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कब तक ठगे जाएंगे मप्र के आदिवासी ?

कब तक ठगे जाएंगे मप्र के आदिवासी ?

मप्र में आदिवासियों को ठगने का 70 साल पुराना अभियान आज भी रुकने का नाम नहीं ले रहा है. प्रदेश में आदिवासी अंचलों की 47 विधानसभा सीटें हैं, जो हर बार नयी सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका अदा करती हैं. प्रदेश के आदिवासी मतदाता सात दशकों से सिर्फ दूसरों की सरकार बनाते आ रहे हैं लेकिन आजतक उनकी अपनी सरकार नहीं बन सकी.

मप्र में विधानसभा चुनाव 2028 में होंगे लेकिन आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए भाजपा ने आदिवासी क्षेत्रों में समग्र ग्रामीण विकास का नया ब्लूप्रिंट तैयार किया है। इस योजना के तहत आदिवासी आरक्षित 47 विधानसभा क्षेत्रों में तीन से चार गांवों के समूह बनाकर विभिन्न मानकों पर बिना सरकारी सहयोग के विकास कार्य किए जाएंगे। इस पहल को ‘संकुल विकास परियोजना’ नाम दिया गया है।

मप्र की स्थापना 1 नवंबर 1956 को हुई थी, हालांकि 1950 से यहाँ मुख्यमंत्री बनना शुरू हो गये थे. आदिवासी बहुल मप्र का पहला मुख्यमंत्री कोई आदिवासी नहीं बल्कि ब्राह्मण रविशंकर शुक्ल को बनाया गया.तब से अब तक प्रदेश में 18 मुख्यमंत्री बन चुके हैं किंतु आजतक किसी आदिवासी को मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया. नरेशचंद मात्र 13 दिन जरूर मुख्यमंत्री रहे. वे गौंड आदिवासी राजा थे.आदिवासियों की उपेक्षा के मामले में कांग्रेस और भाजपा का रवैया एक जैसा है.
मप्र में सबसे ज्यादा राज कांग्रेस ने किया, किंतु कांग्रेस भी आदिवासियों को ठगती रही. कांग्रेस की सरकार में जब बहुत शोर हुआ तो शिवभानु सिंह सोलंकी को पहली बार उप मुख्यमंत्री बनाया गया. शिवभानु सिंह सोलंकी मप्र की पहली विधानसभा के सदस्य थे. वे 1980 में अपने से कनिष्ठ अर्जुन सिंह के मंत्रिमंडल में उप मुख्यमंत्री बनाए गये थे किंतु मोतीलाल वोरा के मंत्रिमंडल में उन्हे हटा दिया गया.

मप्र में भगवंतराव मंडलोई,कैलाशनाथ काटजू,द्वारकाप्रसाद मिश्रा,गोविंद नारायण सिंह,नरेशचंद्र सिंह,श्यामा चरण शुक्ला,प्रकाशचंद्र सेठी,कैलाश जोशी,वीरेंद्र कुमार सखलेचा,सुंदरलाल पटवा,अर्जुन सिंह,मोतीलाल वोरा,दिग्विजय सिंह,उमा भारती,बाबूलाल गौर,शिवराज सिंह चौहान,कमलनाथ और अब मोहन यादव मुख्यमंत्री हैं. इनमें से कोई भी आदिवासी नहीं है.
कांग्रेस में शिवभानु सोलंकी के बाद आदिवासी नेता के रुप में जमुना देवी आगे आईं लेकिन उन्हे भी मौका नहीं मिला. भाजपा ने भी कांग्रेस की तरह आदिवासियों से छल किया. भाजपा अब तक आधा दर्जन मुख्यमंत्री बना चुकी है किंतु भाजपा ने भी किसी आदिवासी को मुख्यमंत्री पद के लायक नहीं समझा. भाजपा में भी फग्गनन सिंह कुलस्ते, दिलीप सिंह भूरिया जैसे नेता मुख्यमंत्री बनने का सपना पाले रहे पर किसी को मौका नहीं दिया गया.

मप्र विधानसभा की 230 सीटों में से 47 सीटें आदिवासियों की हैं. इनमें से 25 पर भाजपा का कब्ज़ा है. 21सीटें कांग्रेस के पास हैं. अब भाजपा सभी आदिवासी सीटों पर काबिज होने का सपना देख रही है. इसीलिए भाजपा ने क्लस्टर स्तर पर विस्तृत प्रोफाइल तैयार कराई है। इसमें प्रत्येक संकुल का नाम, संबंधित जिला और ब्लॉक, शामिल ग्राम पंचायतों की सूची, तहसील मुख्यालय से दूरी, पंचायतों के अंतर्गत आने वाले गांवों की संख्या, कुल जनसंख्या और परिवारों का विवरण सम्मिलित किया गया है। एक क्लस्टर में अधिकतम आठ ग्राम पंचायतों को शामिल करने की व्यवस्था की गई है।

भाजपा जनजातीय मोर्चे ने मध्यप्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में गांवों के विकास के लिए संसदीय संकुल विकास परियोजना लागू की है। इस पहल के तहत प्रत्येक आदिवासी विधानसभा सीट पर तीन से चार गांवों को जोड़कर एक संकुल (क्लस्टर) बनाया जाएगा। इसमें एक-दूसरे से भौगोलिक रूप से जुड़े ग्राम पंचायतों को सम्मिलित किया जाएगा, ताकि आवागमन और समन्वय दोनों में सुगमता बनी रहे।भाजपा आदिवासी क्षेत्रों में गांवों के समग्र विकास का मॉडल प्रस्तुत करके कांग्रेस के विकास और भाजपा के डेवलपमेंट मॉडल को बताना चाहती है।

एमपी की मोहन सरकार में आदिवासी वर्ग के 5 मंत्री हैं। इनमें विजय शाह, नागर सिंह चौहान, निर्मला भूरिया, संपतिया उईके, राधा सिंह मंत्री हैं।इनमें विजय शाह के मन में मुख्यमंत्री बनने का सपना बहुत पुराना है. दुर्भाग्य ये है कि भाजपा के पास भी कांग्रेस की तरह आदिवासियों को मुख्यमंत्री बनाने की कोई योजना नहीं है. आदिवासी केवल वोट बैंक हैं. भाजपा के लिए भी और कांग्रेस के लिए भी.
#राकेश अचल

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