायावती की लगातार गलतियां

2022 के गलती के बाद 2024 में भी मायावती ने गलती की. इंडिया गठबंधन की ओर से लगातार उनको अपने गठबंधन में बुलाया गया लेकिन वो गठबंधन में नहीं गई और अकेले दम पर चुनाव लड़ा. इसका परिणाम ये हुआ कि उनको एक सीटें भी यूपी में नहीं आई और उनका वोट प्रतिशत भी काफी कम हुआ. उनके ऐसे कदम से दूसरे को ही फायदा होता है. इस तरह  से बसपा और मायावती के पास में कुछ खास नहीं बचा है.चंद्रशेखर की राजनीति को समझें तो ये बात सामने आयी है कि दलित युवाओं के भीतर वो अग्रेशन पैदा कर चुके हैं.  दलित जो नौकरी और आरक्षण तक ही सीमित रहता था, समाज में दबकर रहता था, अब चंद्रशेखर की राजनीति में आने से काफी कुछ परिवर्तन आया है. चंद्रेशखर मुस्लिम और दलित के गठजोड़ की बात करते हैं.  

चंद्रशेखर के लिए कई चुनौतियां 

चंद्रशेखर आजाद की यही एक सीमा भी है. इन दोनों के साथ दो से चार सीटों तक ही जीत मिल सकती है. चंद्रेशेखर के इस कदम से पश्चिम यूपी में फायदा मिल सकता है लेकिन पूरे यूपी में इस कदम पर चलने कोई खास फायदा नहीं होने वाला है. यूपी में मुस्लिम वोटरों के लिए चंद्रशेखर पहली पसंद नहीं है.  2024 के वोट में कांग्रेस और सपा का गठबंधन देखने को मिला की उनकी ओर वोट काफी शिफ्ट हुआ है. 1990 के बाद से यूपी में ज्यादातर मुस्लिम वोटर सपा के साथ रहे हैं जबकि लोकसभा के चुनाव में वो कांग्रेस की ओर जाते हैं.  अब चंद्रशेखर के आने के बाद ये देखना होगा कि वो कितने सीटों पर इस तरह के समीकरण को बना पाते हैं.

चंद्रशेखर आजाद के पास काफी चुनौतियां हैं. क्योंकि उनको दलित युवा वोटर तो फॉलो करते हैं लेकिन उनकी छवि युवाओं को बिगाड़ने वाली ही है. मुस्लिम वोटर में अपना छवि किस प्रकार से बना पाते हैं ये भी देखना होगा इसके साथ ये भी देखना होगा कि वो अपनी पार्टी को कितना मजबूत कर पाते हैं. आजाद पार्टी अभी तक एक राजनीतिक पार्टी के तौर पर व्यापक रूप से यूपी में नहीं दिखा है.  चंद्रशेखर के लिए एक लंबी दौड़ अभी बची है अभी दो चुनाव में खुद को साबित करना होगा उसके बाद ही वो एक वैकल्पिक रूप में देखे जा सकते हैं, अन्यथा वो एक छोटे से क्षेत्र के क्षत्रप ही बनकर रह जाएंगे.  

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि ….न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]

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